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सूरत में झोलाछाप डॉक्टरों का जाल आखिर कब टूटेगा
"बिना मेडिकल डिग्री वर्षों से चला रहे क्लीनिक गरीब मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वालों को गिरफ्तारी नहीं कठोर सजा मिलने से रुकेगा अवैध कारोबार"
चिकित्सा का पेशा केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि मानव जीवन बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। डॉक्टर बनने के लिए वर्षों की पढ़ाई, प्रशिक्षण और कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। इसके बावजूद गुजरात के औद्योगिक शहर सूरत में ऐसे लोगों की संख्या लगातार सामने आ रही है, जिनके पास मान्य मेडिकल डिग्री नहीं है, लेकिन वे बाकायदा डॉक्टर बनकर क्लीनिक चला रहे हैं। मरीजों को दवाइयां देते हैं, इंजेक्शन लगाते हैं और बीमारियों का उपचार करते हैं। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि आम नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ है। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की लगातार छापेमारी ने इस अवैध कारोबार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसे उजागर कर दिया है।
अक्टूबर महीने में सूरत में हुई कार्रवाइयों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 14 अक्टूबर को पांडेसरा में पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम ने 16 कथित झोलाछाप डॉक्टरों को पकड़ा था। उनके कब्जे से 1.82 लाख रुपये की दवाइयां और चिकित्सा उपकरण जब्त किए गए थे। इससे पहले 16 सितंबर को पांडेसरा में आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया था। उनके यहां से 98,825 रुपये का सामान जब्त हुआ था। वहीं 11 सितंबर को पांडेसरा में दो अन्य कथित फर्जी डॉक्टरों को पकड़ा गया था। इन दोनों के क्लीनिक से लगभग 47 हजार रुपये का सामान जब्त किए जाने की खबर सामने आई थी। इस प्रकार सितंबर और अक्टूबर में सामने आई इन तीन कार्रवाइयों में ही 26 लोगों को पकड़े जाने की जानकारी सार्वजनिक हुई थी।
इसके बाद 29 अक्टूबर को डिंडोली में एसओजी और जिला स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम ने नौ कथित झोलाछाप डॉक्टरों को पकड़ा। इनके पास से 95,138 रुपये की दवाइयां, इंजेक्शन, सिरप और मेडिकल उपकरण जब्त किए गए। पुलिस ने कार्रवाई से पहले डमी मरीज भेजकर क्लीनिकों की जांच भी करवाई थी। जांच में सामने आया कि कुछ लोग दसवीं और बारहवीं पास थे, तो कुछ के पास सामान्य स्नातक की डिग्री थी। कुछ लोग पहले अस्पतालों में कंपाउंडर या सहायक के रूप में काम कर चुके थे।
30 अक्टूबर को सचिन जीआईडीसी में चार क्लीनिकों पर छापेमारी हुई। रामबहादुर वर्मा, आशीष मौर्य, नरोत्तम बैरागी और महेंद्र पंवार को पकड़ा गया। इन चारों के पास एलोपैथी चिकित्सा करने की मान्य डिग्री नहीं थी। पुलिस ने 47,455 रुपये का सामान जब्त किया। इसी दौरान सचिन क्षेत्र में तीन अन्य लोगों अरुणक्रांति विश्वास, चंद्रेश कुमार प्रजापति और सुशांत बिश्वास के खिलाफ भी कार्रवाई की जानकारी सामने आई। उनके क्लीनिकों से 71,220 रुपये का सामान जब्त किया गया।
इस प्रकार सितंबर से अक्टूबर तक उपलब्ध अलग-अलग समाचार रिपोर्टों में कुल 33 लोगों की गिरफ्तारी और कार्रवाई का उल्लेख मिलता है। यदि सचिन के इन तीन मामलों को भी अलग कार्रवाई के रूप में जोड़ा जाए तो आंकड़ा 36 तक पहुंचता है। इन आंकड़ों का पुलिस के आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलान जरूरी है, ताकि दोहरी गणना की संभावना समाप्त हो सके।सवाल यह है कि आखिर बिना डिग्री के लोग वर्षों तक क्लीनिक कैसे चलाते रहते हैं? पांडेसरा में पकड़े गए कुछ आरोपी दो से तीन दशक तक कथित रूप से चिकित्सा करते रहे।
