अतिक्रमण का जाल और रेंगती आम आदमी की जिंदगी

अजय यादव Picture
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शहरों की पहचान केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और चमकते बाजारों से नहीं होती। किसी शहर की असली तस्वीर उसकी सड़कों, फुटपाथों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर दिखाई देती है। जब यही सार्वजनिक स्थान अतिक्रमण की गिरफ्त में आ जाते हैं, तो विकास की चमक के पीछे आम आदमी की जिंदगी धीरे-धीरे रेंगने लगती है। अतिक्रमण आज केवल सड़क किनारे दुकान लगाने या फुटपाथ पर सामान रखने तक सीमित समस्या नहीं रह गया है। सड़क की जमीन पर कब्जा, नालियों के ऊपर निर्माण, फुटपाथों पर स्थायी दुकानें, पार्किंग के नाम पर सार्वजनिक स्थानों का इस्तेमाल और गलियों तक में फैलते अवैध निर्माण ने शहरों की व्यवस्था को प्रभावित किया है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा उस नागरिक को भुगतना पड़ता है, जिसके पास न ताकत है, न प्रभाव और न ही व्यवस्था से लगातार संघर्ष करने का समय।
सड़कें छोटी, समस्याएं बड़ी
 
अतिक्रमण का सबसे सीधा असर यातायात पर पड़ता है। जिस सड़क का निर्माण वाहनों और पैदल यात्रियों की सुविधा के लिए हुआ था, उसका एक बड़ा हिस्सा दुकानों, ठेलों, पार्किंग या निर्माण सामग्री की भेंट चढ़ जाता है। परिणामस्वरूप सड़क की उपयोगी चौड़ाई कम होती जाती है और यातायात का दबाव बढ़ता जाता है। कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने में घंटों लगना अब कई शहरों में असामान्य नहीं है। वाहन ईंधन जलाते रहते हैं, लोग समय गंवाते हैं और प्रदूषण बढ़ता रहता है। इस पूरी व्यवस्था की कीमत अंततः आम आदमी ही चुकाता है।
 
फुटपाथ गायब, पैदल यात्री परेशान
फुटपाथ का उद्देश्य पैदल चलने वालों को सुरक्षित रास्ता देना है। लेकिन जब फुटपाथ पर दुकानें, वाहन, विज्ञापन बोर्ड और अस्थायी निर्माण कब्जा कर लेते हैं, तो पैदल यात्री सड़क पर चलने के लिए मजबूर हो जाता है। बुजुर्ग, बच्चे, महिलाएं और दिव्यांग नागरिक ऐसी स्थिति में सबसे अधिक परेशान होते हैं। सड़क पर चलते पैदल यात्री और तेज रफ्तार वाहनों का टकराव दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ाता है। सवाल यह है कि जिस नागरिक के लिए फुटपाथ बनाया गया, उसे आखिर उसी फुटपाथ से हटने के लिए क्यों मजबूर होना पड़े?
जलभराव की समस्या को बढ़ाता अतिक्रमण
 
अतिक्रमण का एक गंभीर और अक्सर नजरअंदाज किया जाने वाला परिणाम जलभराव है। नालियों और जलनिकासी के रास्तों पर निर्माण होने से बारिश का पानी अपना प्राकृतिक रास्ता नहीं पा पाता। कई जगह नालियां ढक दी जाती हैं या उनका आकार इतना छोटा कर दिया जाता है कि पानी का प्रवाह बाधित होने लगता है। बारिश होते ही सड़कें तालाब में बदल जाती हैं। घरों और दुकानों में पानी घुसता है, यातायात ठप होता है और नागरिकों को घंटों परेशानी उठानी पड़ती है। हर वर्ष जलभराव के बाद सफाई और नाला खुदाई की कवायद होती है, लेकिन यदि जलनिकासी के रास्तों पर कब्जे कायम रहें तो समस्या स्थायी रूप से कैसे समाप्त होगी?
अतिक्रमण और भ्रष्टाचार का सवाल
 
अतिक्रमण केवल प्रशासनिक कमजोरी का परिणाम है या इसके पीछे किसी स्तर पर मिलीभगत भी है—यह सवाल बार-बार उठता है। किसी सड़क या सार्वजनिक जमीन पर एक दिन में स्थायी कब्जा नहीं हो जाता। पहले अस्थायी कब्जा होता है, फिर वह धीरे-धीरे स्थायी रूप लेता है और अंततः नागरिक उसे सामान्य स्थिति मानने लगते हैं।
यदि नियम स्पष्ट हैं और सरकारी जमीन की निगरानी होती है तो वर्षों तक अवैध निर्माण कैसे खड़े रहते हैं? यदि कार्रवाई होती है तो कुछ समय बाद वही स्थान फिर अतिक्रमण से कैसे भर जाते हैं?
 
