जीवन में नैसर्गिक खुशी को खत्म कर रहा है बढ़ता स्क्रीन टाइम
मैसेज या चैट के जरिए बात करने पर चेहरे के हाव-भाव और टोन नहीं समझ आते, जिससे कई बार गलतफहमियां और झगड़े बढ़ जाते हैं।
मनोज कुमार अग्रवाल
आज मोबाइल पर रील ओटीटी चैनल सोशल मीडिया पर बढ़ता स्क्रीन टाइम पारिवारिक जीवन में जहर घोलने का काम कर रहा हैं। परिजनों के बीच भी बैठे एक ही परिवार के सदस्यों के बीच वार्तालाप के समय को इस डिजिटल सौतन ने छीन लिया है। लोग साथ बैठे होते हैं, लेकिन सबका ध्यान अपनी स्क्रीन पर होता है। आमने-सामने बैठकर दिल की बातें करने का समय खत्म हो रहा है।डाइनिंग टेबल हो या ड्राइंग रूम सब की मौजूदगी में भी सब अकेले है। किसी व्यक्ति से बात करते समय बार-बार अपना फोन देखना या उसमें खो जाना सामने वाले को उपेक्षित महसूस कराता है।यह एक कटु सच्चाई है भावनाओं, हंसी और दुख को साझा करने के बजाय लोग सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में अधिक समय बिताने लगे हैं।आपसी रिश्ते मोबाइल और सोशल मीडिया के निशाने पर हैं। मैसेज या चैट के जरिए बात करने पर चेहरे के हाव-भाव और टोन नहीं समझ आते, जिससे कई बार गलतफहमियां और झगड़े बढ़ जाते हैं।
हाल ही में एक ऐसा ही मामला काफी सुर्खियों में आ गया जब एक ही छत के नीचे रहने वाले वरिष्ठ चिकित्सक दंपती के बीच मोबाइल डिजिटल सौतन बन गया है। पति सर्जन और पत्नी स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। पति को यूट्यूब पर वीडियो देखने की लत दो वर्ष पहले पड़ी। वह घर आने के बाद पत्नी से बात करने की जगह मोबाइल पर वीडियो देखने लग जाते हैं। इससे पत्नी चिढ़ने लगीं, पति को समझाने का प्रयास किया। लत नहीं छूटी।
आगरा का यह मामला इसी गंभीर स्थिति का एक सटीक और बेहद चौंकाने वाला उदाहरण है। आगरा पुलिस के परिवार परामर्श केंद्र में हाल ही में आया यह केस यह साबित करता है कि मोबाइल एडिक्शन किसी भी वर्ग या पेशे के व्यक्ति को अपना शिकार बना सकता है।इस पूरे मामले के मुख्य बिंदुओं पर नजर डाल लीजिए। इस मामले में पति एक सर्जन हैं और पत्नी स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। दोनों ही उच्च शिक्षित और प्रतिष्ठित पेशेवर हैं। डॉक्टर पति को पिछले दो साल से यूट्यूब पर वीडियो और रील्स देखने की गंभीर लत लग गई थी। अस्पताल से घर लौटने के बाद वे पत्नी से बात करने के बजाय घंटों मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते थे।
पत्नी ने काउंसलिंग के दौरान अपनी नाराजगी और लाचारी जाहिर करते हुए एक बेहद तीखी बात कही। उन्होंने कहा, "वीडियो देखने से अच्छा है कि पति नशा या शराब ही पी लिया करें, कम से कम उस बहाने मुझसे बात तो करेंगे।" यह बयान दिखाता है कि पार्टनर की डिजिटल अनदेखी किसी को किस हद तक मानसिक रूप से आहत कर सकती है।आगरा कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर और काउंसलर्स के मुताबिक, इस दंपती की दो बार काउंसलिंग की जा चुकी है, जिसके बाद उनके बीच का तनाव और कड़वाहट धीरे-धीरे कम हो रही है।
आगरा पुलिस परिवार परामर्श केंद्र के आंकड़े बताते हैं कि वहां आने वाले वैवाहिक विवादों के कुल मामलों में से 35 से 40 प्रतिशत मामले केवल मोबाइल स्क्रीन टाइम और डिजिटल एडिक्शन के कारण आ रहे हैं। अब शराब की लत या पारिवारिक हस्तक्षेप से भी बड़ी वजह यह 'डिजिटल सौतन' बनती जा रही है
अकेले में मोबाइल की स्क्रीन देखकर अपने चेहरे के भाव बदलते रहते हैं। यह अकेला मामला नहीं है, पति-पत्नी के बीच मोबाइल डिजिटल सौतन की जगह ले रहा है। घर और परिवार से दूर रहने वालों के बीच दूरियां कम करने वाला मोबाइल एक छत के नीचे रहने वाले पति-पत्नी के बीच अनदेखी डिजिटल दीवार खड़ी कर रहा है।घर में मोबाइल को अधिक समय देना, बार-बार वाट्सएप चेक करना और चैट करना पति-पत्नी के रिश्तों में रार पैदा कर रहा है। परिवार परामर्श केंद्र में वर्तमान में एक हजार से अधिक मामले पहुंचे, जिनमें 35 से 40 प्रतिशत मामले मोबाइल के चलते होने वाली रार के थे। पिछले तीन वर्ष मे इस तरह के मामलों में बढोत्तरी हुई है। इससे पहले पति-पत्नी का एक दूसरे पर किसी और से प्रेम संबंध होने का शक करने के मामले अधिक थे।
