कविता/कहानी

केरल के हिंदी कवि डॉ. आनंदकृष्णन एडचेरी को मिलेगा डॉ. अंबेडकर कीर्ति सम्मान

जयपुर / राजस्थान - अखिल भारतीय कबीर मठ , सदगुरु कबीर आश्रम सेवा संस्थान बड़ी खाटू एवं डॉ. अंबेडकर प्रतिमा अनावरण सेवा समिति रोहिणी के संयुक्त तत्वाधान में 14 अप्रैल को नागौर जिले ( राजस्थान ) के रोहिणी में आयोजित...
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इल्जाम

एक इल्जाम  मेरे नाम आया है  न होते हुए भी मोहब्बत सरेआम  मेरा नाम आया है।      मैं ढूंढता रहा  हर जगह खुद को ही    न जाने क्यों   फिर भी मेरा नाम किसी ओर के साथ आया है।    लोग पूछते रहे...
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कविता - रिश्वतखोरी-शर्मसार करते रिचार्ज

रिश्वतखोरी-शर्मसार करते रिचार्ज...!    अंतिम सांस गिन रहीं हैं इंसानियत, रिश्वतखोरों की पौ बारह वहशियत। मौत मुनाफे की दुकानों पे नाच रहीं, दुनिया भयानक उत्सव देखती रहीं।    यह बेंगलुरु की हृदयविदारक घटना, इससे किसी का ध्यान नहीं हैं हटना। समाज की...
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'बजट' अच्छा या बुरा...!

देश में पेश हो चुका है आम केंद्रीय बजट, हर बार 'राजनीतिक प्रतिक्रिया' हैं विकट। कोई भी दल हटकर क्यों? नहीं बोल पाते, सत्तापक्ष और विपक्ष भिन्न दिशा में जाते।    सत्तापक्ष बजट को उपलब्धियों से गिनाते, विपक्ष 'जनविरोधी और दिशाहीन'...
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संस्कृत की उत्तराधिकारी: हिंदी का ऐतिहासिक सफर

   हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की हजारों वर्षों की सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक चेतना का एक जीवंत दस्तावेज है। भारोपीय (Indo-European) भाषा परिवार की 'हिंद-आर्य' शाखा से संबंधित हिंदी, आज विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली...
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आधा-अधूरा बचपन

संजीव-नी।आधा-अधूरा बचपन।ईश्वर, आज स्कूल की घंटी से पहलेएक बच्चे नेरोटी की आवाज़ सुनी,पर थाली तकआवाज़ नहीं पहुँची।उसकी जेब मेंकंचे नहीं,था खालीपन ,और पेट मेंइतनी जगहकि सपना भीपूरे...
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कविता

संजीव-नी।मंगलू ने पी शराब,तब से हुई किस्मत खराब।मंगलू कभीअपने नाम जैसा सीधाहाथों में मेहनत,आँखों में भरोसा था,और घर मेंरोटी की खुशबू रहतीफिर एक दिननशे की बोतल नेउसे दोस्त कहा...
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ऊँचाइयों पर कभी परवाने नहीं होते”

ऊँचाइयों पर कभी परवाने नहीं होते”ऊँचाइयों पर कभी परवाने नहीं होते,आसमान पर ठौर-ठिकाने नहीं होते।कदम सम्भल कर उठाना मेरे दोस्त,कम खंजर चलाने वाले नहीं होते।ख़ुद की शोहरत, ख़ुद को ही भाती है,यहाँ नफ़रत के...
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क्यों गुलाबों की तरह महकते नहींl

संजीव-नी।क्यों गुलाबों की तरह महकते नहींlक्यों गुलाबों की तरह महकते नहीं,क्यूँ बहारों के साथ चहकते नहीं।दफ़्न हो रही है तमन्ना-ए-मोहब्बत,क्यूँ फ़िज़ाओं में अब वो रहते नहीं।मर जायेगा आशिक़ तनहा होकर,क्यूँ...
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अभी भी मिट्टी की खुशबू बची है।

संजीव-नीl अभी भी मिट्टी की खुशबू बची है।लोहे और सीमेंट के अनंत फैलते जंगल मेंएक छोटा सा कोना अब भी साँस लेता जहाँ पौधों की कुछ टहनियाँधूल में हरियाली का सपना बुनती।पत्ते जो धूप नहीं देखते,...
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गरीबी-मुक्त भारत का सपना, केरल ने दिखाया रास्ता

[गरीबी के पार: नव केरल का उज्ज्वल घोष] [केरल ने कर दिखाया: सपनों की धरती अब गरीबी से मुक्त] केरल की पावन धरती, जहां नारियल के हरे-भरे बागान समुद्र की लहरों से आलिंगन करते हैं...
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मजदूर का बहता पसीना ही संगीत। 

मजदूर का बहता पसीना ही संगीत।     कितनी बार देखा मैंने उसके माथे से फिसलती एक बूँद धरती पर गिरकर बज उठती  जैसे कोई पुराना राग भैरवी, या फिर किसी अधूरे सपने का आलाप।     वह हथौड़ा नहीं चलाता, वह एक तान...
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