हे समाज, कुछ चेहरों की भूल पर हर बेटी को दोषी मत ठहराओ

बेटियों की रोशनी को कुछ परछाइयों से क्यों डराया जा रहा है? 

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कृति आरके जैन

यदि किसी मोहल्ले में एक घर की दीवार गिर जाएतो क्या पूरा शहर जर्जर घोषित कर दिया जाता हैयदि एक डॉक्टर लापरवाह निकल जाएतो क्या पूरा चिकित्सा जगत अपराधी हो जाता हैफिर आखिर सिया और सोनम जैसी आठ-दस लड़कियों के कुछ चर्चित मामलों को आधार बनाकर करोड़ों भारतीय बेटियों के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाने का साहस समाज कहाँ से ले आता हैआज सोशल मीडिया ने इसी अन्यायपूर्ण प्रवृत्ति को सामान्य बना दिया है। कुछ नामों को बार-बार दोहराइएउन्हें वायरल कीजिए और फिर पूरी पीढ़ी को उसी रंग में रंग दीजिए। यही है 'सिया–सोनम सिंड्रोम'— एक ऐसा दृष्टिदोषजहाँ मुट्ठीभर परछाइयों को इतना फैलाया जाता है कि करोड़ों बेटियों की उजली धूप भी दिखाई देना बंद हो जाती है।

यह केवल सोशल मीडिया का खेल नहींबल्कि चयनात्मक दृष्टि का परिणाम है। इतिहास बताता है कि जब भी समाज बदलता हैपरिवर्तन से असहज लोग पूरे परिदृश्य को नहींबल्कि अपने पूर्वाग्रहों के अनुकूल कुछ उदाहरण चुनकर उन्हें ही सच साबित करने लगते हैं। आज बेटियाँ शिक्षाविज्ञानखेलसेनान्यायपालिकाप्रशासनउद्यमिता और सामाजिक नेतृत्व तक हर क्षेत्र में नए कीर्तिमान गढ़ रही हैं। यही बदलाव कुछ लोगों को अखरता हैइसलिए वे चेरी-पिकिंग के सहारे कुछ वायरल घटनाओं को पूरी पीढ़ी का चेहरा बना देते हैं। प्रश्न यह है कि यदि कुछ लड़कियों की गलती से सभी लड़कियों का आकलन होगातो क्या यही कसौटी पुरुषों पर भी लागू होगीयदि उत्तर 'नहींहैतो यह तर्क नहींबल्कि सुविधानुसार गढ़ा गया पूर्वाग्रह है।

विडंबना यह है कि जो बेटियाँ समाज को नई दिशा दे रही हैंवे शायद ही कभी बहस का विषय बनती हैं। अरुणिमा सिन्हा ने कृत्रिम पैर के सहारे माउंट एवरेस्ट फतह कर अदम्य इच्छाशक्ति की मिसाल कायम की। सुनीता कृष्णन जैसी सामाजिक कार्यकर्ता ने हैदराबाद में हजारों लड़कियों को ट्रैफिकिंग और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं से बचाया तथा उन्हें नई जिंदगी दी। ऐश्वर्या सागर जैसी युवा उद्यमी ग्रामीण लड़कियों को डिजिटल शिक्षा और आत्मनिर्भरता से जोड़ रही हैं। इनके जैसी हजारों बेटियाँ प्रतिदिन समाज का भविष्य गढ़ रही हैंफिर भी वे सुर्खियाँ नहीं बनतीं। वजह साफ है—योगदान नहींविवाद बिकता है। मीडिया और सोशल प्लेटफ़ॉर्म भी जानते हैं कि नकारात्मक खबरें अधिक क्लिकअधिक प्रतिक्रियाएँ और अधिक प्रसार बटोरती हैं। अच्छाई प्रायः शांत रहती हैजबकि बुराई शोर मचाती है। नतीजा यह कि समाज धीरे-धीरे शोर को सच और मौन को महत्वहीन मानने लगता है।

