कविता/कहानी
कविता/कहानी  साहित्य/ज्योतिष 

राहु 

राहु  राहु     राहु हूँ  नई राह दिखता हूँ। पथ पर अग्रसर कर  अपार सफलता दिलवाता हूँ। कर्म बुरे करते तो  रोग, शत्रुता और ऋण बढ़ाता हूँ। शुभ कर्मो पर धनार्जन के नये मौके दिखलाता हूँ। शुक्र, शनि, बुध मित्रों संग  मिलकर...
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संजीव-नी।

संजीव-नी। प्यारी मां तेरी जैसी l    हर किसी की माँ हो, माँ हो मेरी जैसी, हर नारी लगती प्यारी मुझे मां जैसीl    रोटी के इंतजाम में गई मां की बाट जोहता, लौटती हर औरत लगती शाम उसे मां जैसी।    मां मेरी...
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संजीव-नी।

संजीव-नी।    ।प्राकृतिक विभीषिका ।    हवा में जहर  मन में विषैला पन  आखिर क्या है इसकी परिणति  और भविष्य, प्राकृतिक विभीषिका, लाखों बच्चों बुजुर्गों की कर दी खत्म इह लीला, प्रकृति की अनुपम देन जल,वायु और हरियाली हमने मलिन इरादों से  कर...
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संजीवनी।

संजीवनी। संजीवनी।    याद आती है।    याद आती है जिनकी मधुर सुगंध, समा गई सांसों और रग रग में।    याद आती है वह रतिया जो बस गई आंखों की मुंदी हुई मेरी पलकों में।    और याद आते हैं अधर सुमधुरस जिनका रस...
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संजीव-नी ।

संजीव-नी । ईश्वर का हर पल करो वंदन अभिनंदन।    जरा विचार कीजिए आपके पसंद करने न करने से  मैं आदमी न रहकर  छोटा जीव जंतु या चौपाया  हो जाऊंगा , और आपकी पसंदगी से  मैं आदमी से ईश्वर  हो जाऊंगा  या मेरी...
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संजीव-नी।

संजीव-नी। महिला शक्ति को प्रणाम।    कम ना समझो  महिलाओं की शक्ति को, मां दुर्गा के प्रति  इनकी भक्ति को।  नारी के जीवन के कई आयाम करते उनको नमन और प्रणाम।    दुश्मनों का नाश  करती मां भवानी अलौकिक अद्भुत है  नारी हिंदुस्तानी।...
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संजीव-नी।।

संजीव-नी।। ईर्ष्या से कभी स्नेह का रिश्ता नही बनता ,    ईर्ष्या से कभी स्नेह का रिश्ता नही बनता , लोभ से कभी सच्चा रिश्ता नही बनता।    जहां राग, द्वेष और दुश्मनी व्याप्त हो, ऐसे में कोई निस्वार्थ रास्ता नही बनता।   कौन...
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संजीव-नी।

संजीव-नी। ग़ुज़री तमाम उम्र उसी शहर में कोई जानता न था  वाक़िफ़ सभी थे,पर कोई पहचानता न था..    पास से हर कोई गुजरता मुस्कुराता न था, मेरे ही शहर में लोगों को मुझ से वास्ता न था।    मेरे टूटे घर में...
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संजीव-नी|

संजीव-नी| कितने कितने हिंदुस्तान ? नल पर अकाल की व्यतिरेक ग्रस्त जनानाओं की आत्मभू मर्दाना वाच्याएं। एक-दूसरे के वयस की अंतरंग बातों,  पहलुओं को सरेआम निर्वस्त्र करती,  वात्या सदृश्य क्षणिकाएं, चीरहरण, संवादों से  आत्म प्रवंचना, स्व-स्तुति, स्त्रियों के अधोवस्त्रों में झांकती...
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संजीवनी।

संजीवनी। हमने तनहाइयों को अपना हमसफर बना लिया।    हमने अजनबीयों से मिलकर एक घर बना लिया, बिखरे पत्तों टहनियों से एक सजर बना लिया।    लाख मिन्नतें भी हमारी काम ना आई उन पर, हमने कैनवास पर रंगों का हसीन मंजर बना...
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संजीव-नी|

संजीव-नी| उजालों में जो दूर से लुभाते हैं|    उजालों में जो दूर से लुभाते हैं, रात को वो ही ख़्वाबों में आते हैं |    कोई कतई मज़बूरी नहीं आदत है, हम तो सदैव ग़मों में भी मुस्कुरातें हैं|    तेरा तसव्वुर पानें...
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फिर हम बैठेंगे अनशन पर

फिर हम बैठेंगे अनशन पर (व्यंग)-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर,फिर हम बैठेंगे अनशन परकुछ बड़ा तो होने दो।अभी तो ये पहली बारिसकुछ पॉस इलाaके उर बस डूबीदिल्ली आधी पूरी डूबेयमुना में कुछ बाढ़़ तो आने दोहरियाणा ने...
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