अपनी अपनी नहीं, अपनों के साथ मनाएं - दीपावली

ऐसे में कुटुंब के अन्य सदस्यों के प्रति अपनत्व और आत्मीयता की भावना कैसे विकसित होगी?

हर्षिता यादव  Picture
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दुनिया का सबसे बड़ा पर्व दीपावली भारत सहित दुनियाभर के अनेक देशों में मनाया जाता है। दीपावली के त्योहार का आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक महत्व है। यही वजह है कि भारत सहित दुनिया के करोड़ों लोगों को हर वर्ष दीपावली के पर्व का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। वर्तमान आधुनिकता के इस दौर में जहाँ हर चीज का स्वरूप आधुनिक और स्मार्ट होता जा रहा है, वहीं धार्मिक एवं सामाजिक त्योहार भी आधुनिकता के प्रभाव से अछूते नहीं रह पाए हैं। आज भारत के त्योहार हों या दुनिया के अन्य देशों के पर्व, सभी पर आधुनिकता का आवरण चढ़ता जा रहा है।

इसके परिणामस्वरूप आधुनिक युग की स्मार्ट पीढ़ी त्योहारों के पौराणिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व से अनजान होती जा रही है। दुनिया जैसे जैसे आधुनिक और स्मार्ट होती जा रही है, वैसे वैसे मानव अकेला होता जा रहा है। इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता। आधुनिकता के इस स्मार्ट युग में मानव हजारों लाखों किलोमीटर की दूरी को स्मार्टफोन की वीडियो कॉल के माध्यम से समेटकर अपनों को हर वक्त दिल के करीब तो रखता है, लेकिन विडंबना यह है कि आज भारत सहित पूरी दुनिया में इंसान अपने ही घर में अपनों के बीच एकाकी होता जा रहा है। यह स्थिति सामाजिक दृष्टि से सभी के लिए गंभीर चिंतन का विषय होनी चाहिए।

आज की स्मार्ट दुनिया में मानव के अपनों से एकाकी होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम धार्मिक और सामाजिक मूल्यों पर आधारित भारत जैसे देश में देखने को मिल रहा है, जहाँ युगों युगों से चली आ रही वसुधैव कुटुंबकम की परंपरा खंडित होकर हर दिन टुकड़ों में बिखरती जा रही है। भारत में कभी गाँव गाँव और गली गली तक वसुधैव कुटुंबकम की भावना कायम थी। उस दौर में त्योहारों की रौनक और उनकी मिठास महीनों तक लोगों के दिलों में बसी रहती थी। लेकिन जैसे जैसे भारतीय परिवारों में आधुनिकता का रंग चढ़ा और वसुधैव कुटुंबकम् की भावना कमजोर होने लगी, वैसे वैसे कुटुंब कहलाने वाले परिवारों में 'तेरा-मेरा' की भावना बढ़ती गई।

परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार तेजी से टूटने लगे और आज के आधुनिक युग में घर-परिवार की परिभाषा पति-पत्नी और बच्चों तक सिमटकर रह गई है। विडंबना देखिए कि आधुनिकता के इस दौर में मानव ने ईंट, सीमेंट और सरिये से बड़े-बड़े आलीशान आशियाने तो बना लिए, लेकिन उनमें पत्नी और बच्चों के अलावा किसी दूसरे के लिए जगह ही नहीं बची। यहाँ तक कि कबूतरों और चिड़ियों के लिए भी स्थान नहीं है। ऐसे में कुटुंब के अन्य सदस्यों के प्रति अपनत्व और आत्मीयता की भावना कैसे विकसित होगी?

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आज भारत में अधिकांश लोग त्योहार भी अपनी-अपनी दुनिया में सिमटकर मनाते दिखाई देते हैं। बड़ी-बड़ी ऊँची इमारतों को त्योहारों के अवसर पर दिखावे के लिए खूब सजाया जाता है, लेकिन उन इमारतों के भीतर से पारिवारिक मिठास और अपनत्व की खुशबू नदारद रहती है। देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो हर त्योहार अपने घर परिवार और माता पिता से दूर रहकर अलग अलग मनाते हैं। इतना ही नहीं, सोशल मीडिया पर रीलों के माध्यम से त्योहारों को धूमधाम से मनाने का दिखावा भी करते हैं, जबकि वास्तविकता में अपनों के बीच दूरियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं।

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भारत में प्रत्येक त्योहार को मनाने के पीछे मूल उद्देश्य पारिवारिक एकजुटता, आपसी प्रेम और अपनों के विश्वास को बनाए रखना रहा है। अनादिकाल से यहाँ त्योहार वसुधैव कुटुंबकम की भावना को मजबूत करने के उद्देश्य से मनाए जाते रहे हैं। त्योहारों के अवसर पर पूरे कुटुंब के सदस्य एक छत के नीचे एकत्रित होते थे, एक ही चूल्हे पर बना भोजन साथ बैठकर खाते थे और आपसी प्रेम एवं आत्मीयता को मजबूत करते थे। देश के सबसे बड़े त्योहार दीपावली का मूल उद्देश्य भी दिलों को जोड़कर एकजुटता और खुशियों का प्रकाश फैलाना है।

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आधुनिक युग के हाईटेक और शिक्षित मानव को यदि अपना एकाकीपन और मानसिक तनाव दूर करना है, तो उसे अपनी अपनी दुनिया में अकेले त्योहार मनाने की प्रवृत्ति छोड़कर अपने घर परिवार और बड़े बुजुर्गों के साथ त्योहार मनाने की परंपरा को फिर से जीवित करना होगा। फिर देखिए, कैसे बिना कृत्रिम रोशनी के भी घर ही नहीं, बल्कि हर दिल जगमगा उठेगा।

दीपावली का पर्व भी यही संदेश लेकर आता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम के चौदह वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या लौटने पर केवल अयोध्या का राजमहल ही नहीं, बल्कि पूरी नगरी दीपों से जगमगा उठी थी। चौदह वर्षों से श्री राम की प्रतीक्षा में सूने पड़े हर हृदय में उनके आगमन की आशा ने खुशियों का उजाला भर दिया था। चारों ओर उत्साह और उमंग का वातावरण छा गया था। तभी से दीपावली अपनों के घर लौटने, बिछड़ों के मिलने और परिवार के साथ खुशियाँ बाँटने का पर्व बन गई। आज की दीपावली भी हमें रिश्तों में आत्मीयता और अपनत्व की रौनक बढ़ाने का संदेश दे रही है।

इसलिए आइए, इस बार अपनी-अपनी दीपावली मनाने के बजाय अपनों के साथ दीपावली मनाएँ। घर के उन बुजुर्गों के पास बैठें, जिनकी आँखें उम्र के साथ धुँधली और प्रतीक्षा में उदास होती जा रही हैं। उनके साथ कुछ पल बिताए, उनके चेहरे पर मुस्कान लाएँ और उनके सूने होते जीवन में खुशियों की ऐसी रोशनी भर दें कि घर की वे बूढ़ी आँखें फिर से चमक उठें। क्योंकि दीपावली का सच्चा अर्थ केवल घरों को दीपों और बिजली की रोशनी से सजाना नहीं, बल्कि अपनों के जीवन में प्रेम, विश्वास, सम्मान और आत्मीयता का उजाला फैलाना है। सच्चे अर्थों में दीपावली का यही महत्व और यही संदेश है।

अरविंद रावल

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