सरदार पटेल को श्रद्धांजलि के साथ भारतीय मुद्राशास्त्र पर तीन दिवसीय कार्यशाला का समापन
सिक्कों के ऐतिहासिक सफर और डिजिटल मुद्रा के विकास पर विशेषज्ञों ने रखे विचार, प्रतिभागियों को वितरित किए गए प्रमाणपत्र
लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय की ओर से आयोजित ‘भारतीय मुद्राशास्त्र: परंपरा, विकास एवं विविध आयाम’ विषयक तीन दिवसीय कार्यशाला का शनिवार को समापन हो गया। अंतिम दिन दो सत्र आयोजित किए गए। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। निदेशक रेनू द्विवेदी सहित अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों ने सरदार पटेल को श्रद्धांजलि दी तथा राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सुरक्षा बनाए रखने की शपथ ली।

कार्यशाला के पहले सत्र में मुख्य वक्ता राज्य संग्रहालय, लखनऊ के निदेशक डॉ. विनय कुमार सिंह ने ‘सिक्कों का ऐतिहासिक सफर’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने वस्तु विनिमय प्रणाली से लेकर आधुनिक मुद्रा और डिजिटल भुगतान तक के विकास की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वस्तुओं के मूल्य निर्धारण और आपसी विनिमय में आने वाली कठिनाइयों के कारण एक सर्वमान्य माध्यम की आवश्यकता महसूस हुई, जिससे मुद्रा के विकास का रास्ता खुला।
डॉ. सिंह ने प्राचीन सिक्कों के निर्माण में धातुओं के चयन, उपलब्धता, टिकाऊपन और आर्थिक महत्त्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सिक्के केवल लेन-देन का साधन नहीं रहे, बल्कि इनके माध्यम से तत्कालीन राजनीतिक सत्ता, शासकों, धार्मिक मान्यताओं, कला, संस्कृति और व्यापारिक गतिविधियों की जानकारी भी मिलती है। उन्होंने क्रेडिट कार्ड और इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणालियों का उल्लेख करते हुए मुद्रा के बदलते स्वरूप पर भी विचार रखे।
इस अवसर पर निदेशक रेनू द्विवेदी ने व्याख्यान को विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन इतिहास, पुरातत्त्व और मुद्राओं के आर्थिक महत्त्व को समझने का अवसर देते हैं। उन्होंने अतिथियों का पौधा और स्मृति चिह्न भेंटकर स्वागत किया तथा भविष्य में भी इस तरह के शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित करने की प्रतिबद्धता जताई।
प्रतिभागियों को वितरित किए प्रमाणपत्र
दूसरे सत्र में समापन समारोह आयोजित हुआ। विशिष्ट अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर प्रो. एस.एन.एन. कपूर और कार्यक्रम अध्यक्ष एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. के.के. थपल्याल ने प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए।
प्रो. कपूर ने कहा कि ऐसी कार्यशालाओं से नई पीढ़ी को प्राचीन मुद्राओं के विकास, स्वरूप और ऐतिहासिक महत्त्व को समझने का अवसर मिलता है। उन्होंने इतिहास और पुरातत्त्व के विद्यार्थियों के लिए मुद्राशास्त्र के अध्ययन को महत्त्वपूर्ण बताया।
प्रो. थपल्याल ने तीन दिनों तक व्याख्यान देने वाले सभी वक्ताओं के प्रति आभार जताया। उन्होंने निदेशक रेनू द्विवेदी को आयोजन के लिए धन्यवाद देते हुए भविष्य में भी विभिन्न विषयों पर कार्यशालाएं और अकादमिक कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता बताई।
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को भारतीय मुद्राओं के इतिहास, विकास, निर्माण तकनीक, कलात्मक विशेषताओं और ऐतिहासिक महत्त्व की जानकारी मिली। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मनोज कुमार यादव ने किया। इस अवसर पर प्रो. प्रशांत श्रीवास्तव और प्रो. दानिश मोइन सहित विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारी मौजूद रहे।


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