वसुधैव कुटुम्बकम भारत की वैश्विक धारणा और भावना

संपूर्ण मानवता के लिए उदात्त दृष्टि

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भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन केवल अपने परिवार या राष्ट्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने संपूर्ण मानवता को एक परिवार मानने की उदात्त दृष्टि प्रदान की है। उपनिषदों का प्रसिद्ध वाक्य "वसुधैव कुटुम्बकम्" केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन जीने की ऐसी शैली है जिसमें समस्त सृष्टि के प्रति आत्मीयता, करुणा, सह-अस्तित्व और समरसता का भाव निहित है। आज जब दुनिया स्वार्थ, हिंसा, युद्ध, आर्थिक असमानता और सामाजिक विघटन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब यह भारतीय जीवन-दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।

मनुष्य की महानता उसके धन के परिमाण से नहीं, बल्कि उसके हृदय की विशालता से आँकी जाती है। किसी धनी व्यक्ति द्वारा अपनी विपुल संपत्ति का थोड़ा-सा भाग दान करना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है, किंतु उससे कहीं अधिक महान वह व्यक्ति है, जिसके पास सीमित संसाधन होने के बावजूद वह अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर किसी जरूरतमंद की सहायता करता है। यही वास्तविक परोपकार है। संत कबीर ने कहा है वृक्ष कबहुँ नहीं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर, अर्थात प्रकृति का प्रत्येक तत्व दूसरों के लिए जीना सिखाता है।

जियो और जीने दो का सिद्धांत तथा वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना जिस समाज में सशक्त होती है, उस समाज की प्रगति को कोई रोक नहीं सकता। ऐसे समाज में विश्वास, सहयोग, नैतिकता और संवेदनशीलता का वातावरण निर्मित होता है। महात्मा गांधी का कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि स्वयं को पाने का सर्वोत्तम तरीका है कि स्वयं को दूसरों की सेवा में खो दिया जाए।

मनुष्य का जीवन उत्साह, संघर्ष और निरंतर विकास की यात्रा है। जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है और विकास की संभावनाएँ भी परिवर्तन के साथ ही जन्म लेती हैं। जो व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ समाज और मानवता के कल्याण के लिए जीता है, वही जीवन की वास्तविक सार्थकता को प्राप्त करता है। स्वामी विवेकानंद का यह प्रेरक संदेश प्रत्येक व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक है— उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।

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शास्त्रों में पुनर्जन्म की अवधारणा का विस्तार से वर्णन मिलता है। अनेक लोग यह मानते हैं कि इस जन्म के शुभ कर्म अगले जन्म को श्रेष्ठ बनाते हैं। यह आस्था भारतीय अध्यात्म का महत्वपूर्ण पक्ष है। किंतु यदि दार्शनिक दृष्टि से विचार करें तो वर्तमान जीवन ही हमारे हाथ में उपलब्ध सबसे बड़ा सत्य है। भविष्य या अगले जन्म की कल्पनाओं में वर्तमान के कर्तव्यों की उपेक्षा करना उचित नहीं कहा जा सकता। इसलिए आवश्यक है कि हम इसी जीवन को उत्कृष्ट बनाएं, इसी जीवन में मानवता के लिए उपयोगी कार्य करें और समाज के लिए ऐसी विरासत छोड़ जाएँ, जो आने वाली पीढ़ियों का मार्ग आलोकित करे।

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जीवन के उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकते हैं। कोई आर्थिक समृद्धि चाहता है, कोई राजनीति में प्रतिष्ठा, कोई विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धि, कोई साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा या व्यवसाय में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता है। लक्ष्य चाहे जो भी हो, उसकी प्राप्ति के लिए अपनाए गए साधनों की शुद्धता ही व्यक्ति के चरित्र का वास्तविक परिचय देती है। महात्मा गांधी का यह विचार सदैव स्मरणीय है साध्य जितना पवित्र हो, साधन भी उतने ही पवित्र होने चाहिए।

