बदले की भावना : फर्जी मुकदमों में एससी-एसटी और पाक्सो एक्ट का जबरदस्त उपयोग
कानून कमजोरों की ढाल है, बदले का हथियार नहीं। लेकिन जब किसी गंभीर कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को सबक सिखाने, दबाव बनाने, संपत्ति या पारिवारिक विवाद में बढ़त हासिल करने अथवा व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए किया जाने लगे, तो सवाल केवल आरोपी का नहीं रहता—सवाल कानून की विश्वसनीयता और न्याय व्यवस्था पर जनता के भरोसे का भी बन जाता है।
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और पॉक्सो कानून ऐसे ही अत्यंत संवेदनशील कानून हैं। दोनों कानूनों का उद्देश्य बेहद महत्वपूर्ण है। एससी-एसटी एक्ट सामाजिक भेदभाव और जातीय अत्याचार से पीड़ित लोगों को कानूनी सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है, जबकि पॉक्सो एक्ट बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए कठोर कानूनी व्यवस्था प्रदान करता है। इसलिए इन कानूनों की सख्ती आवश्यक है। लेकिन सख्ती और अंधी कार्रवाई में अंतर है।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी कानून की गंभीरता का अर्थ यह हो सकता है कि शिकायत मिलते ही हर आरोप को बिना पर्याप्त जांच के सत्य मान लिया जाए?व्यक्तिगत विवादों में आपसी रंजिश कोई नई बात नहीं है। जमीन, मकान, पारिवारिक विवाद, वैवाहिक कलह, लेन-देन, नौकरी अथवा स्थानीय राजनीति—इनमें विवाद बढ़ने पर पुलिस और अदालत का दरवाजा खटखटाया जाता है। समस्या तब पैदा होती है जब आरोपों की गंभीरता को ही दबाव बनाने का साधन बना दिया जाए।
किसी व्यक्ति पर एससी-एसटी एक्ट या पॉक्सो जैसी गंभीर धाराएं लगते ही सामाजिक प्रतिष्ठा पर गहरा असर पड़ सकता है। गिरफ्तारी का डर, नौकरी और कारोबार पर असर, परिवार की सामाजिक स्थिति, अदालतों के चक्कर और वर्षों तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया—ये सब किसी व्यक्ति को मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ सकते हैं।
इसीलिए यदि किसी मामले में आरोप वास्तविक हैं तो कानून की पूरी शक्ति पीड़ित के साथ खड़ी होनी चाहिए। लेकिन यदि आरोप जानबूझकर झूठे, मनगढ़ंत या बदले की भावना से लगाए गए हों, तो जांच एजेंसियों और अदालतों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी हो जाती है।
एससी-एसटी एक्ट के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में यह स्पष्ट किया है कि कानून का संरक्षण वास्तविक पीड़ितों के लिए आवश्यक है, लेकिन जहां शिकायत प्रथम दृष्टया दुर्भावनापूर्ण या कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला हो, वहां न्यायिक हस्तक्षेप संभव है। एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत और एफआईआर को प्रथम दृष्टया निराधार, परेशान करने वाली और प्रतिशोध की भावना से जुड़ी हुई माना था। साथ ही, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल कुछ मामलों में कथित दुरुपयोग के आधार पर पूरे एससी-एसटी समुदाय की शिकायतों को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। इस कानून का मूल उद्देश्य ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय से पीड़ित लोगों को सुरक्षा देना है।
यही संतुलन न्याय व्यवस्था की असली परीक्षा है न तो वास्तविक पीड़ित को न्याय से वंचित किया जाए और न ही निर्दोष व्यक्ति को बदले की कार्रवाई का शिकार बनाया जाए।
पॉक्सो एक्ट की आवश्यकता पर कोई सवाल नहीं हो सकता। बच्चों के खिलाफ यौन अपराध अत्यंत गंभीर अपराध हैं और ऐसे मामलों में पुलिस तथा न्याय व्यवस्था को संवेदनशीलता और तत्परता से काम करना चाहिए।लेकिन 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में भी चिंता व्यक्त की है जहां वैवाहिक या पारिवारिक विवादों की पृष्ठभूमि में पॉक्सो कानून के आरोपों का इस्तेमाल कथित तौर पर दबाव बनाने के लिए किया गया।
