नकली दवाओं का अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट मानवता के लिए गंभीर खतरा

"तुर्किये और अजरबैजान तक फैला नेटवर्क स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल"

हर्षिता यादव  Picture
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दवा का उद्देश्य मनुष्य को बीमारी से राहत देना और जीवन को सुरक्षित बनाना है, लेकिन जब जीवन बचाने वाली दवाएं ही मौत और गंभीर बीमारियों का कारण बनने लगें, तब यह केवल मिलावट या आर्थिक अपराध का मामला नहीं रह जाता, बल्कि मानवता के विरुद्ध गंभीर चुनौती बन जाता है। देश में नकली दवाओं के कारोबार को लेकर कर्नाटक में सामने आया मामला इसी चिंता को गहरा करता है। जांच में एक ऐसे गिरोह का पता चला है, जिसके तार भारत के कई राज्यों से लेकर तुर्किये और अजरबैजान तक जुड़े होने की बात सामने आई है। यह घटनाक्रम बताता है कि नकली दवाओं का कारोबार अब किसी एक शहर, राज्य या देश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संगठित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के रूप में काम कर सकता है।
 
कर्नाटक में विशेष जांच दल की पड़ताल के अनुसार गिरोह का कथित सरगना आर. प्रशांत रंजन बाबू विदेशी संपर्कों के माध्यम से प्रसिद्ध दवा कंपनी फाइजर की दवाओं जैसे दिखने वाले लेबल मंगवाता था। इन लेबलों और क्यूआर कोड की नकल तैयार कर नकली दवाओं की शीशियों पर चिपकाई जाती थी। जांच में करीब दस हजार ऐसी शीशियों का पता चलने की बात सामने आई है, जिन पर फाइजर की जाविसेफ्टा और एम्ब्लेकियो जैसी दवाओं के लेबल लगे थे। हालांकि, इन दवाओं की वास्तविक संरचना, गुणवत्ता और संभावित नुकसान का निर्धारण प्रयोगशाला जांच तथा संबंधित अधिकारियों की पुष्टि के बाद ही किया जा सकता है।
 
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि गिरोह ने कथित रूप से काम को अलग-अलग हिस्सों में बांट रखा था। सस्ती या सामान्य दवाएं विभिन्न राज्यों से खरीदी जाती थीं। इसके बाद उन्हें शीशियों में भरकर महंगी दवाओं के नकली लेबल लगाए जाते थे। तैयार माल को असली दवाओं की खेप के साथ बाजार में पहुंचाने की कोशिश की जाती थी। इस तरीके से अस्पतालों, दवा विक्रेताओं और मरीजों के लिए असली तथा नकली उत्पादों में अंतर करना कठिन हो सकता है। जब किसी प्रतिष्ठित कंपनी की पैकेजिंग, नाम और क्यूआर कोड की नकल कर ली जाए, तब केवल बाहरी स्वरूप देखकर दवा की प्रामाणिकता पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं रह जाता।
 
नकली दवाओं का खतरा केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है। मरीज जब किसी गंभीर बीमारी के उपचार के लिए दवा खरीदता है, तो उसे विश्वास होता है कि निर्धारित औषधि उसके स्वास्थ्य में सुधार करेगी। लेकिन यदि दवा में आवश्यक सक्रिय तत्व मौजूद न हों, उनकी मात्रा गलत हो अथवा उसमें हानिकारक पदार्थ मिले हों, तो उपचार प्रभावित हो सकता है। बीमारी बढ़ सकती है और मरीज को समय पर उचित उपचार नहीं मिल पाने का खतरा भी पैदा हो सकता है। विशेष रूप से गंभीर संक्रमण, कैंसर और अन्य जटिल बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए ऐसी धोखाधड़ी अत्यंत घातक परिणाम उत्पन्न कर सकती है।
 
इस कारोबार में शामिल लोग यह भूल जाते हैं कि दवा कोई सामान्य उपभोक्ता वस्तु नहीं है। इसका सीधा संबंध मनुष्य के स्वास्थ्य, परिवार की उम्मीदों और जीवन की सुरक्षा से है। किसी मरीज के परिजन कठिन परिस्थितियों में धन जुटाकर महंगी दवाएं खरीदते हैं। यदि उन्हीं दवाओं के नाम पर नकली उत्पाद बेच दिए जाएं, तो यह भरोसे का भी गंभीर उल्लंघन है। कुछ लोगों के आर्थिक लालच के कारण हजारों परिवारों की आशाओं को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे अपराध को केवल अवैध व्यापार मानकर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिक सुरक्षा से जुड़ी बड़ी समस्या के रूप में समझना होगा।
 