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मनुष्य को अपने जीवन में साहस, संयम, आत्मविश्वास, अनुशासन और तपस्या के साथ आगे बढ़ना चाहिए। असफलता से घबराने के स्थान पर उसे सीख के रूप में स्वीकार करना चाहिए। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम कहा करते थे कि सपने वे नहीं होते जो सोते समय आते हैं, सपने वे होते हैं जो आपको सोने नहीं देते। यही स्वप्न जब कठोर परिश्रम और सकारात्मक चिंतन से जुड़ते हैं, तब वे समाज के लिए प्रेरणा बन जाते हैं।

मानवीय संवेदनाएँ ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ बनाती हैं। यदि जीवन केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक सीमित रह जाए तो उसकी सार्थकता अधूरी रह जाती है। सच्चा जीवन वही है जो अपने तन, मन और धन का कुछ अंश समाज के वंचित, पीड़ित और असहाय वर्ग के उत्थान के लिए समर्पित कर सके। गौतम बुद्ध ने कहा था— हजारों दीपक एक दीपक से जल सकते हैं, फिर भी उस दीपक का प्रकाश कम नहीं होता। ठीक उसी प्रकार दूसरों के जीवन में आशा का प्रकाश फैलाने से हमारा जीवन और अधिक प्रकाशित होता है।

अनेक चिंतकों ने जीवन को रंगमंच की संज्ञा दी है। हम सभी विभिन्न भूमिकाएँ निभाते हुए अपने जीवन का अभिनय करते हैं। किंतु इन भूमिकाओं की सफलता हमारे पद, प्रतिष्ठा या वैभव से नहीं, बल्कि हमारी सच्चाई, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय व्यवहार से निर्धारित होती है। यही गुण व्यक्ति को समाज में स्थायी सम्मान दिलाते हैं। सफलता और असफलता जीवन के दो अविभाज्य पक्ष हैं। जो व्यक्ति सफलता में विनम्र और असफलता में धैर्यवान रहता है, वही वास्तव में परिपक्व व्यक्तित्व का स्वामी होता है।

लोभ, लालच, अहंकार और असीमित इच्छाएँ मनुष्य को भीतर से खोखला बना देती हैं, जबकि संतोष, संयम और नैतिकता उसे आत्मिक समृद्धि प्रदान करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि आर्थिक उन्नति का प्रयास छोड़ दिया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि आध्यात्मिक मूल्यों, सांस्कृतिक चेतना और आर्थिक प्रगति के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यही संतुलित दृष्टिकोण एक स्वस्थ समाज का निर्माण करता है। जीवन का प्रत्येक क्षण परिवर्तनशील है। परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। किंतु परिवर्तन का अर्थ भाग्यवाद नहीं है। भाग्य और कर्म दोनों समानांतर चलने वाली प्रक्रियाएँ हैं। भाग्य परिस्थितियाँ दे सकता है, परंतु कर्म उन परिस्थितियों का परिणाम बदलने की क्षमता रखता है।

भगवद्गीता का प्रसिद्ध संदेश है कि कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन,आज भी मनुष्य को निष्काम कर्म की प्रेरणा देता है। जब व्यक्ति कर्म को अपना धर्म मान लेता है और परिणामों की अत्यधिक चिंता से मुक्त होकर कार्य करता है, तब उसके भीतर निराशा की संभावनाएँ स्वतः कम होने लगती हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों से आगे बढ़कर वैश्विक मानवता के हित में सोचने की आदत विकसित करे। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का कुछ अंश समाज के लिए समर्पित कर दे, तो गरीबी, भेदभाव, हिंसा और असमानता जैसी अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः संभव हो सकता है।

यही "वसुधैव कुटुम्बकम्" का वास्तविक स्वरूप है— जहाँ समस्त मानवता एक परिवार है और प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी है। जीवन की सफलता केवल लंबा जीवन जीने में नहीं, बल्कि उपयोगी जीवन जीने में है। यदि हमारा जीवन किसी एक व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला सके, किसी निराश मन में आशा जगा सके और समाज में सद्भाव, करुणा तथा मानवता के बीज बो सके, तभी हमारा जन्म सार्थक कहलाएगा। यही भारतीय संस्कृति का संदेश है, यही मानव जीवन का परम उद्देश्य है और यही "वसुधैव कुटुम्बकम्" की सच्ची साधना है।

संजीव ठाकुर

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