एक अध्ययन में अमेरिका के 40,337 बच्चों और किशोरों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया था। इसमें पाया गया कि 14 से 17 साल के जिन किशोरों ने रोजाना सात घंटे या उससे अधिक स्क्रीन का इस्तेमाल किया उनमें एक घंटे तक स्क्रीन इस्तेमाल करने वालों की तुलना में डिप्रेशन या एंग्जायटी में होने की संभावना दोगुने से ज्यादा थी। लेकिन यह अध्ययन दोनों के बीच संबंध दिखाता है इसमें यह साबित नहीं होता है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम ही मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का एकमात्र कारण है। फिर भी इस आकड़े के नतीजे से डिजिटल आदतों पर ध्यान देने की जरूरत बढ़ जाती है।
अगर आप अपना स्क्रीन टाइम कम करना चाहते है तो इसकी शुरुआत छोटे बदलावों से की जा सकती है। जिसमें खाना खाते समय फोन दूर रखें, दोस्तों और परिवार के साथ बातचीत के दौरान नोटिफिकेशन बंद करें और दिन में कुछ समय टहलने, व्यायाम करने या कोई नया शौक सीखने के लिए निकालना शुरू कर दें।वहीं सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल सीमित करना और बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखना भी उपयोगी हो सकता है। इसमें ध्यान रखें कि काम, पढ़ाई और मनोरंजन के लिए स्क्रीन की जरूरत अलग-अलग होती है इसलिए सभी के लिए एक ही समय-सीमा सही नहीं मानी जाएगी।
आखिर में तकनीक को पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं बल्कि उसका समझदारी से इस्तेमाल करना जरूरी है।
देखा जाता है कि डिजिटल दुनिया से जुड़े रहने के साथ वास्तविक रिश्तों, शारीरिक गतिविधियों और खुद के लिए समय निकालना मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए बेहतर संतुलन बनाने में मदद कर सकता है।स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। जिसमें पढ़ाई से लेकर ऑफिस के काम और दोस्तों से बातचीत तक कई गतिविधियां स्क्रीन के जरिए होती हैं। वहीं अब तकनीक ने जिंदगी को और भी आसान बना दिया लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल मानसिक और शारीरिक सेहत पर असर डाल सकता है। जिसको देखते हुए सवाल यह है कि क्या हम तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं या धीरे-धीरे उसी पर निर्भर होते जा रहे हैं?
यदि जीवन में डिजिटल संसार ने ज्ञान का अपार भंडार खोल दिया है तो दूसरी ओर जीवन में सरलता सहजता और अन्तर्मन की खुशी को कहीं न कहीं प्रभावित किया है। जीवन में बहुत कुछ सीखने पाने हासिल करना उस समय निरर्थक हो जाता है जब भीतर का आह्लाद अनुभव नहीं होता जब पास में मौजूद प्रकृति का सौंदर्य बोध ह्रदय में कोई उमंग नहीं जगाता जब पास मे मौजूद परिजनों से मिलकर बात कर कोई खुशी महसूस नहीं होती जब जीवन के अस्तित्व से जुड़ी अनुभूतियाँ क्षीण होने लगती है।
डिजिटल सौतन के साथ मोबाइल स्क्रीन पर अधिक समय बिताने से यही हालात बन रहे हैं इनसे बचने के लिए स्क्रीन टाइम पर नियमन करना बेहद जरूरी है ताकि जीवन बोध बचा रहे रिश्ते बचे रहें और संवेदनशीलता बनी रहे।इसके लिए घर या डाइनिंग टेबल पर 'नो-फोन जोन' का नियम बनाएं।अपनों के साथ बातचीत करते समय फोन को साइलेंट करके या दूर रखें। दिन में कुछ समय ऐसा तय करें जब आप पूरी तरह से डिजिटल दुनिया से कटकर परिवार के साथ वक्त बिताएं।


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