आसिम मुनीर की सख्त नीति से खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ सकता है विद्रोह, खनिज संपदा पर भी नजर
सैन्य दबाव और प्रांतीय अधिकारों में दखल से पश्तून संगठनों में नाराजगी की आशंका, बलूचिस्तान जैसे हालात बनने की चेतावनी
स्वतंत्र प्रभात।
एथेंस। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की ‘हार्ड-स्टेट’ यानी कठोर राज्य नीति खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में असंतोष बढ़ा सकती है। एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि विरोध और प्रतिरोध को अधिक सैन्य बल के इस्तेमाल से नियंत्रित करने की रणनीति उलटा असर डाल सकती है। चार करोड़ से अधिक आबादी वाले इस प्रांत में पहले से ही सक्रिय सशस्त्र विद्रोह, मजबूत राजनीतिक संगठन और अफगानिस्तान से लगी संवेदनशील सीमा सुरक्षा के लिहाज से बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा इस नीति की सबसे बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है। यहां सुरक्षा संकट के साथ राजनीतिक अधिकारों और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण का विवाद भी गहराता दिखाई दे रहा है।
खनिज संपदा पर संघीय नियंत्रण बढ़ाने की आशंका
रिपोर्ट में कहा गया है कि खैबर पख्तूनख्वा में महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों के दोहन की संभावनाएं अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई हैं। खनिज भंडारों का व्यापक भूवैज्ञानिक आकलन नहीं हुआ है, प्रसंस्करण क्षमता सीमित है और बिगड़ते सुरक्षा हालात के कारण खनन गतिविधियों को आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है।
आशंका जताई गई है कि सुरक्षा अभियानों के लिए सैन्य प्रतिष्ठान केंद्र सरकार से अधिक बजट की मांग कर सकता है। इसके साथ ही प्रांत के खनिज संसाधनों पर नियंत्रण मजबूत करने और उन्हें पश्चिमी देशों के खरीदारों तक पहुंचाने की कोशिश भी हो सकती है।
आपातकालीन व्यवस्था से बढ़ा राजनीतिक विवाद
रिपोर्ट के मुताबिक, 11 अक्टूबर 2026 को खैबर पख्तूनख्वा में लागू की गई संवैधानिक व्यवस्था ने प्रांत के खनिज संसाधनों पर संघीय नियंत्रण की राह में मौजूद बाधाओं को कमजोर कर दिया है। इसमें संविधान के अनुच्छेद 232 और 234 के तहत आपातकालीन शक्तियों तथा गवर्नर शासन लागू किए जाने का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संघीय और प्रांतीय कानूनों के बीच टकराव की स्थिति में संघीय कानून प्रभावी होगा। इसके साथ ही मुख्यमंत्री सोहैल अफरीदी को निवारक हिरासत में लिए जाने की बात भी कही गई है।
पाकिस्तान के 18वें संवैधानिक संशोधन के तहत खनिज संसाधनों को प्रांतीय विषय माना गया है। ऐसे में निर्वाचित विधानसभा की अनुपस्थिति और संघीय नियंत्रण बढ़ने की आशंका ने पश्तून राजनीतिक समूहों के बीच संदेह पैदा किया है।
हिंसा और पुलिसकर्मियों की मौतों में बढ़ोतरी
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 की पहली छमाही में खैबर पख्तूनख्वा में पुलिसकर्मियों की मौतों की संख्या बढ़कर 122 हो गई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 63 था।
वहीं, जुलाई से सितंबर 2026 के बीच हिंसा से संबंधित मौतों की संख्या 556 दर्ज की गई, जो इससे पिछली तिमाही में 475 थी। पाकिस्तान सरकार ने बिगड़ती सुरक्षा स्थिति को आपातकाल लागू करने का आधार बताया है।
बलूचिस्तान जैसे हालात बनने की चेतावनी
रिपोर्ट का आकलन है कि निर्वाचित प्रांतीय सरकार को हटाना, मुख्यमंत्री को हिरासत में लेना और प्राकृतिक संसाधनों पर संघीय नियंत्रण बढ़ाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इससे उग्रवादी संगठनों को अपने पक्ष में समर्थन जुटाने का नया मुद्दा मिल सकता है।
विश्लेषण में चेतावनी दी गई है कि यदि स्थानीय जनता और राजनीतिक समूहों में यह धारणा मजबूत हुई कि उनके अधिकारों और संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण थोपा जा रहा है, तो विरोध और हिंसा बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में खैबर पख्तूनख्वा में भी बलूचिस्तान जैसी प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी जटिलताएं पैदा होने का खतरा है।


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