राष्ट्र भी एक महावृक्ष के सभान है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति फूल की भाँति खिलता-मुस्कराता हुआ रहना चाहिए

हममें चेतना आई तो हमने स्वानुभूत ज्ञान विश्व में फैलाकर विश्व को भी प्रकाश दिया, उसे जगाया

हर्षिता यादव  Picture
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यह मान्यता है कि जितने महापुरुष भारतवर्ष ने दिये, उसका दशमांश भी दुनियाँ के अन्य राष्ट्र नहीं दे पाये। सभ्यता और मानव संस्कृति का सूर्योदय सर्वप्रथम भारत-भूमि पर ही हुआ।  अभिप्राय यह है कि ज्ञान का उजाला सर्व प्रथम यहाँ फैला। यों भी सूर्योदय से पहले पूर्व दिशा ही आलोकित होती है, पश्चिम को बाद में ही प्रकाश मिलता है। हममें चेतना आई तो हमने स्वानुभूत ज्ञान विश्व में फैलाकर विश्व को भी प्रकाश दिया, उसे जगाया।
 
आज सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान का जो उजाला दिखाई दे रहा है, वह हमारे द्वारा ही फैलाया गया है। जैसे सूर्योदय से घरा का अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मनरूपी आकाश का अंधकार ज्ञान के सूर्य से नष्ट हो गया। जहाँ अज्ञान है, वहीं दुःख है। ज्ञान होने पर शोक चला जाता है। सारे विश्व में अज्ञानरूपी अंधकार के चले जाने पर संसार शोकरहित हो जाता है। आज भारत की स्थिति बड़ी विचित्र है। जिस भारत ने विश्व को शोकरहित बनाने का प्रयास किया, ज्ञान का आलोक फैलाया, आज वही
 
धर्म कभी किसी को लड़ना नहीं सिखाता। जो धार्मिक है, वह हिंसा का नहीं बल्कि प्रेम का मार्ग चुनता है। धर्म चाहे कोई भी हो, धर्म ही होता है। पानी शीतलता प्रदान करता है, चाहे पानी झरने का हो या कुएँ का, सागर का हो या झील का पानी अपना धर्म नहीं छोड़ता। सभी के धर्म-सम्प्रदाय प्रेम का ही संदेश देते हैं। यह सब होते हुए भी विडम्बना यह है कि लोगों ने धर्म को सुना है, समझा नहीं है। जैनधर्म के चार तीर्थों में एक तीर्थ श्रावक भी है। श्रावक का अभिप्राय यह है जो श्रवण करता है, सुनता है। तीर्थंकरों की वाणी श्रावकों ने सिर्फ सुनी है।
 
यदि सुनकर समझ जाते तो इस भारत का रूप ही कुछ दूसरा होता। केवल सुनना ही काफी नहीं है। रामचरितमानस में ज्ञान-वैराग्य का उपदेश देते हुए राम ने लक्ष्मण से कहा है- 'सुनहु तात मन मति चित लाई।' अर्थात् मन लगाकर सुनो, सुनने में मन इधर-उधर न भटके, एकाग्रता हो। सुनने के साथ ही उसे मति, यानी बुद्धि लगाकर समझो और समझने के बाद चित्त लगाकर उस पर आचरण करो। इस तरह पहले सुनना, सुनकर समझना और समझकर उसको जीवन में उतारने से ही 'श्रावक' शब्द की सार्थकता है।
 
लेकिन सुनने-समझने-करने में तालमेल न होने की स्थिति मात्र जैन श्रावकों की ही नहीं, सभी धर्मानुयायियों की हो रही है। वे सब अपने धर्म-गुरु की वाणी को केवल सुनते हैं, जबकि आवश्यकता समझने की है। धर्म तो सदैव सत्य की ही बात करता है। सभी धर्म सत्य की राह ही बताते है।
 
कोई व्यक्ति अग्नि को लेकर अपने घर में आग लगा दे तो इसमें दोष किसका होगा ? अग्नि को आप दोषी मानेंगे या उसको जिसने घर में अग्नि लगाई है ? निश्चित रूप से दोष अग्नि का न होकर अग्नि लगाने वाले का ही है। ठीक इसी प्रकार धर्म की बागडोर उन लोगों के हाथ में आ गई, जो धर्म का दुरुपयोग करने में ही धर्म का पालन समझने लगे। धर्म के अंधानुयायियों का वर्चस्व बढ़ जाने के कारण ही  धर्मयुद्ध लड़े गये और धर्म बदनाम हो गया।
 
