फीचर्ड

कमजोर विपक्ष, लोकतंत्र के लिए बढ़ती चुनौती

Abhinav Shukla Picture
Published On

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने, सरकार बनाने और बहुमत के आधार पर शासन चलाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक ताकत इस बात में छिपी होती है कि सत्ता से सवाल पूछने की कितनी आजादी है, सरकार की नीतियों की आलोचना कितनी निर्भीकता से हो सकती है और जनता की आवाज सत्ता के गलियारों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार जितनी महत्वपूर्ण होती है, विपक्ष की भूमिका भी उतनी ही आवश्यक होती है। सरकार देश चलाती है तो विपक्ष सरकार को उसकी जिम्मेदारियों का एहसास कराता है। यही संतुलन लोकतंत्र को जीवंत और जवाबदेह बनाए रखता है।

लेकिन जब लोकतंत्र में विपक्ष कमजोर होने लगता है, उसकी आवाज को महत्व नहीं मिलता, उसके सवालों को राजनीतिक विरोध समझकर खारिज कर दिया जाता है और संसद से लेकर विधानसभा तक बहस की जगह आरोप-प्रत्यारोप का वातावरण बनने लगता है, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो जाती है। सबसे बड़ा खतरा यह होता है कि सत्ता धीरे-धीरे जवाबदेही से मुक्त होने का प्रयास करने लगती है। यही स्थिति आगे चलकर निरंकुश प्रवृत्तियों को जन्म दे सकती है।

लोकतंत्र में जनता किसी राजनीतिक दल को बहुमत देकर सरकार चलाने का अधिकार देती है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि सरकार को हर निर्णय बिना सवाल और बिना जवाबदेही के लेने की छूट मिल गई है। बहुमत शासन चलाने का संवैधानिक अधिकार देता है, मनमानी करने का लाइसेंस नहीं। सरकार के प्रत्येक निर्णय का परीक्षण होना चाहिए। उसकी नीतियों पर चर्चा होनी चाहिए। यदि कोई फैसला जनविरोधी है, आर्थिक रूप से नुकसानदेह है या समाज के किसी वर्ग के हितों को प्रभावित करता है तो विपक्ष को उस पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार होना चाहिए। यही संसदीय लोकतंत्र की खूबसूरती है।

विपक्ष का काम केवल सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार को बेहतर काम करने के लिए विवश करना भी है। यदि विपक्ष तथ्यों और तर्कों के आधार पर सरकार की गलतियों को सामने लाता है तो अंततः उसका लाभ जनता को ही मिलता है। अक्सर राजनीतिक बहस में विपक्ष की कमजोरी को केवल राजनीतिक दलों की समस्या मान लिया जाता है, जबकि इसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है। जब विपक्ष प्रभावी नहीं होता तो महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याओं, महिलाओं की सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर सरकार से लगातार जवाब मांगने वाला मजबूत राजनीतिक मंच कमजोर पड़ जाता है।

चुनाव आते ही भाषा की मर्यादा का पतन क्यों? Read More चुनाव आते ही भाषा की मर्यादा का पतन क्यों?

ऐसी स्थिति में जनता की समस्याएं धीरे-धीरे राजनीतिक प्राथमिकताओं से बाहर होने लगती हैं। चुनाव के दौरान किए गए वादों और सत्ता में आने के बाद किए गए कामों के बीच अंतर पर चर्चा कम होने लगती है। सरकारी योजनाओं की कमियों और प्रशासनिक विफलताओं को उजागर करने वाली आवाजें कमजोर पड़ती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि विपक्ष ही जनता का एकमात्र प्रतिनिधि है, बल्कि यह कि विपक्ष लोकतंत्र में जनता की असहमति को संस्थागत और राजनीतिक अभिव्यक्ति देने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

ई-100 ईंधन से हरित क्रांति की नई राह लेकिन वाहनधारकों की चिंताएं बरकरार Read More ई-100 ईंधन से हरित क्रांति की नई राह लेकिन वाहनधारकों की चिंताएं बरकरार

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसकी संसदीय व्यवस्था है। संसद और विधानसभाओं का गठन केवल विधेयक पारित कराने या सरकार के बहुमत का प्रदर्शन करने के लिए नहीं हुआ है। ये संस्थाएं देश और प्रदेश की समस्याओं पर गंभीर बहस करने, सरकार की नीतियों की समीक्षा करने और जनहित के मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए बनी हैं। लेकिन जब सदनों में सार्थक बहस की जगह हंगामा, व्यक्तिगत आरोप और राजनीतिक टकराव हावी होने लगते हैं, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा प्रभावित होती है। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि विपक्ष की आपत्तियां हर बार बाधा नहीं होतीं। कई बार उन्हीं आपत्तियों से किसी कानून की खामियां सामने आती हैं और उसमें सुधार का रास्ता खुलता है।

पीओके में पाक सेना के खिलाफ उबाल जनता की आवाज दबाने के आरोपों से बढ़ा तनाव Read More पीओके में पाक सेना के खिलाफ उबाल जनता की आवाज दबाने के आरोपों से बढ़ा तनाव

इसी तरह विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। केवल सदन की कार्यवाही बाधित करना या हर सरकारी निर्णय का विरोध करना उसकी सार्थक भूमिका नहीं हो सकती। उसे वैकल्पिक नीतियां, ठोस सुझाव और जनहित से जुड़े मुद्दों पर गंभीर दृष्टिकोण प्रस्तुत करना होगा।

लोकतंत्र में सत्ता का स्वभाव जवाबदेही से जुड़ा होना चाहिए। जब कोई सरकार लगातार चुनाव जीतती है तो उसके भीतर यह धारणा विकसित होने का खतरा रहता है कि जनता का समर्थन उसे हर निर्णय के लिए स्वतः सही साबित करता है। जबकि लोकतंत्र में चुनावी जीत किसी सरकार को पांच साल तक जनता के सवालों से बचने का अधिकार नहीं देती।

          दूसरी ओर विपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उसे अपनी राजनीतिक कमजोरियों, आपसी मतभेदों और नेतृत्व संबंधी असमंजस से बाहर निकलना होगा। जनता के सामने केवल सत्ता परिवर्तन का सपना रखने से काम नहीं चलेगा। उसे यह भी बताना होगा कि सत्ता मिलने पर वह रोजगार कैसे पैदा करेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में क्या सुधार करेगा, भ्रष्टाचार पर कैसे अंकुश लगाएगा और आम आदमी की आर्थिक परेशानियों को किस तरह कम करेगा। जनता को केवल विरोध की राजनीति नहीं, बल्कि विकल्प की राजनीति चाहिए। विपक्ष जितना जिम्मेदार, संगठित और जनसमस्याओं के प्रति संवेदनशील होगा, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राजनीतिक और सामाजिक महत्व वाले राज्य में विपक्ष की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारियों के बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सामने जनता का विश्वास जीतने की चुनौती है।

 

About The Author

Post Comments

Comments

नवीनतम समाचार