जब संजय मिश्रा ने एक्टिंग छोड़ ढाबे पर बनाया ऑमलेट, फिर ऐसे हुई फिल्मों में वापसी

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मुंबई। बॉलीवुड में कई कलाकार ऐसे हैं, जो अपने अभिनय से दर्शकों के दिल में खास जगह बना लेते हैं। संजय मिश्रा भी ऐसे ही अभिनेताओं में शामिल हैं। कॉमेडी से लेकर गंभीर और संवेदनशील किरदारों तक उन्होंने अपनी अदाकारी का अलग रंग दिखाया है। ‘गोलमाल’, ‘धमाल’, ‘वध’, ‘भूल भुलैया’ और ‘आंखों देखी’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को दर्शकों ने खूब पसंद किया। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके जीवन में एक ऐसा दौर भी आया था, जब उन्होंने फिल्मी दुनिया से पूरी तरह दूरी बना ली थी और ऋषिकेश के एक ढाबे पर काम करने लगे थे।

NSD से शुरू हुआ अभिनय का सफर

6 अक्टूबर 1963 को जन्मे संजय मिश्रा का बचपन वाराणसी में बीता। अभिनय के प्रति रुचि उन्हें दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा तक ले गई, जहां से उन्होंने 1989 में ग्रेजुएशन पूरा किया। इसके बाद उन्होंने थिएटर और टेलीविजन के माध्यम से अभिनय की दुनिया में अपनी पहचान बनानी शुरू की।

फिल्मों में उनका शुरुआती सफर ‘ओह डार्लिंग! ये है इंडिया!’ से शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने ‘सत्या’, ‘दिल से..’, ‘वजूद’, ‘राजकुमार’ और ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ जैसी फिल्मों में काम किया। धीरे-धीरे उन्होंने यह साबित किया कि वह सिर्फ कॉमेडी ही नहीं, बल्कि अलग-अलग तरह के किरदारों को भी प्रभावी ढंग से निभा सकते हैं।

पिता के निधन के बाद लिया बड़ा फैसला

संजय मिश्रा की जिंदगी में उस समय बड़ा बदलाव आया, जब उनके पिता का निधन हुआ। इस घटना ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। उन्होंने फिल्मी दुनिया और मुंबई की भागदौड़ से खुद को अलग करने का फैसला किया।

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इसके बाद वह ऋषिकेश चले गए। यहां उन्होंने एक ढाबे पर काम करना शुरू कर दिया। वह वहां आने वाले ग्राहकों के लिए ऑमलेट तक बनाया करते थे। एक स्थापित अभिनेता से ढाबे पर काम करने तक का यह सफर उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उस समय वह फिल्मी पहचान से दूर एक साधारण जिंदगी जीना चाहते थे।

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लोग पहचानते थे, लेकिन संजय मिश्रा करते थे इनकार

ऋषिकेश के ढाबे पर काम करने के दौरान कई बार ऐसा भी हुआ कि वहां आने वाले लोगों ने उन्हें पहचान लिया। कुछ लोग उनसे पूछते थे कि क्या वह वही संजय मिश्रा हैं, जिन्होंने ‘गोलमाल’ में काम किया है।

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हालांकि, वह अपनी पहचान स्वीकार करने के बजाय मजाकिया अंदाज में खुद को उस अभिनेता का हमशक्ल बताते थे। शायद वह उस दौर में अपने पुराने फिल्मी जीवन से पूरी तरह दूरी बनाए रखना चाहते थे।

रोहित शेट्टी ने फिर फिल्मों की ओर लौटाया

संजय मिश्रा की जिंदगी में दोबारा फिल्मी मोड़ तब आया, जब निर्देशक रोहित शेट्टी ने उन्हें वापस फिल्मों में आने के लिए तैयार किया। इसके बाद उन्हें ‘ऑल द बेस्ट’ में काम करने का मौका मिला।

इस फिल्म के बाद संजय मिश्रा का करियर एक बार फिर गति पकड़ने लगा। धीरे-धीरे वह बड़े पर्दे पर लगातार नजर आने लगे और उनकी अभिनय क्षमता को दर्शकों के साथ-साथ फिल्म समीक्षकों ने भी पहचान दी।

कॉमेडी से लेकर गंभीर किरदारों तक छोड़ी छाप

‘गोलमाल: फन अनलिमिटेड’ और ‘धमाल’ जैसी फिल्मों में संजय मिश्रा ने अपने हास्य अभिनय से दर्शकों को खूब गुदगुदाया। वहीं ‘आंखों देखी’ जैसी फिल्म में उन्होंने बेहद गंभीर और संवेदनशील किरदार निभाकर यह दिखाया कि उनकी अदाकारी किसी एक शैली तक सीमित नहीं है।

‘आंखों देखी’ में उनके अभिनय को व्यापक सराहना मिली और इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। ढाबे पर आम जिंदगी जीने से लेकर हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाने तक संजय मिश्रा की कहानी इस बात की मिसाल है कि जिंदगी में मुश्किल दौर आने के बावजूद वापसी का रास्ता हमेशा खुला रहता है।

 

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