आजादी के बाद भारत में साम्प्रदायिक हिंसा का जो जहर फैला, वह उत्तरोत्तर बढ़ता ही जा रहा है। इसके पीछे पूरे समाज या धर्म को दोषी नहीं माना जा सकता। एक मेंढ़क के कम हो जाने से सागर अपवित्र या गंदा नहीं हो जाता। समाज में कुछ व्यक्तियों के चारित्रिक पतन से पूरे समाज को दोषी मानना उचित नहीं है।संविधान ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया है। धर्मविहीन राष्ट्र न होकर यह है कि सरकार किसी भी व्यक्ति की धार्मिक मान्यता में अपना हस्तक्षेप नहीं करेगी। गांधीजी ने धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) का अर्थ किया था-सभी धर्मों के प्रति समान आदर भाव।
 
प्रत्येक नागरिक अपने ढंग की प्रार्थना-पूजा के लिए स्वतंत्र है। इसमें राष्ट्र का कहीं कोई दखल नहीं होगा। वह सभी लोगों की धार्मिक भावना का सम्मान करता है। प्रत्येक नागरिक का भी यह दायित्व है कि वह ऐसा कोई काम न करे, जिससे राष्ट्र कमजोर हो। धर्म में पनपते साम्प्रदायिक विद्वेष से धर्म कमजोर होता है। वह टूटने लगता है, बिखरने लगता है। इससे कुछ स्वार्थी लोग संघर्ष पर उतर आते हैं, वे लोगों की भावना से खिलवाड़ करके धर्म के स्वरूप को विकृत कर रहे है।
 
सम्प्रदाय का जहर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। भारत वह देश है, जहाँ हजारों वर्ष पहले सम्राट् अशोक ने गिरिनार में प्राप्त शिलालेख पर यह संदेश खुदवाया था- "मैं आपके पूजा-पाठ-भक्ति से अधिक खुश नहीं हूँ। आप परस्पर प्रेम से बिना लड़े रहें तो मैं खुश रहूँगा।" धर्म के नाम पर दूसरे का तिरस्कार करना उपयुक्त नहीं है। हर धर्म यही बोध कराता है कि सभी अपने हैं- 'आत्मवत् सर्वभूतेषु ।' धर्म के सच्चे अनुयायी की सतत अनुभूति यही होती है- किससे वैर करूँ, सब तो अपने हैं।'
 
समाज को आदर्श बनाना है, राष्ट्र को मजबूत रखना है तो सभी देशवासियों को द्वेषभाव त्यागना होगा। मत्सरभाव से बाहर निकलना होगा। हमें सुन्दर और पवित्र भावों की रचना करनी होगी। लेकिन इसमें हम सभी अलग थलग पड़ गए है। यह सच है कि पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं, मगर पाँचों का अपना-अपना महत्त्व है। हम भोजन मुख में करते हैं, लेकिन उससे जो रस बनता है, वह शरीर के सभी अंगों तक पहुँचकर उसे पुष्ट बनाता है। दर्द सिर में हो या पाँव में, दवा की गोली पेट में ही पहुँचाते हैं। वृक्ष को पानी जड़ों में ही दिया जाता है मगर कुछ ही पलों बाद फूलों में उसका प्रभाव दिखाई देने लगता है। राष्ट्र भी एक महावृक्ष के सभान है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति फूल की भाँति खिलता-मुस्कराता हुआ रहना चाहिए।
 
प्रत्येक भारतीय को अत्तीत से प्रेरणा लेकर वर्तभान को सँचारते हुए भविष्य को सँभालने की कोशिश करनी चाहिए। जाति, भाषा एवं सम्प्रदाय के अंगारों से राष्ट्र में उजाला नहीं हो सकता। उजाले के लिए धधकते अंगारे नहीं, बल्कि मशालों की जरूरत होती है। अंगारे ऊष्मा तो दे देंगे, लेकिन अंधकार का हरण नहीं करेंगे। उसके लिए तो ज्योति की ही जरूरत है।
 
देश का प्रत्येक व्यक्त्ति शक्ति का अदभूत स्रोत है। उस स्रोत को सूखने से बचाना होगा। अब भी समय है। हमारे धर्म और ज्ञान के स्रोतों से अमृत वाणी का निर्झर बहता रहना चाहिए। जो भी इस स्रोत का लाभ उठाने में सक्षम होगा, उसी का जीवन सुधर-सँवर सकेगा। स्रोत को रोकने का प्रयास न करें। बालकों में देश-धर्म की भावना जाग्रत करें। रावण, कंस एवं गोशालक हर युग में होते हैं, मगर उनकी शक्ति राम, कृष्ण एवं महावीर के सम्मुख क्षीण हो जाती है।
 
पहले भी हुई है और भविष्य में भी होती रहेगी। आपको इतना ही ध्यान रखना है कि राम, कृष्ण, महावीर हमारे आदर्श हैं तथा रावण, कंस और गोशालक जैसे व्यक्तियों का धर्म तथा मानवता से कभी कोई रिश्ता नहीं होता। पिछलग्गू तो दुष्टों के भी होते हैं। आपको दुष्टों का पिछलग्गू न बनकर महापुरुषों और संतों का अनुयायी बनकर धर्म के सच्चे स्वरूप को ग्रहण करना है।
 
कांतिलाल मांडोत

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