About Us

मीडिया आज के दौर मे  राजनीति,पैसाटारगेट रेटिंग प्वाइंट (TRP) और सस्ती लोकप्रियता  (LIKE) की चकाचौंध  के पीछे जा रही है। जनता से जुड़ी समस्याएं,

क्या मीडिया मे उचित स्थान पा रही हैं? 

पत्रकारो की आज़ादी की लड़ाई मे जो भूमिका थी, क्या आज  उसका कुछ प्रतिशत मौजूद है? 

क्या हम समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर सही खबर देख पा रहे हैं? 

क्या इन खबरो का एक आम आदमी या देश की जनता से कोई सरोकार है? 

क्या हमारे देश मे किसान,जवान,अंतिम ग़रीब ब्यक्ति का इन माध्यमों द्वारा  बिना टी0आर0पी0 (TRP) और लोकप्रियता (LIKE) को नज़र मे रखकर दिखाया जा रहा है? 

अगर नही! तो अब वक्त आ चुका है, कि हमे ऐसे साधन की तलाश करनी होगी जहा पे सामूहिक रूप से चर्चा करने का अवसर प्राप्त हो सके। समय परिवर्तन का है तो हमे बहुत ही सूझ-बूझ से समाज और राष्ट्रीय हित मे अपने स्वतंत्र विचार को आगे लाना होगा और अपने से यह सवाल करना होगा कि आखिर ये क्यों हो रहा है? 

आज मीडिया की विश्वसनीयता लोकतंत्र की प्रगति के साथ मजबूत शक के दायरे में है? मीडिया और लोकतंत्र के अन्य संस्थानों के बीच सामंजस्य का अभाव है और सकारात्मकता के नाम पर समझौता किया गया है।

अस्सी के दशक के दौरान,  महान संपादकों के बीच मजबूत बंहस थी, कि क्या मीडिया एक मिशन या पेशा होना चाहिए? नब्बे के दशक में, बंहस ने एक अलग मोड़ ले लिया, कि क्या मीडिया होना चाहिए धर्मनिरपेक्ष या तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवादी और हिंदुत्व उन्मुख? इसके साथ ही उच्च जाति के पूर्वाग्रह और अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व के बंहस भी विभिन्न स्तरों पर उभरे।

यदि आपातकाल  मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी तो मीडिया ने कार्रवाई की भावी दिशा को आकार प्रदान किया, नब्बे के दशक में इसने मंदिर और वैश्वीकरण के रूप में महान मंथन अंक को कलमबद्ध किया। बीसवीं सदी विचारधाराओं की न्यूनतम हैंग ओवर के साथ मीडिया के लिए इक्कीसवीं सदी को आमंत्रित किया।

जिसमे नई उम्मीद कि अलख जागी है। वास्तव में, हमे  विचारधारा, इतिहास का अंत और सभ्यता के उभरते हुए टकराव के आखिरी में देखा जाता है।

इक्कीसवीं सदी में, मीडिया क्रोनी कैपिटलिज्मसांप्रदायिकता और पहचान की राजनीति की बढ़ती असहिष्णुता के रूप में बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है। यही कारण है कि या तो मीडिया कॉरपोरेट शक्तियों के अधीन है अथवा राजनीतिक ताकतों मे निहित स्वार्थ होने के कारण  अपनी स्वतंत्रता का आत्मसमर्पण कर दिया है या उनके साथ मिलीभगत कर लिया है।

इसके अलावा, कॉर्पोरेट ईमानदारी और लोगों के हित के नाम पर विभिन्न राजनीतिक मोर्चों का गठन किया है और वे मीडिया को नियंत्रित करते हैं।  जाति, लिंग, और आर्थिक पूर्वाग्रह के रूप में अन्य कुरीतियाँ मीडिया के सामने अभी भी लोकतांत्रिक स्वतन्त्रता  को चुनौती देने के लिए मौजूद है।

लेखकों, कलाकारोंसाहित्यकारों तथा मीडिया के लोगों के पास सच बताने के लिए अधिकार हैं और यही उनका सच्चा कर्तब्य भी है। किन्तु आज मीडिया भी उदारीकरण का हिस्सा बन चुका है जो मीडिया की क्षमता और प्राथमिकताओं को एक नया आयाम प्रदान कर चुका है। ऐसे ही स्वतंत्र विचारों का नया विहान लेकर आया है स्वतंत्र प्रभात मीडिया।

स्वतंत्र प्रभात मीडिया एक ईमानदारी युक्त, स्वच्छ, राष्ट्र हित के अनुकूल पत्रकारिता मे विश्वास करता है तथा हमेशा यह प्रयास करता रहेगा कि गरीब, राष्ट्रीय योजना से वंचित,प्रशासनिक भ्रष्टाचार और अफसरशाही  के शिकार मज़लूमों कि मदद कि जा सके

और उनसे संबन्धित समस्याएँ सरकार और शासन के संज्ञान मे खबर के माध्यम से लाया जा सके। जिससे देश के हित मे लोक कल्याण संभव हो सके।

जय हिन्द।

 

स्वतंत्र प्रभात मीडिया