किस दिशा में जा रहा है सपा - कांग्रेस गठबंधन ?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ मुस्लिम बहुल सीटों को लेकर भी दोनों दलों के बीच दावेदारी की चर्चा है।
जितेन्द्र सिंह पत्रकार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं हुई है। दोनों दल सार्वजनिक रूप से साथ चलने की बात कर रहे हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर बढ़ती खींचतान ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि गठबंधन की राह कितनी सहज होगी। हाल की रिपोर्टों के अनुसार कांग्रेस 150 से कम सीटों पर समझौता करने के पक्ष में नहीं दिख रही, जबकि सपा की ओर से कहीं कम सीटों की पेशकश की चर्चा है।
दरअसल, यह विवाद केवल सीटों की संख्या का नहीं है। इसके पीछे उत्तर प्रदेश में दोनों दलों की राजनीतिक जमीन, संगठनात्मक विस्तार और भविष्य की भूमिका का सवाल भी जुड़ा है। कांग्रेस लंबे समय से प्रदेश में अपने संगठन को फिर मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में वह सीमित सीटों पर लड़कर अपनी राजनीतिक उपस्थिति को सीमित नहीं रखना चाहती। दूसरी ओर सपा 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन के आधार पर विधानसभा चुनाव में अधिक सीटों पर अपना दावा स्वाभाविक मान रही है।
यही कारण है कि गठबंधन की बातचीत अब अंकगणित से आगे बढ़कर राजनीतिक प्रभाव और 'कौन कितनी जमीन रखता है' की बहस बनती जा रही है।2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में साथ चुनाव लड़ा था और दोनों दलों के प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार हुआ था। इसी अनुभव के आधार पर 2027 में भी साथ रहने की संभावना बनी हुई है। अखिलेश यादव ने हाल में रायबरेली से पीडीए रथयात्रा शुरू करते हुए गठबंधन को मजबूत बताया और सीटों के बंटवारे में जीतने की क्षमता को आधार बनाने की बात कही।
लेकिन राजनीति में सार्वजनिक बयान और बंद कमरे की बातचीत हमेशा एक जैसी नहीं होती। कांग्रेस की ओर से सभी 403 विधानसभा सीटों पर तैयारी करने और बड़ी संख्या में सीटों की दावेदारी की बात सामने आ रही है। वहीं सपा भी अपने संगठन और संभावित उम्मीदवारों के आधार पर व्यापक तैयारी कर रही है।
सबसे बड़ी चुनौती उन सीटों पर है जहां दोनों दल स्वयं को मजबूत मानते हैं। रायबरेली और अमेठी जैसे कांग्रेस प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी सीटों को लेकर मतभेद की खबरें सामने आई हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ मुस्लिम बहुल सीटों को लेकर भी दोनों दलों के बीच दावेदारी की चर्चा है।
इस खींचतान का एक दूसरा पहलू भी है। गठबंधन केवल शीर्ष नेताओं के बीच सीटों का समझौता नहीं होता। उसका वास्तविक परीक्षण कार्यकर्ताओं के स्तर पर होता है। जिस सीट पर वर्षों से सपा का कार्यकर्ता सक्रिय रहा हो, वहां कांग्रेस का उम्मीदवार आने पर स्थानीय संगठन कितनी सहजता से उसके लिए काम करेगा? इसी तरह कांग्रेस के मजबूत क्षेत्र में सपा को सीट मिलने पर कांग्रेस का स्थानीय कार्यकर्ता कितनी मजबूती से गठबंधन प्रत्याशी के साथ खड़ा होगा? इन सवालों का जवाब कागज पर होने वाले सीट समझौते से नहीं, जमीन पर संगठनात्मक तालमेल से मिलेगा।
पिछले दिनों दोनों दलों के नेताओं के बीच सार्वजनिक बयानबाजी को नियंत्रित करने की कोशिशों की खबरें भी सामने आई हैं। यह संकेत है कि नेतृत्व को अंदाजा है कि गठबंधन की बातचीत के दौरान सार्वजनिक टकराव आगे चलकर कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा कर सकता है।
सपा और कांग्रेस के सामने असली चुनौती यही है कि सीटों की सौदेबाजी गठबंधन की बुनियादी भावना पर भारी न पड़ जाए। दोनों दलों की ताकत अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक आधारों में है। यदि इन ताकतों का समन्वय होता है तो गठबंधन का स्वरूप केवल सीटों का जोड़ नहीं रहेगा, बल्कि साझा राजनीतिक रणनीति का रूप ले सकता है। इसके विपरीत यदि प्रत्येक दल अपनी अधिकतम सीट सुनिश्चित करने में ही जुटा रहा तो गठबंधन के भीतर प्रतिस्पर्धा सहयोग से बड़ी दिखाई देने लगेगी।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में गठबंधन की सफलता केवल यह तय करने से नहीं होती कि कौन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा। महत्वपूर्ण यह भी है कि साझा उम्मीदवार को दोनों दलों के मतदाता स्वीकार करें, स्थानीय संगठन उसके साथ खड़ा हो और चुनाव अभियान में परस्पर विरोधी संदेश न जाएं।
इसलिए आने वाले दिनों में सपा-कांग्रेस के बीच बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा सीटों की संख्या से अधिक सीटों का वैज्ञानिक और स्वीकार्य बंटवारा होगा। कौन-सी सीट किस दल के पास जाए, इसका आधार स्थानीय संगठन, पिछले चुनावों का प्रदर्शन, सामाजिक समीकरण और संभावित प्रत्याशी की स्वीकार्यता जैसे तथ्य हो सकते हैं। कांग्रेस पहले ही 'क्वालिटी सीटों' पर जोर देने की बात कर चुकी है।
सियासत का यह दौर दोनों दलों के लिए धैर्य की परीक्षा भी है। तलवारें खिंची दिखाई दे रही हैं, लेकिन दरवाजा बंद नहीं हुआ है। सार्वजनिक स्तर पर दोनों ओर से गठबंधन की संभावना बरकरार रखी जा रही है। ऐसे में अंतिम फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों दल अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और साझा चुनावी आवश्यकता के बीच कितना संतुलन बना पाते हैं।
2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं होगा; उससे पहले विपक्ष के भीतर सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन की परीक्षा होगी। सपा-कांग्रेस गठबंधन के लिए असली चुनौती सीटें जीतने से पहले सीटों पर सहमति बनाने की है।
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