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यदि वायरल वीडियो के शोर से बाहर निकलकर वास्तविक भारत को देखेंतो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। भारतीय बेटियाँ आज उपलब्धियों के नए प्रतिमान गढ़ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में उन्होंने कई बार पुरुष खिलाड़ियों से अधिक प्रभावशाली प्रदर्शन किया है। डॉक्टरइंजीनियरवैज्ञानिकपायलटसैनिककिसान और प्रशासक के रूप में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ रही है। एनएसएस और एनसीसी के आँकड़े भी सामुदायिक सेवा में युवतियों की उल्लेखनीय सक्रियता का प्रमाण हैं। उच्च शिक्षा में उनका प्रवेश बढ़ रहा हैसाक्षरता दर सुधर रही है और आर्थिक आत्मनिर्भरता का उनका संकल्प निरंतर मजबूत हो रहा है। फिर भी यदि समाज कुछ वायरल मामलों को ही पूरी सच्चाई मान लेतो यह वास्तविकता की नहींहमारी दृष्टि की विफलता है।

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दरअसलसिया–सोनम सिंड्रोम केवल बेटियों के साथ अन्याय नहीं करताबल्कि समाज की निर्णय-क्षमता भी कुंद करता है। यह तथ्यों पर नहींभावनाओं पर आधारित धारणा गढ़ता है। पूर्वाग्रह फैलाने वाले बार-बार वही उदाहरण सामने रखते हैं जो भयअविश्वास और आक्रोश को हवा देंजबकि वे उन हजारों बेटियों को अनदेखा कर देते हैं जो परिवारों की आर्थिक शक्ति हैंगाँवों में शिक्षा पहुँचा रही हैंअस्पतालों में जीवन बचा रही हैंप्रयोगशालाओं में शोध कर रही हैं और सीमाओं पर देश की रक्षा में जुटी हैं। सकारात्मक कहानियाँ कम दिखाई देती हैंक्योंकि वे उत्तेजना नहींप्रेरणा जगाती हैं। जबकि राष्ट्र उत्तेजना से नहींप्रेरणा से आगे बढ़ते हैं। इसलिए कुछ अपवादों को संपूर्ण सत्य बना देना समाज और उसके भविष्य—दोनों के साथ अन्याय है।

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इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि गलतियों को अनदेखा किया जाए। जो दोषी हैउसे कानून के अनुसार दंड मिलना ही चाहिए—चाहे वह लड़की हो या लड़का। किंतु न्याय का तकाज़ा है कि सजा व्यक्ति को मिलेपूरे वर्ग को नहीं। हर बेटी को सिया या सोनम मान लेना उतना ही अविवेकपूर्ण हैजितना किसी एक पुरुष के अपराध के आधार पर समूचे पुरुष समाज को दोषी ठहराना। परिपक्व समाज वही हैजो व्यक्ति और समुदाय के बीच का अंतर समझे। बेटियों को संदेह की दीवारों में कैद करने के बजाय विश्वासशिक्षाअवसर और सही मार्गदर्शन दिया जाएक्योंकि यही एक संतुलित और प्रगतिशील समाज की सबसे मजबूत नींव है।

अब समय आ गया है कि हम अपनी दृष्टि बदलें। किसी छोटे से अंधेरे को इतना विशाल बना देना कि पूरा सूरज ही ओझल हो जाएयह यथार्थ नहींदृष्टिदोष है। इतिहास अपवादों से नहींबहुसंख्यक के योगदान से लिखा जाता है। सिया और सोनम जैसी घटनाएँ अपराध हो सकती हैंपर वे भारतीय बेटियों का चरित्र-पत्र नहीं हैं। इस देश की पहचान उन लाखों बेटियों से बनती हैजो प्रयोगशालाओं में शोध कर रही हैंखेतों में श्रम कर रही हैंसीमाओं पर डटी हैंस्टार्टअप खड़े कर रही हैंअदालतों में न्याय की आवाज़ बन रही हैंपरिवारों का संबल हैं और विश्व मंच पर भारत का मान बढ़ा रही हैं। इसलिए आवश्यकता 'सिया–सोनम सिंड्रोमको नहींभारत की बेटियों के वास्तविक स्वरूप को सामने लाने की है। आखिर कुछ परछाइयाँ कभी सूरज की पहचान नहीं बन सकतीं।

कृति आरके जैन

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