इंटरपोल के स्तर पर नकली दवाओं के विरुद्ध चलाए गए अंतरराष्ट्रीय अभियानों में भी दवाओं के नाम, पैकेजिंग और पहचान चिह्नों की नकल करके आपूर्ति किए जाने का मुद्दा सामने आता रहा है। विभिन्न देशों के बीच फैले नेटवर्क की जांच के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है। किसी एक देश में बैठे व्यक्ति द्वारा दूसरे देश से पैकेजिंग मंगवाना, तीसरे क्षेत्र में दवाएं तैयार करना और फिर अलग-अलग बाजारों में उनकी आपूर्ति करना जांच को जटिल बना देता है। इसलिए भारत की जांच एजेंसियों को संबंधित देशों के अधिकारियों, सीमा शुल्क विभाग, औषधि नियामकों और अंतरराष्ट्रीय पुलिस सहयोग तंत्र के साथ समन्वय बढ़ाना चाहिए। धन के स्रोत, संचार माध्यमों, आपूर्ति शृंखला और अंतिम खरीदारों तक पहुंचने वाले रास्तों की जांच भी जरूरी है।
 
दवा कंपनियों और नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है। दवाओं की पैकेजिंग पर ऐसे सुरक्षा चिह्न विकसित किए जाने चाहिए, जिनकी नकल करना कठिन हो। क्यूआर कोड की व्यवस्था केवल तभी उपयोगी होगी, जब उससे जुड़ी जानकारी सुरक्षित हो और उसकी सत्यता की जांच विश्वसनीय तरीके से की जा सके। दवा विक्रेताओं तथा अस्पतालों को अधिकृत आपूर्तिकर्ताओं से ही दवाएं खरीदनी चाहिए। संदिग्ध पैकेजिंग, असामान्य मूल्य, बिल की अनुपलब्धता अथवा आपूर्ति के संदिग्ध स्रोत को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। मरीजों को भी बिना चिकित्सकीय सलाह दवा बदलने के बजाय संदिग्ध उत्पाद मिलने पर संबंधित औषधि नियंत्रण अधिकारी को सूचित करना चाहिए।
 
कानून की कठोरता तभी प्रभावी साबित होगी, जब जांच समयबद्ध हो, सबूत मजबूत हों और दोषियों को सजा दिलाने में अनावश्यक देरी न हो। केवल छोटे विक्रेताओं या निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई करके ऐसे नेटवर्क को समाप्त नहीं किया जा सकता। उन लोगों तक पहुंचना आवश्यक है, जो धन उपलब्ध कराते हैं, विदेशी संपर्कों का संचालन करते हैं, नकली पहचान तैयार करते हैं और बाजार में आपूर्ति की व्यवस्था बनाते हैं। साथ ही निर्दोष व्यापारियों को अनावश्यक परेशान किए बिना वास्तविक दोषियों की पहचान करना भी जरूरी है।
 
सरकार को औषधि निरीक्षण व्यवस्था मजबूत करने, प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने और संदिग्ध दवाओं की त्वरित जांच के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए। अस्पतालों और दवा विक्रेताओं के स्तर पर भी नियमित सत्यापन की व्यवस्था विकसित होनी चाहिए। जब्त की गई दवाओं के नमूनों की जांच में तेजी लाई जाए और जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य को तत्काल खतरा हो, वहां लोगों को समय पर आधिकारिक चेतावनी दी जाए। अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े मामलों में विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन और राज्य पुलिस के बीच बेहतर तालमेल आवश्यक है।
 
नकली दवाओं का कारोबार करने वालों को यह स्पष्ट संदेश मिलना चाहिए कि धन कमाने के लिए मानव जीवन को जोखिम में डालना किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है। व्यापार में लाभ कमाना गलत नहीं, लेकिन जब लाभ का आधार धोखाधड़ी और मरीजों की मजबूरी बन जाए, तब कठोर कार्रवाई अनिवार्य हो जाती है। जीवन बचाने वाली दवाओं की शुद्धता और विश्वसनीयता से समझौता नहीं किया जा सकता। कर्नाटक में सामने आए मामले की निष्पक्ष और गहन जांच के साथ पूरे नेटवर्क को उजागर करना समय की मांग है। सरकार, जांच एजेंसियों, दवा उद्योग और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी मरीज की जिंदगी नकली दवा के कारण खतरे में न पड़े। मानव जीवन से बड़ा कोई मुनाफा नहीं और जनस्वास्थ्य से बड़ा कोई व्यावसायिक हित नहीं हो सकता।
 
कांतिलाल मांडोत

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