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निलंबित दुकान में खाद की बिक्री पर विभागीय अफसरों की चुप्पी से उठ रहे हैं सवाल
15 दिन बाद भी कार्रवाई नहीं, जांच रिपोर्ट दबाने की हो रही हैं कोशिश
सिर्फ शोकॉज कर विभाग ने साधी चुप्पी
सुपौल स्वतंत्र प्रभात संवाददाता - : जिले के त्रिवीनगंज खाद बिक्री में गंभीर अनियमितताओं के सामने आने के बाद भी कृषि विभाग की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ने से अब सवाल सीधे विभागीय अधिकारियों की कार्यशैली पर उठने लगे हैं।मालूम हो कि नगर परिषद वार्ड-25 स्थित पूजा ट्रेडर्स में जांच के दौरान कई गड़बड़ियां मिलने के बाद जिला कृषि पदाधिकारी नेसंबंधित दुकान के खाद की बिक्री पर रोक लगाते हुए लाइसेंस निलंबित करते हुए तीन दिन में शोकॉज मांगा था। लेकिन रोक के आदेश के बावजूद दुकान से खाद की बिक्री जारी है। सबसे बड़ा सवाल यह है किजिला कृषि पदाधिकारी ने खुद दुकान को निलंबित किया है तो फिर उसी दुकान में खाद की बिक्री कैसे हो रही है?
जांच में खुली पोल, फिर कार्रवाई में उदारता क्यो
बिगत 4 अगस्त को प्रखंड कृषि पदाधिकारी ने जिला कृषि पदाधिकारी के निर्देश पर सम्बंधित दुकान की जांच की थी। जांच में लाइसेंस में दर्ज स्थान के बजाय दूसरे स्थान पर दुकान चलाने, डिस्प्ले बोर्ड पर जरूरी सूचना और स्टॉक विवरण नहीं रखने तथा पीओएस मशीन और वास्तविक स्टॉक में भारी अंतर जैसी गड़बड़ियां सामने आई थीं।इतना ही नहीं, दुकान से बिना बिल के नकली ‘हरा सोना’ नामक मिक्सर खाद के 10 बैग भी मिले थे।हलाकि लोगो का आरोप है कि खाद की मात्रा सेकड़ो बेग थी ,लेकिन मात्र 10 बेग दिखाया गया। इन अनियमितताओं को विभाग ने उर्वरक नियंत्रण आदेश, 1985 और आवश्यक वस्तु अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन माना। इसके बाद लाइसेंस निलंबित कर बिक्री पर रोक लगा दी गई और दुकानदार से स्पष्टीकरण मांगा गया।लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है—जब जांच रिपोर्ट में इतनी गंभीर गड़बड़ियां सामने आईं तो 15 दिन बाद भी कार्रवाई आगे क्यों नहीं बढ़ रही हैं।
कागज पर निलंबन, जमीन पर बिक्री!
स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभागीय आदेश के बावजूद दुकान से खाद की बिक्री की जा रही है। यदि यह सही है तो विभाग का बिक्री पर रोक का आदेश महज कागजी कार्रवाई बनकर रह गया है।ऐसे में कृषि विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है कि निलंबित दुकान की निगरानी कौन कर रहा है? बिक्री की शिकायतों पर जांच क्यों नहीं हुई? और यदि खाद बिक रही है तो कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है?
जांच करने वाले अधिकारी की रिपोर्ट ही कमजोर करने की चर्चा
मामले में सबसे गंभीर चर्चा विभागीय स्तर पर ही हो रही है। सूत्रों का दावा है कि प्रखंड कृषि पदाधिकारी की जांच रिपोर्ट में सामने आई गड़बड़ियों पर आगे की कार्रवाई करने के बजाय उसे कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। आरोप है कि अनुमंडल कृषि पदाधिकारी मुकेश कुमार जांच रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों को ही अलग नजरिए से देखने में जुटे हैं।यदि जांच रिपोर्ट सही है तो उसे दरकिनार करने की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि रिपोर्ट गलत है तो विभाग ने उसी आधार पर दुकान का लाइसेंस निलंबित कर बिक्री पर रोक क्यों लगाई?
इन सवालों का जवाब अब शायद कृषि विभाग के अधिकारियों के पास नही है।
क्या निलंबन सिर्फ दिखावे की कार्रवाई?
गंभीर अनियमितताओं के बाद दुकान का लाइसेंस निलंबित किया गया, लेकिन न तो अब तक लाइसेंस रद्द हुआ और न ही प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। इससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या निलंबन सिर्फ दिखावे की कार्रवाई थी?
लेनदेन की चर्चा, जांच की जरूरत
मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर विभागीय मिलीभगत और आर्थिक लेनदेन की चर्चाएं भी हैं। हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन जिस तरह जांच के बाद कार्रवाई ठंडी पड़ गई है और बिक्री पर रोक के बावजूद कथित रूप से खाद बिक्री की शिकायतें सामने आ रही हैं, उससे इन चर्चाओं को बल जरूर मिल रहा है।जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन और कृषि विभाग के वरीय अधिकारी पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराएं। जांच में यदि अधिकारी या दुकानदार दोषी पाए जाते हैं तो दोनों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई हो।स्थानीय किसानों का कहना है कि जब विभागीय अधिकारी खुद दुकान में गड़बड़ी पकड़ते हैं, बिक्री पर रोक लगाते हैं और लाइसेंस निलंबित करते हैं, तो फिर उसी आदेश को जमीन पर लागू कराने की जिम्मेदारी भी विभाग की है। यदि आदेश के बावजूद बिक्री होती है और अधिकारी आंखें मूंद लेते हैं तो इसका खामियाजा किसानों को ही भुगतना पड़ेगा।अब निगाह जिला कृषि विभाग के अगले कदम पर है कि क्या विभाग अपनी ही जांच रिपोर्ट पर कायम रहते हुए कठोर कार्रवाई करेगा या फिर मामला शोकॉज और कागजी खानापूर्ति में दबा दिया जाएगा


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