ट्रम्प की जंगी सियासत पर घमासान

अमेरिका फर्स्ट की नीति अब दुनिया और अपने देश में भी बन रही चुनौती

हर्षिता यादव  Picture
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां उनकी आक्रामक विदेश नीति, युद्ध संबंधी फैसले और दुनिया पर अमेरिकी दबदबा कायम करने की महत्वाकांक्षा खुद उनके लिए राजनीतिक चुनौती बनती जा रही है। ट्रम्प ने सत्ता में वापसी के बाद अमेरिका फर्स्ट का नारा बुलंद किया था। उनका दावा था कि अमेरिका के हित सर्वोपरि होंगे और दुनिया के दूसरे देशों को अमेरिकी ताकत तथा शर्तों को स्वीकार करना होगा। लेकिन बदलते वैश्विक हालात बता रहे हैं कि केवल दबाव, धमकी और सैन्य शक्ति के सहारे अंतरराष्ट्रीय राजनीति को लंबे समय तक नियंत्रित करना आसान नहीं है। अब यही चुनौती अमेरिका के भीतर भी उनके सामने खड़ी हो रही है।
 
ईरान के साथ जारी टकराव ने ट्रम्प की राजनीतिक और कूटनीतिक रणनीति को दुनिया के सामने एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान के साथ समझौते की संभावना जताते हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान के केश्म द्वीप पर अमेरिकी बमबारी की खबर सामने आती है। ट्रम्प का कहना है कि इस कार्रवाई का उद्देश्य ईरान को यह संदेश देना था कि समझौते का रास्ता अभी बंद नहीं हुआ है। सवाल यह है कि जब बातचीत की संभावना मौजूद है तो सैन्य कार्रवाई से किस तरह विश्वास का वातावरण बनाया जा सकता है? कूटनीति और सैन्य दबाव के बीच यह विरोधाभास ट्रम्प की नीति को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। दुनिया यह समझने की कोशिश कर रही है कि अमेरिका वास्तव में शांति चाहता है या अपनी शर्तों पर समझौता कराने के लिए सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है।
 
होर्मुज जलडमरूमध्य में भारतीय जहाज पर ड्रोन हमले और एक भारतीय नाविक की मौत ने इस संघर्ष के खतरों को और गंभीर बना दिया है। जहाज पर सवार अन्य 13 भारतीयों को सुरक्षित बचा लिया गया, लेकिन इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा टकराव केवल दो देशों तक सीमित नहीं है। इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री परिवहन और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के लिए तेल और गैस की आपूर्ति का महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां अस्थिरता बढ़ने का अर्थ है वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह स्थिति विशेष चिंता का विषय है, क्योंकि ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर आम नागरिकों और उद्योगों पर पड़ता है।
 
ट्रम्प की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में दिखाई दे रही है। प्रतिनिधि सभा और सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत कायम रहता है या डेमोक्रेट्स उसे चुनौती देते हैं, इसका असर राष्ट्रपति के शेष कार्यकाल की दिशा पर पड़ेगा। अमेरिकी राजनीति में राष्ट्रपति के पास व्यापक अधिकार होते हैं, लेकिन कांग्रेस की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि डेमोक्रेट्स दोनों सदनों में अपनी स्थिति मजबूत करते हैं तो ट्रम्प के फैसलों पर निगरानी बढ़ सकती है। उनकी विदेश नीति, ईरान के साथ युद्ध, व्यापार शुल्क और सरकारी नियुक्तियों को लेकर कांग्रेस में अधिक सवाल उठ सकते हैं। राष्ट्रपति के अधिकार समाप्त नहीं होंगे, लेकिन मनमाने फैसले लेने की राजनीतिक गुंजाइश निश्चित रूप से सीमित हो सकती है।
 
विशेष रूप से सीनेट का नियंत्रण ट्रम्प के लिए महत्वपूर्ण है। राष्ट्रपति की ओर से प्रस्तावित मंत्रियों, राजदूतों और न्यायाधीशों की नियुक्तियों में सीनेट की अहम भूमिका रहती है। डेमोक्रेट्स का बहुमत होने पर ट्रम्प की पसंद के उम्मीदवारों की नियुक्ति में देरी और विरोध का सामना करना पड़ सकता है। विदेश नीति और रक्षा से जुड़ी समितियों में भी विपक्ष की पकड़ मजबूत हो सकती है। इसका अर्थ यह होगा कि राष्ट्रपति को अपने हर बड़े फैसले के लिए राजनीतिक जवाबदेही का सामना करना पड़ेगा। ईरान के साथ सैन्य संघर्ष पर होने वाले खर्च और आगे की कार्रवाई को लेकर भी कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण बन सकती है।
 
