गांधी की बुनियादी तालीम के विचार आज भी प्रासंगिक : प्रो. संतोष भदौरिया

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स्वतंत्र प्रभात।
 
ब्यूरो प्रयागराज ।
 
स्वराज विद्यापीठ में रविवारीय गोष्ठी के अंतर्गत प्रथम प्रेमशंकर खरे स्मृति व्याख्यान आयोजित किया गया। इस अवसर पर 'बुनियादी तालीम की बात बारास्ते गांधी' विषय पर व्याख्यान देते हुए गांधी विचार एवं शांति अध्ययन संस्थान, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व निदेशक प्रो. संतोष भदौरिया ने कहा कि गांधी की बुनियादी तालीम के सिद्धांत आज भी शिक्षा और समाज के पुनर्निर्माण के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। राष्ट्र का पुनरुत्थान गांधीवादी मूल्यों और शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता से ही संभव है।
 
उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान या अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य व्यक्ति का शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक विकास होना चाहिए। गांधी के 'लर्निंग बाय डूइंग' (करके सीखने) के सिद्धांत को रेखांकित करते हुए उन्होंने कौशल आधारित शिक्षा, मातृभाषा, श्रम की प्रतिष्ठा और आत्मनिर्भरता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अध्यापन की पद्धतियां विविध होनी चाहिए, ताकि विद्यार्थियों की रुचि और क्षमता के अनुरूप सीखने के अवसर मिल सकें।
 
व्याख्यान में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि गांधी की बुनियादी तालीम को अपनाकर शिक्षा को जीवन, श्रम, कौशल, नैतिकता और सामाजिक सरोकारों से जोड़ना समय की आवश्यकता है। चाहिए।
 
कार्यक्रम का विषय प्रवेश एवं संचालन करते हुए स्वप्निल श्रीवास्तव ने प्रेमशंकर खरे के व्यक्तित्व और कृतित्व को स्मरण किया। उन्होंने कहा कि यह व्याख्यान उनके शिक्षा, बौद्धिक चेतना और सामाजिक सरोकारों से जुड़े जीवन-मूल्यों को आगे बढ़ाने की एक सार्थक पहल है।
 
उल्लेखनीय है कि  प्रेमशंकर खरे प्रख्यात शिक्षाविद्, समाजसेवी एवं अग्रसेन इंटर कॉलेज, प्रयागराज के पूर्व प्राचार्य थे। उन्होंने 98 वर्ष की आयु तक ज्ञान-साधना और लेखन जारी रखा। चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान के लिए मरणोपरांत देहदान का उनका संकल्प उनकी उदात्त मानवीय दृष्टि और समाजसेवा के प्रति समर्पण का परिचायक था। उनके जन्मदिवस 1 नवंबर को प्रतिवर्ष स्मृति व्याख्यान आयोजित करने का उद्देश्य उनकी स्मृति, विचारों और जीवन-मूल्यों को अक्षुण्ण बनाए रखना तथा भावी पीढ़ियों को ज्ञान, विवेक और समाजसेवा के लिए प्रेरित करना है।
 
गोष्ठी में प्रो. रमा चरण त्रिपाठी, श्रीमती सुमन शर्मा, प्रो. राजाराम यादव, डॉ. कृष्ण स्वरूप आनन्दी, आनंद मालवीय,डॉ. पीयूष खरे, डॉ. रामप्रकाश सिंह, डॉ. अमितेश कुमार, संजय पांडेय, अशोक श्रीवास्तव कुमुद,और डॉ. सुदीप तिर्की सहित 40 से अधिक विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने सहभागिता की।
 
 

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