लोक भाषाओं में बिखरा हुआ है राष्ट्रीयता का आलोक - सर्वेश कुमार सिंह

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लखनऊ, उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान एवं नेशनल पी जी कॉलेज के संयुक्त तत्वाधान में " लोक भाषाओं में राष्ट्रीय चेतना" विषयक संगोष्ठी का आयोजन नेशनल पी जी कॉलेज के सभागार में आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो सूर्य प्रसाद दीक्षित ने की, उन्होंने कहा कि लोक भाषाएं सदा से ही राष्ट्रीय चेतना की संवाहक रही है। आज़ादी के लिये संघर्ष के समय जन जन तक वीरता के भाव जाग्रत करने के लिए साहित्यकारों लोक भाषा में रचनाएं की। 'चरखवा चालू रहे, कदम कदम बढ़ाए जा, झंडा ऊंचा रहे हमारा जैसे दर्जनों गीत स्वतंत्रता के दीवानों के लिए प्रेरणा का कार्य किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बहुत सारा साहित्य रचकर तत्कालीन परिवेश को प्रस्तुत किया, भीतर सब रस चूसे बाहर बाहर हँसि हँसि रीझे जाहिर बातन मा अति तेज ऐ सखि साजन नहि अंग्रेज।पद्म श्री विद्या बिंदु सिंह ने लोक गीतों में व्याप्त राष्ट्रीय चेतना को अभिव्यक्त किया। उन्होंने विवाह में गया जाने वाला बन्ना लोक गीत में राष्ट्रीय चेतना को रेखांकित किया।
 
प्रो हरि शंकर मिश्र ने लोक भाषाओं में राष्ट्रीय चेतना को ऐतिहासिक विवेचन प्रस्तुत किया। भाषा संस्थान के निदेशक सर्वेश कुमार सिंह ने कहा कि लोक भाषाओं में राष्ट्रीयता का आलोक बिखरा हुआ है और अपनी मौखिक परंपरा में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही। हमने बहुत सी बातें और विवरण अपने घर में पूर्वजों से जानी। एक लोक गीत हमने उनसे सुना था उसकी कुछ पंक्तियां मुझे अभी भी याद है," कैसे खेलन जैहो सावन में कजरिया, बदरिया घिर आई ननदी,
 
कितने चढ़ गए सूली, कितने चढ़ गए फाँसी, कितने पीसत हुइए जेलन मा चकरिया, बदरिया घिर आई ननदी। कार्यक्रम का संचालन प्रो राम राम ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्राचार्य प्रो देवेन्द्र कुमार ने किया। आयोजन में भाषा संस्थान के अधिकारी, कर्मचारी तथा कॉलेज के अध्यापक एवं विद्यार्थी गण सम्मिलित हुए। सभी ने कार्यक्रम की अत्यंत प्रशंसा की |
 
 

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