युवाओं के भविष्य का अधूरा हिसाब क्यों 

रोजगार पाने का भरोसा भी नहीं दे पाती, तब व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर विचार करना जरूरी हो जाता है।

हर्षिता यादव  Picture
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राजीव कुमार शुक्ला
 
शिक्षित बेरोजगारी केवल नौकरी की कमी नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था, आर्थिक नीतियों और सामाजिक प्राथमिकताओं के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है। देश में हर वर्ष लाखों युवा हाथों में डिग्रियां लेकर विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से बाहर निकलते हैं। किसी के पास स्नातक की उपाधि है, किसी ने परास्नातक किया है, तो कोई तकनीकी शिक्षा और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के सहारे अपने भविष्य को संवारने का सपना देखता है। परिवार अपनी बचत खर्च करता है, माता-पिता अपनी जरूरतें टालते हैं और युवा वर्षों तक मेहनत करके यह उम्मीद पालते हैं कि शिक्षा उन्हें आत्मनिर्भर बनाएगी। लेकिन जब पढ़ाई पूरी होने के बाद रोजगार का दरवाजा नहीं खुलता, तब एक सवाल पूरे समाज के सामने खड़ा हो जाता है—यदि डिग्रियां बढ़ रही हैं, तो अवसर क्यों नहीं बढ़ रहे हैं?
 
यह सवाल केवल किसी एक युवा की परेशानी नहीं है। यह देश की शिक्षा व्यवस्था, रोजगार नीति, आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ प्रश्न है। जिस शिक्षा को बेहतर जीवन की सीढ़ी माना गया, वही शिक्षा जब रोजगार की गारंटी तो दूर, रोजगार पाने का भरोसा भी नहीं दे पाती, तब व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर विचार करना जरूरी हो जाता है।
 
पिछले वर्षों में उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ी है। छोटे शहरों और कस्बों के युवा भी अब विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और निजी कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। इंटरनेट ने ज्ञान के नए रास्ते खोले हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पहले की तुलना में अधिक संसाधन उपलब्ध हैं। इसके बावजूद रोजगार की तलाश में भटकते युवाओं की समस्या गंभीर बनी हुई है।
 
इसका एक बड़ा कारण शिक्षा और रोजगार के बीच तालमेल की कमी है। अनेक संस्थानों में पाठ्यक्रम तो पढ़ाए जाते हैं, लेकिन विद्यार्थियों को उद्योगों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं मिल पाता। डिग्री पूरी करने के बाद युवा को पता चलता है कि नौकरी के लिए उससे ऐसे कौशल की अपेक्षा की जा रही है, जिन्हें सीखने का अवसर उसे पढ़ाई के दौरान मिला ही नहीं।
 
दूसरी ओर, केवल कौशल की कमी बताकर बेरोजगारी की पूरी जिम्मेदारी युवाओं पर डाल देना भी उचित नहीं है। यदि किसी क्षेत्र में प्रशिक्षित युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, तो वहां पर्याप्त रोजगार पैदा करना भी अर्थव्यवस्था और नीति-निर्माताओं की जिम्मेदारी है। हर युवा को यह कह देना कि वह अपने कौशल में सुधार करे, समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। कौशल जरूरी है, लेकिन कौशल का उपयोग करने के लिए अवसर भी जरूरी हैं।
 
शिक्षित बेरोजगारी का सबसे दर्दनाक पक्ष वह समय है, जो युवाओं की जिंदगी से धीरे-धीरे निकलता जाता है। कोई सरकारी नौकरी की तैयारी में वर्षों लगा देता है, कोई निजी कंपनियों के चक्कर काटता है और कोई हर नई भर्ती की सूचना को उम्मीद की तरह देखता है। आवेदन शुल्क, परीक्षा केंद्र तक पहुंचने का खर्च, कोचिंग और रहने-खाने की व्यवस्था परिवार की आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त बोझ डालती है।
 
कई बार भर्ती प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है। कहीं परीक्षा की तारीख बदलती है, कहीं परिणाम का इंतजार होता है, तो कहीं चयन के बाद नियुक्ति मिलने में देरी होती है। इस दौरान युवा की उम्र बढ़ती जाती है और अवसर सीमित होते जाते हैं। उसके सामने केवल रोजगार का सवाल नहीं रहता, बल्कि परिवार की जिम्मेदारी, विवाह, आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान जैसे प्रश्न भी खड़े हो जाते हैं।
 
सबसे अधिक चिंता तब होती है, जब किसी युवा की योग्यता पर संदेह नहीं होता, उसकी मेहनत में कमी नहीं होती, लेकिन उसे अपनी क्षमता साबित करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। बेरोजगारी की यह स्थिति धीरे-धीरे निराशा को जन्म देती है। समाज को समझना होगा कि युवाओं का समय केवल उनका निजी संसाधन नहीं, बल्कि देश की उत्पादक शक्ति भी है। इस शक्ति का वर्षों तक उपयोग न होना राष्ट्रीय विकास की भी हानि है।
 
हमारे समाज में सरकारी नौकरी को आज भी सुरक्षित भविष्य, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। इसके पीछे उचित कारण भी हैं—नियमित आय, सेवा संबंधी सुरक्षा और भविष्य की अपेक्षाकृत स्पष्ट योजना। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब लाखों युवाओं की आकांक्षाएं सीमित सरकारी पदों के इर्द-गिर्द सिमट जाती हैं।
 
सरकारी नौकरियों के लिए अत्यधिक प्रतिस्पर्धा यह बताती है कि स्थिर और सम्मानजनक रोजगार की मांग बहुत अधिक है। इसके विपरीत निजी क्षेत्र की अनेक नौकरियों में कम वेतन, अस्थायी नियुक्ति, अनिश्चित कार्यकाल और सामाजिक सुरक्षा की कमी युवाओं को आकर्षित नहीं करती। ऐसी स्थिति में केवल युवाओं को सरकारी नौकरी के पीछे भागने का दोष देना वास्तविक समस्या से मुंह मोड़ना होगा।
 
जरूरत ऐसे रोजगार तंत्र की है, जहां निजी क्षेत्र में भी सम्मानजनक वेतन, सुरक्षित कार्य परिस्थितियां, कौशल विकास और आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध हों। उद्यमिता को बढ़ावा देना भी जरूरी है, लेकिन प्रत्येक युवा उद्यमी नहीं बन सकता। व्यवसाय शुरू करने के लिए पूंजी, बाजार, मार्गदर्शन और जोखिम उठाने की क्षमता चाहिए। इसलिए स्वरोजगार को नौकरी का विकल्प बनाने के साथ-साथ उसकी वास्तविक कठिनाइयों को दूर करना भी आवश्यक है।

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