इन सवालों का जवाब केवल छोटे दुकानदार या ठेले वाले को दोषी ठहराकर नहीं दिया जा सकता। व्यवस्था को यह भी देखना होगा कि अतिक्रमण को पनपने का अवसर कौन देता है और कार्रवाई के बाद उसे दोबारा खड़ा होने से कौन रोकता है।
रोजगार बनाम व्यवस्था—समस्या का कठिन पक्ष
 
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का दूसरा पहलू भी है। बड़ी संख्या में छोटे दुकानदार, रेहड़ी-पटरी वाले और फुटपाथ पर कारोबार करने वाले लोग अपनी आजीविका के लिए सार्वजनिक स्थानों पर निर्भर हैं। अचानक सामान हटाने से उनकी रोजी-रोटी प्रभावित होती है। इसलिए समाधान केवल बुलडोजर या जबरन हटाने में नहीं है। प्रशासन को व्यवस्थित वेंडिंग जोन, वैकल्पिक बाजार और पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था विकसित करनी होगी। गरीब की रोजी भी बचे और सार्वजनिक रास्ता भी—यह संतुलन ही वास्तविक प्रशासनिक सफलता होगी।
कानून सबके लिए समान होना चाहिए
 
अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई में सबसे बड़ी आवश्यकता समानता की है। यदि गरीब की छोटी दुकान हटाई जाए लेकिन प्रभावशाली व्यक्ति का बड़ा अवैध निर्माण वर्षों तक खड़ा रहे, तो नागरिकों का कानून और प्रशासन पर विश्वास कमजोर होता है।
 
कानून का अर्थ तभी है जब वह बिना भेदभाव लागू हो। सड़क पर कब्जा करने वाला चाहे छोटा दुकानदार हो या बड़ा कारोबारी, सार्वजनिक जमीन पर अवैध निर्माण करने वाला चाहे कोई भी हो—नियम सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए।
शहर केवल वाहनों के लिए नहीं हैं
 
शहरी नियोजन में अक्सर सड़क चौड़ी करने, फ्लाईओवर बनाने और यातायात बढ़ाने पर जोर दिया जाता है, लेकिन पैदल चलने वाले नागरिक की जरूरतों को उतना महत्व नहीं मिलता। वास्तव में स्वस्थ शहर वह है जहां व्यक्ति सुरक्षित पैदल चल सके, सार्वजनिक परिवहन तक आसानी से पहुंच सके और बारिश के दिनों में जलभराव से न जूझे।
अतिक्रमण हटाना केवल सड़क खाली कराने का अभियान नहीं होना चाहिए। यह शहर को नागरिकों के लिए वापस हासिल करने की प्रक्रिया होनी चाहिए।
आम आदमी की जिंदगी कब तेज चलेगी?
 
आज आम नागरिक का बड़ा हिस्सा अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में अनावश्यक समय यातायात, जाम, पार्किंग और जलभराव में गंवा देता है। जिस दूरी को कुछ मिनटों में पूरा होना चाहिए, वह घंटों में पूरी होती है। यही वह स्थिति है जिसे कहा जा सकता है—शहर बढ़ रहे हैं, लेकिन आम आदमी की जिंदगी रेंग रही है।
अतिक्रमण की समस्या का स्थायी समाधान राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी और बेहतर शहरी नियोजन से ही संभव है। केवल अभियान चलाकर तस्वीर नहीं बदलेगी। अतिक्रमण हटाने के बाद उस स्थान का नियमित निरीक्षण, डिजिटल रिकॉर्ड, स्पष्ट पार्किंग नीति, व्यवस्थित वेंडिंग जोन और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी।
सड़कें जनता की हैं, फुटपाथ जनता के हैं, नालियां जनता के लिए हैं और सार्वजनिक जमीन भी जनता की संपत्ति है। जब इन पर कब्जा होता है तो नुकसान केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का होता है।
जरूरत इस बात की है कि शहरों को अतिक्रमण मुक्त करने की मुहिम को केवल दिखावटी कार्रवाई न बनाया जाए। प्रशासन को गरीब की आजीविका और नागरिकों के अधिकार—दोनों के बीच संतुलन कायम करना होगा। तभी शहरों की सड़कें खुलेंगी, जलभराव घटेगा, यातायात सुधरेगा और सबसे महत्वपूर्ण—आम आदमी की जिंदगी रेंगने के बजाय आगे बढ़ सकेगी।

 

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