मई 2026 के एक मामले में अदालत ने अस्पष्ट और सामान्य आरोपों के आधार पर परिवार के कई सदस्यों को आपराधिक प्रक्रिया में घसीटे जाने की स्थिति पर गंभीरता से विचार किया और कार्यवाही रद्द की। यह टिप्पणी किसी भी वास्तविक पॉक्सो मामले को कमजोर करने का आधार नहीं होनी चाहिए।
बल्कि इसका संदेश यह है कि हर शिकायत की निष्पक्ष, वैज्ञानिक और तथ्यपरक जांच होनी चाहिए। क्योंकि अगर झूठे मामले बढ़ते हैं तो उसका सबसे बड़ा नुकसान वास्तविक पीड़ितों को ही होता है। समाज में यह धारणा बनने लगती है कि गंभीर आरोप भी कभी-कभी व्यक्तिगत विवादों में हथियार की तरह इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
इससे वास्तविक पीड़ितों की आवाज कमजोर पड़ती है।हमारे समाज में एक बड़ी समस्या यह है कि एफआईआर दर्ज होते ही आरोपी को दोषी मानने की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है। लेकिन एफआईआर अदालत का फैसला नहीं है। एफआईआर आरोप की शुरुआत है, अपराध सिद्ध होने का अंतिम प्रमाण नहीं। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि घटना वास्तव में हुई या नहीं, आरोपों के पीछे क्या तथ्य हैं, उपलब्ध साक्ष्य क्या कहते हैं, गवाहों के बयान कितने विश्वसनीय हैं और घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि होती है या नहीं। यही कारण है कि पुलिस को न शिकायतकर्ता का पक्ष लेकर जांच करनी चाहिए और न आरोपी को बचाने के लिए। पुलिस की भूमिका सत्य तक पहुंचने की होनी चाहिए। जिस व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगा दिए जाते हैं, उसके लिए केवल अदालत में बरी हो जाना पर्याप्त न्याय नहीं है।कई बार मुकदमा वर्षों चलता है। वकील की फीस, अदालत की तारीखें, पुलिस जांच, नौकरी या कारोबार पर असर, परिवार की चिंता और समाज में बदनामी—इनका कोई सीधा मुआवजा नहीं होता।और यदि वर्षों बाद अदालत यह कह दे कि आरोप सिद्ध नहीं हुए, तब भी आरोपी की जिंदगी में जो नुकसान हो चुका होता है, उसे पूरी तरह वापस लाना मुश्किल होता है। इसलिए झूठा मुकदमा भी सामाजिक हिंसा का एक रुप बन सकता है।
फर्जी मुकदमों की चर्चा करते समय यह मान लेना कि एससी-एसटी एक्ट या पॉक्सो एक्ट में दर्ज अधिकांश मामले झूठे हैं—एक खतरनाक और गलत निष्कर्ष होगा। जातीय अत्याचार और बच्चों के खिलाफ यौन अपराध वास्तविक समस्याएं हैं। अनेक पीड़ित सामाजिक दबाव, डर और आर्थिक कमजोरी के कारण शिकायत तक नहीं कर पाते।
इसलिए कानून को कमजोर करने की नहीं, कानून के निष्पक्ष इस्तेमाल को मजबूत करने की जरूरत है। ऐसे मामलों में पुलिस जांच की गुणवत्ता निर्णायक भूमिका निभाती है। जांच में घटनास्थल, डिजिटल साक्ष्य, मेडिकल रिकॉर्ड, कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी, स्वतंत्र गवाह, दस्तावेज, आयु संबंधी प्रमाण और घटना से जुड़े अन्य तथ्यों को निष्पक्ष रूप से देखा जाना चाहिए। केवल शिकायतकर्ता का बयान ही अंतिम सत्य नहीं हो सकता और केवल आरोपी का इनकार भी जांच समाप्त करने का आधार नहीं हो सकता। यदि किसी मामले में जांच के बाद आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषी के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि जांच या न्यायिक प्रक्रिया से स्पष्ट हो कि किसी निर्दोष व्यक्ति को जानबूझकर झूठे आरोपों में फंसाया गया, तो कानून में उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार जिम्मेदार व्यक्ति के विरुद्ध भी कार्रवाई पर विचार होना चाहिए। इससे एक महत्वपूर्ण संदेश जाएगा कि कानून का संरक्षण पीड़ित के लिए है, लेकिन कानून का दुरुपयोग करने की छूट किसी को नहीं है।


Comments