चंद्र दर्शन के साथ संपन्न हुई करवा चौथ की पूजा, घर-आंगन में छाई खुशियां

पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य जीवन के लिए महिलाओं ने रखा व्रत, पारंपरिक रीति-रिवाजों से मनाया पर्व 

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स्वतंत्र प्रभात संवाददाता 
 
उतरौला (बलरामपुर)
 
पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी दांपत्य जीवन की मंगलकामना के साथ उतरौला नगर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में करवा चौथ का पर्व श्रद्धा और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। सुहागिन महिलाओं ने पूरे दिन निर्जला उपवास रखकर भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और चंद्रदेव की पूजा-अर्चना की। रात में चंद्रमा के दर्शन के बाद अर्घ्य अर्पित कर पति के हाथों जल ग्रहण किया और व्रत का पारण किया।
 
करवा चौथ का व्रत भारतीय परंपरा में दांपत्य प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व से जुड़ी पौराणिक कथाएं भी महिलाओं की अटूट श्रद्धा और संकल्प का संदेश देती हैं। प्रचलित कथा के अनुसार, वीरवती नाम की एक पतिव्रता स्त्री ने अपने पति की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था। भूख-प्यास से व्याकुल बहन को देखकर उसके भाइयों ने छलपूर्वक पेड़ के पीछे दीपक जलाकर चंद्रमा निकलने का भ्रम पैदा कर दिया। वीरवती ने उसे चंद्रमा समझकर अर्घ्य दे दिया और भोजन कर लिया। इसके बाद उसके पति की मृत्यु का समाचार मिला। कथा के अनुसार, वीरवती ने कठोर तप और सच्ची श्रद्धा से अपने पति को पुनर्जीवन दिलाया। तभी से इस व्रत को अखंड सौभाग्य की कामना से जोड़कर देखा जाता है।
 
एक अन्य प्रचलित कथा में पतिव्रता करवा का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि करवा ने अपने पति की रक्षा के लिए यमराज तक का सामना किया था। उनकी निष्ठा और साहस को नारी के संकल्प तथा दांपत्य प्रेम का उदाहरण माना जाता है।
 
पर्व के अवसर पर सुबह से ही घरों में तैयारियां शुरू हो गई थीं। महिलाओं ने पारंपरिक परिधान और सोलह शृंगार से सजकर पूजा की थालियां तैयार कीं। दिन में समूहों में करवा चौथ की कथा सुनी और एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं दीं। शाम को चांद निकलने की प्रतीक्षा के बीच घरों की छतों और आंगनों में विशेष रौनक रही। चंद्रमा के दर्शन कर छलनी से पति का चेहरा देखने, अर्घ्य देने और पति के हाथों जल ग्रहण करने के बाद महिलाओं ने अपना उपवास खोला।
 
नगर के विभिन्न मोहल्लों, बाबा फक्कड़ दास चौराहा, अलावलपुर, बाबा दुःखहरण नाथ मंदिर और हाटन रोड क्षेत्र में पर्व की रौनक दिखाई दी। बाजारों में मेहंदी, सौंदर्य प्रसाधन और पूजन सामग्री की दुकानों पर भी चहल-पहल रही। पूरे आयोजन में आस्था, पारिवारिक अपनत्व और उत्सव का माहौल बना रहा।
 
संपादकीय ध्यान: वीरवती और करवा की कथाएं पौराणिक लोकपरंपरा में प्रचलित हैं। इन्हें ऐतिहासिक घटना के बजाय धार्मिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
 
 

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