मुज़फ्फरनगर में बंधुआ मजदूरों के कथित उत्पीड़न मामले पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का स्वतः संज्ञान

 यूपी सरकार से दो सप्ताह में रिपोर्ट तलब

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नई दिल्ली। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जिले में एक पेपर प्लेट निर्माण फैक्ट्री में बंधुआ मजदूरों के कथित उत्पीड़न और अमानवीय व्यवहार के मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने इस प्रकरण को मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन से जुड़ा मामला माना है।

मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, मुज़फ्फरनगर के मंडी गांव स्थित एक पेपर प्लेट फैक्ट्री में 12 मजदूरों को करीब डेढ़ वर्ष तक कथित रूप से बंधक बनाकर काम कराया गया। आरोप है कि उनसे देर रात तक लगातार काम लिया जाता था, जबकि उन्हें पर्याप्त भोजन, उचित मजदूरी और मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं कराई जाती थीं।

बताया गया कि पीड़ित मजदूरों में से एक किसी तरह फैक्ट्री से निकलने में सफल रहा और उसने तितावी थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के बाद पुलिस ने छापेमारी कर अन्य मजदूरों को भी फैक्ट्री से मुक्त कराया।

मेडिकल जांच में कई मजदूरों के शरीर पर चोट, कटने के निशान, हड्डियां टूटने तथा लंबे समय तक शारीरिक प्रताड़ना के संकेत मिले हैं। पुलिस जांच में एक व्यक्ति की मृत्यु की भी पुष्टि हुई है। साथ ही यह जांच जारी है कि इस दौरान किसी अन्य व्यक्ति की भी मौत तो नहीं हुई।

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा कि यदि मीडिया में प्रकाशित तथ्य सही पाए जाते हैं, तो यह मानवाधिकारों का अत्यंत गंभीर उल्लंघन है। आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर मामले की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

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इसके अतिरिक्त आयोग ने मुज़फ्फरनगर के जिलाधिकारी को श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की मानक कार्यप्रणाली (SOP) तथा बंधुआ मजदूरी प्रथा (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के प्रावधानों के अनुरूप पूरे मामले की जांच सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। आयोग ने यह भी कहा है कि सभी मुक्त कराए गए मजदूरों का ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकरण कराया जाए तथा आयोग द्वारा 8 दिसंबर 2021 को जारी परामर्श के अनुसार उनके पुनर्वास और अन्य आवश्यक सहायता संबंधी कार्रवाई की जाए।

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25 जून 2026 को प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पीड़ित मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, झारखंड तथा नेपाल के निवासी हैं। आरोप है कि उन्हें रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और अन्य सार्वजनिक स्थानों से रोजगार, नियमित वेतन, भोजन और रहने की सुविधा का लालच देकर फैक्ट्री लाया गया था।

फैक्ट्री पहुंचने के बाद कथित रूप से उनके मोबाइल फोन और पहचान पत्र छीन लिए गए ताकि वे अपने परिवारों से संपर्क न कर सकें। रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि मजदूरों को डराने और उनके भागने से रोकने के लिए पिटबुल नस्ल के कुत्तों का इस्तेमाल किया जाता था।

अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की निगरानी में मामले की जांच आगे बढ़ेगी। आयोग द्वारा मांगी गई रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई और पीड़ित मजदूरों के पुनर्वास संबंधी निर्णय लिए जाने की संभावना है।

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