भ्रष्टाचारी तंत्र और मिलावट माफिया के गठजोड़ का नतीजा है जहरीली शराब! 

हमारी व्यवस्था, कानून लागू करने वाली एजेंसियों और समाज के सामने खड़े एक गंभीर सवाल का रूप ले चुकी हैं।

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मनोज कुमार अग्रवाल 

भारत में जहरीली शराब से होने वाली मौतें एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती बनी हुई हैं, जिसमें 'ड्राई स्टेट' शराबबंदी वाले राज्यों से लेकर अन्य राज्यों तक लगातार दुखद घटनाएं सामने आती रहती हैं। ताजा मामला अगस्त 2026 में गुजरात के भावनगर का है, जहां नकली विदेशी शराब के नाम पर बेची गई जहरीली शराब पीने से 7 लोगों की मौत हो गई और 30 से अधिक लोग अस्पताल में भर्ती हैं।जहरीली शराब का यह जानलेवा सिलसिला देश के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर देखने को मिलता है।देश भर में आए दिन जहरीली और नकली शराब से होने वाली मौतें अब केवल दुर्घटनाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि ये घटनाएं हमारी व्यवस्था, कानून लागू करने वाली एजेंसियों और समाज के सामने खड़े एक गंभीर सवाल का रूप ले चुकी हैं।

हर कुछ महीनों सप्ताह के अन्तराल पर देश के किसी न किसी हिस्से से खबर आती है कि नकली शराब पीने के बाद लोगों की तबीयत बिगड़ी, कई अस्पताल पहुंचे और कुछ ने दम तोड़ दिया। प्रशासन सक्रिय होता है, गिरफ्तारियां होती हैं, जांच बैठती है, मुआवजे की घोषणा होती है और कुछ समय बाद मामला फिर सुर्खियों से गायब हो जाता है। फिर किसी दूसरे शहर, गांव या राज्य में वही कहानी दोहराई जाती है। सवाल यही है, आखिर यह सिलसिला कब थमेगा ? 

आपको बता दें कि ताजा मामला गुजरात के भावनगर जिले का है। गुजरात उन राज्यों में है जहां लंबे समय से शराबबंदी लागू है। इसके बावजूद भावनगर में कथित नकली शराब पीने के बाद कई लोगों की मौत और बड़ी संख्या में लोगों के बीमार होने की घटना सामने आई है। स्थानीय प्रशासन ने चार लोगों की मौत की जानकारी दी थी, जबकि अन्य लोगों का विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा था। शुरुआती रिपोटों में मौतों की संख्या कम थी, जो बाद में बढ़ी। यह घटना इसलिए भी अधिक गंभीर है, क्योंकि जिस राज्य में शराब की बिक्री और सेवन पर कानूनी प्रतिबंध है, वहां नकली शराब लोगों तक पहुंच कैसे रही है?

पुलिस की शुरुआती जांच में एक लोकप्रिय ब्रांड के नाम पर डुप्लीकेट शराब बेचे जाने और इसके मध्य प्रदेश से लाए जाने की आशंका सामने आई है। पुलिस ने इस नेटवर्क से जुड़े लोगों को हिरासत में भी लिया है। लेकिन भावनगर कोई पहली घटना नहीं है। गुजरात ने जुलाई 2022 में भी भयावह शराब त्रासदी देखी थी। बोटाद और आसपास के इलाकों में जहरीली शराब से 42 लोगों की मौत हुई थी और दर्जनों लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। उस समय भी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई हुई, अधिकारियों का तबादला हुआ और अवैध शराब के नेटवर्क को तोड़ने के दावे किए गए थे। सवाल है कि चार वर्ष बाद भी यदि नकली शराब लोगों तक पहुंच रही है तो पिछली कार्रवाई से हमने आखिर सीखा क्या?

यह समस्या केवल गुजरात तक सीमित नहीं है। पंजाब, बिहार, तमिलनाडु, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कई अन्य राज्य समय-समय पर ऐसी त्रासदियों के गवाह बने हैं। तमिलनाडु के कालाकुरिची में जून 2024 में मेथेनॉल मिली अवैध शराब ने दर्जनों परिवारों को उजाड़ दिया था। आधिकारिक कार्रवाई के दौरान अवैध शराब जब्त हुई, गिरफ्तारियां हुई और प्रशासनिक अधिकारियों पर भी कार्रवाई की गई। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में भी अवैध एवं नकली शराब के सेवन से होने वाली मौतों को अलग श्रेणी में दर्ज किया जाता है। उपलब्ध एनसीआरबी आधारित डेटा 2012 से 2024 तक राज्य वार ऐसी मौतों का हवाला देता है। इससे इतना तो साफ है कि यह किसी एक राज्य या एक दौर की समस्या नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही राष्ट्रीय चुनौती है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अक्सर इन घटनाओं में मरने वाले लोग समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं। सस्ती शराब की तलाश उन्हें ऐसे अवैध कारोबारियों तक पहुंचा देती है जिन्हें न गुणवत्ता की चिंता होती है, न कानून का भय और न इंसानी जीवन की कीमत का एहसास। अधिक नशा पैदा करने या लागत कम रखने के लिए शराब में मेथेनॉल जैसे जहरीले रसायनों की मिलावट जानलेवा साबित हो सकती है। कल्लाकुरिची मामले में भी मेथेनॉल मिश्रित शराब की पुष्टि सामने आई थी। अधिकरत देखा जाता है कि हर बड़ी आसदी के बाद प्रशासन की एक परिचित तस्वीर सामने आती है।