किसी ने कंपाउंडर का काम किया तो किसी ने अस्पताल में सहायक के रूप में अनुभव प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने स्वयं को डॉक्टर बताकर क्लीनिक शुरू कर दिए। गरीब और प्रवासी मजदूरों की बड़ी आबादी वाले औद्योगिक क्षेत्रों में ऐसे क्लीनिकों को मरीज भी मिल जाते हैं। कम फीस, नजदीकी स्थान और तत्काल उपचार का भरोसा लोगों को वहां पहुंचा देता है। यही मजबूरी कुछ अपात्र लोगों के लिए कमाई का जरिया बन जाती है।
कानून में ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान मौजूद है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम 2019 की धारा 34 के अनुसार राज्य या राष्ट्रीय मेडिकल रजिस्टर में पंजीकृत व्यक्ति ही योग्य आधुनिक चिकित्सा चिकित्सक के रूप में प्रैक्टिस कर सकता है। इसका उल्लंघन करने पर एक वर्ष तक की कैद अथवा पांच लाख रुपये तक जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। गुजरात मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट 1963 की धारा 30 भी अपंजीकृत व्यक्तियों को चिकित्सा करने से रोकती है।
इसके तहत पहली बार अपराध सिद्ध होने पर 500 रुपये तक जुर्माने, दूसरी बार छह महीने तक कैद और 500 रुपये तक जुर्माने तथा बाद के अपराधों में दो वर्ष तक कैद और 2,000 रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। हालांकि अलग-अलग कानूनों की प्रयोज्यता मामले के तथ्यों और संबंधित चिकित्सा पद्धति पर निर्भर करती है।
इसके बावजूद झोलाछाप डॉक्टरों का कारोबार समाप्त नहीं हो रहा है। इसका एक बड़ा कारण गिरफ्तारी और सजा के बीच लंबी कानूनी प्रक्रिया है। पुलिस मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है, लेकिन दोषी साबित करने के लिए अदालत में पर्याप्त सबूत प्रस्तुत करना आवश्यक होता है। मेडिकल अधिकारियों की रिपोर्ट, डिग्री और पंजीकरण का सत्यापन, गवाहों के बयान तथा अन्य दस्तावेजी साक्ष्य जुटाने में समय लगता है। कई मामलों में जांच और न्यायिक सुनवाई लंबी खिंच जाती है। दूसरी ओर, पुराने मामलों में कार्रवाई होने के बावजूद आरोपियों की दोबारा गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी नहीं हो पाती। पांडेसरा में पकड़े गए एक आरोपी के खिलाफ पहले भी मामला दर्ज होने की जानकारी सामने आना इसी समस्या की ओर संकेत करता है।
सूरत प्रशासन को अब केवल छापेमारी और गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। शहर के पांडेसरा, डिंडोली, सचिन, उधना, लिंबायत और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में संचालित सभी क्लीनिकों का नियमित सत्यापन होना चाहिए। चिकित्सकों की डिग्री, पंजीकरण और क्लीनिक के संचालन की अनुमति की जांच अनिवार्य होनी चाहिए। पुराने मामलों की समीक्षा कर दोषियों के खिलाफ न्यायालय में प्रभावी पैरवी की जाए। स्वास्थ्य विभाग को ऐसे क्लीनिकों के दोबारा खुलने पर भी नजर रखनी होगी।
राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित अनेक राज्यों में झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें सामने आती रहती हैं। यह समस्या किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं है। लेकिन सूरत जैसे तेजी से विकसित होते औद्योगिक शहर में इसका बने रहना चिंता का विषय है। गरीब मजदूरों को सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है, ताकि उनकी मजबूरी का फायदा कोई अपात्र व्यक्ति न उठा सके।
आखिरकार चिकित्सा के नाम पर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कानून का भय पैदा करना जरूरी है। गिरफ्तारियों के आंकड़े बढ़ने से समस्या का समाधान नहीं होगा। असली सफलता तब होगी, जब ऐसे लोगों को न्यायालय से सजा मिले, उनके अवैध क्लीनिक बंद हों और कोई भी व्यक्ति बिना मान्य योग्यता के डॉक्टर बनकर मरीजों का उपचार करने की हिम्मत न कर सके।
कांतिलाल मांडोत
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