ट्रम्प की व्यापार नीति भी उनके लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है। भारत सहित कई देशों पर आयात शुल्क लगाने की उनकी रणनीति ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता बढ़ाई है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के नाम पर दूसरे देशों पर शुल्क का दबाव डालना उनकी राजनीति का प्रमुख हिस्सा रहा है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ने से अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर भी असर पड़ सकता है। यदि डेमोक्रेट्स कांग्रेस की व्यापार समितियों पर नियंत्रण मजबूत करते हैं तो टैरिफ नीति की समीक्षा और प्रशासन से जवाबदेही की मांग बढ़ सकती है।
 
ट्रम्प की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू उनका व्यक्तिगत नेतृत्व और निर्णय लेने का तरीका है। वे अक्सर बड़े दावे करते हैं और अपनी उपलब्धियों को ऐतिहासिक बताने से पीछे नहीं हटते। लेकिन लोकतंत्र में लोकप्रियता का वास्तविक आकलन चुनाव और जनता के विश्वास से होता है। महंगाई, रोजगार, अवैध प्रवासियों का मुद्दा, करों में कटौती और ईरान युद्ध जैसे विषय अमेरिकी मतदाताओं के सामने हैं। यदि जनता को लगता है कि सरकार की प्राथमिकताएं घरेलू समस्याओं के बजाय अंतरराष्ट्रीय टकराव पर अधिक केंद्रित हैं तो इसका राजनीतिक नुकसान राष्ट्रपति को उठाना पड़ सकता है।
 
ईरान में ट्रम्प और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के विरोध में होर्डिंग दिखाई देने की खबरें भी इस संघर्ष के राजनीतिक और जनभावनात्मक पहलू को उजागर करती हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश की प्रतिष्ठा केवल उसकी सैन्य ताकत से नहीं बनती, बल्कि उसके व्यवहार, विश्वसनीयता और दूसरे देशों के प्रति सम्मान से भी बनती है। भारत ने हमेशा संवाद, संप्रभुता और शांतिपूर्ण समाधान को महत्व दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने अमेरिका सहित दुनिया के प्रमुख देशों के साथ अपने संबंधों को राष्ट्रीय हितों के आधार पर आगे बढ़ाया है।
 
भारत की विदेश नीति का मूल संदेश यही है कि मित्रता हो, सहयोग हो और व्यापारिक साझेदारी हो, लेकिन राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं होना चाहिए।ट्रम्प के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और देश की वास्तविक जरूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं। दुनिया पर अमेरिकी प्रभाव बनाए रखने की इच्छा अपनी जगह है, लेकिन इसके लिए हर देश को दबाव में रखना स्थायी समाधान नहीं हो सकता। युद्ध से पैदा होने वाली अस्थिरता अंततः अमेरिका की अर्थव्यवस्था और उसकी अंतरराष्ट्रीय साख को भी प्रभावित कर सकती है। यदि मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को झटका लगता है तो यह ट्रम्प की नीतियों के प्रति जनता की नाराजगी का राजनीतिक संकेत माना जाएगा।
 
अमेरिका की राजनीति में चुनाव केवल सत्ता का गणित नहीं होते, बल्कि वे नेतृत्व की कार्यशैली और नीतियों पर जनता की राय भी सामने लाते हैं। ट्रम्प के लिए यह समय आत्ममंथन का है। उन्हें समझना होगा कि दुनिया अब एकध्रुवीय दबाव की राजनीति से आगे बढ़ रही है। भारत, चीन, यूरोप और पश्चिम एशिया के देश अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले ले रहे हैं। ऐसे में अमेरिका फर्स्ट की नीति यदि सहयोग के बजाय अहंकार और टकराव का माध्यम बनती है तो इसका नुकसान अमेरिका को भी उठाना पड़ेगा। ट्रम्प की असली परीक्षा केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि विश्व राजनीति में अमेरिका का भरोसा बनाए रखने में है। यदि वे इस कसौटी पर विफल होते हैं तो उनकी राजनीतिक ताकत के साथ अमेरिका के वैश्विक नेतृत्व पर भी सवाल खड़े होंगे।
 
कांतिलाल मांडोत

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