छापेमारी शुरू होती है, अवैध ठिकाने बंद किए जाते हैं, संदिग्ध गिरफ्तार होते हैं और पुलिस अधिकारियों से जवाब मांगा जाता है। लेकिन असली चुनौती घटना के बाद कार्रवाई करने की नहीं, घटना होने से पहले नेटवर्क को समाप्त करने की है। अवैध शराब का कारोबार अकेले किसी गली या गांव में बैठा व्यक्ति नहीं चला सकता। कच्चा माल कहां से आता है? बोतलें कहां बनती हैं? लोकप्रिय कंपनियों के नाम और लेबल की नकल कैसे होती है? माल एक जिले से दूसरे जिले और कई बार एक राज्य से दूसरे राज्य तक कैसे पहुंचता है? परिवहन, भंडारण और बिक्री की जानकारी स्थानीय स्तर पर किसी को क्यों नहीं मिलती? यदि वर्षों तक कारोबार चलता रहता है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कहीं न कहीं प्रशासनिक लापरवाही, स्थानीय संरक्षण या भ्रष्ट तंत्र भी इसका रास्ता आसान कर रहा है।

शराबबंदी वाले राज्यों के लिए यह समस्या और बड़ी चुनौती है। केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं होता। यदि वैध बिक्री बंद होने के बाद अवैध बाजार पैदा हो जाए और उसकी निगरानी कमजोर रहे तो तस्करों को अधिक मुनाफे का अवसर मिलता है। शराबबंदी का उद्देश्य समाज को नशे से बचाना है, लेकिन यदि उसी व्यवस्था के भीतर जहरीली शराब का संगठित बाजार फलने लगे तो नीति की समीक्षा और क्रियान्वयन दोनों जरूरी हो जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि शराबबंदी गलत है या शराब की खुली विक्री समाधान है। असली प्रश्न नीति से अधिक उसके प्रभावी क्रियान्वयन का है। जहां प्रतिबंध है वहां अवैध सप्लाई पर कठोर निगरानी होनी चाहिए और जहां शराब की कानूनी विक्री है वहां नकली उत्पादों की पहचान और वितरण व्यवस्था पर नियंत्रण मजबूत होना चाहिए। सरकारों को अब प्रत्येक त्रासदी के बाद केवल मुआवजा देने और कुछ लोगों को निलंबित करने से आगे बढ़ना होगा।

अवैध शराब के मामलों में सप्लाई चेन की तह तक जांच, औद्योगिक मेथेनॉल की बिक्री और परिवहन की निगरानी, नकली ब्रांड और पैकेजिंग बनाने वालों पर कार्रवाई तथा बार-बार अवैध कारोबार में पकड़े जाने वालों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई जरूरी है। स्थानीय पुलिस और आबकारी अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। इसके साथ ही ग्रामीण और गरीब बस्तियों में जागरूकता बढ़ानी होगी। लोगों को बताया जाना चाहिए कि अनजान स्रोत से खरीदी गई शराब जानलेवा हो सकती है। संदिग्ध शराब पीने के बाद उल्टी, चक्कर, दृष्टि धुंधली होने वा अन्य परेशानी के मामलों में तुरंत अस्पताल पहुंचना बेहद जरूरी है। कई बार इलाज में देर भी मौतों की संख्या बढ़ा देती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जहरीली शराब से हुई हर मौत को महज एक आंकड़ा समझने की मानसिकता बदलनी होगी। मरने वाला किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य, बेटा, पिता या भाई होता है।

उसके जाने के बाद परिवार केवल भावनात्मक नहीं बल्कि आर्थिक संकट में भी डूब जाता है। देश में तकनीक बड़ी है, पुलिस के पास आधुनिक संसाधन हैं, राज्यों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान पहले से आसान हुआ है। ऐसे में यह स्वीकार करना मुश्किल है कि अवैध शराब की पेटियां एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचे और व्यवस्था को भनक तक न लगे। भावनगर की घटना फिर चेतावनी दे रही है कि नकली शराब केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा का प्रश्न है। कार्रवाई तब सार्थक होगी जब अगली त्रासदी होने से पहले अपराधी नेटवर्क खत्म किया जाए। हर घटना के बाद वही सवाल पूछने की मजबूरी आखिर कब समाप्त होगी, कब थमेगा जहरीली शराब का कहर और कब बंद होगा बेगुनाहों की मौतों का यह सिलसिला। एक मौत पूरे परिवार को मार देती है कई बार परिवार के एक मात्र कमाने वाले सदस्य की मौत से पूरा परिवार प्रभावित होता है। सरकार को इन मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए। 

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