कानून सबके लिए बराबर है तो कार्रवाई में फर्क क्यों?
यही स्थिति पुलिस और शिकायतों के स्तर पर भी दिखाई देती है।
राजीव शुक्ला
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह विश्वास है कि देश में कानून सर्वोच्च है और कानून की नजर में हर नागरिक बराबर है। संविधान का मूल भाव भी यही है कि किसी व्यक्ति के साथ उसके पद, पैसे, प्रभाव, पहचान या राजनीतिक पहुंच के आधार पर अलग व्यवहार नहीं होना चाहिए। लेकिन जब आम आदमी अपने आसपास की व्यवस्था को देखता है तो उसके मन में एक असहज सवाल जरूर उठता है—अगर कानून सबके लिए बराबर है, तो कार्रवाई में फर्क क्यों दिखाई देता है? यह सवाल केवल किसी एक शहर, विभाग या सरकार का नहीं है।
यह उस व्यवस्था से जुड़ा सवाल है, जिसमें कानून बनाने से लेकर उसे लागू करने तक की पूरी प्रक्रिया शामिल है। एक गरीब व्यक्ति सड़क किनारे कुछ सामान रख देता है तो अतिक्रमण हटाने का अभियान तुरंत पहुंच जाता है। उसका ठेला हट जाता है, सामान जब्त हो जाता है और कभी-कभी जुर्माना भी लग जाता है। दूसरी ओर, वर्षों से सार्वजनिक जमीन, फुटपाथ या नाले पर प्रभावशाली लोगों के कब्जे की शिकायतें होती रहती हैं, लेकिन कार्रवाई की गति अचानक धीमी पड़ जाती है। सवाल यह नहीं कि अतिक्रमण हटना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या कानून की कसौटी सबके लिए समान है? यही स्थिति पुलिस और शिकायतों के स्तर पर भी दिखाई देती है।
आम नागरिक थाने में शिकायत लेकर जाता है तो उससे कई बार सबूत, गवाह और दस्तावेजों की लंबी सूची मांगी जाती है। प्रभावशाली व्यक्ति की शिकायत पर व्यवस्था कितनी तेजी से सक्रिय होती है, यह अनुभव कई लोगों के मन में व्यवस्था के प्रति सवाल पैदा करता है। यदि शिकायत सही है तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे शिकायतकर्ता गरीब हो या प्रभावशाली। और यदि शिकायत गलत है तो केवल दबाव या पहचान के आधार पर किसी निर्दोष को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। कानून का असली सम्मान तभी होगा जब उसका इस्तेमाल व्यक्ति देखकर नहीं, अपराध देखकर हो। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती कानूनों की कमी नहीं, बल्कि उनके निष्पक्ष और समान अनुपालन की है।
कानून की किताब में धाराएं सभी के लिए समान हो सकती हैं, लेकिन जमीन पर उनका इस्तेमाल समान है या नहीं—यही लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा है। अक्सर कार्रवाई की शुरुआत छोटे लोगों से होती है क्योंकि उन पर कार्रवाई करना आसान होता है। मजदूर, दुकानदार, ठेले वाला, गरीब परिवार या कमजोर व्यक्ति प्रशासन के सामने अपनी बात मजबूती से रखने की स्थिति में नहीं होता। लेकिन यही स्थिति व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा करती है। यदि कमजोर व्यक्ति को लगे कि कानून केवल उसी पर चलता है और ताकतवर व्यक्ति उससे बच सकता है, तो कानून के प्रति विश्वास कमजोर होने लगता है। न्याय व्यवस्था का आधार केवल सजा देना नहीं, बल्कि निष्पक्षता का भरोसा पैदा करना भी है।
यह भी समझना होगा कि हर कार्रवाई को राजनीतिक चश्मे से देखना उचित नहीं है। प्रशासन को अतिक्रमण हटाना है तो हटाना चाहिए, अवैध निर्माण पर कार्रवाई करनी है तो करनी चाहिए, अपराध पर मुकदमा दर्ज करना है तो दर्ज करना चाहिए। लेकिन कार्रवाई की पारदर्शिता और समानता अनिवार्य होनी चाहिए। यदि एक ही प्रकार के मामलों में दो अलग-अलग मानदंड अपनाए जाएंगे तो सवाल उठेंगे ही। सरकारें बदलती रहती हैं, अधिकारी आते-जाते रहते हैं, लेकिन संस्थाएं स्थायी होती हैं। इसलिए किसी भी व्यवस्था की सफलता इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसने कितनी कार्रवाइयां कीं, बल्कि इससे तय होनी चाहिए कि उसकी कार्रवाई कितनी निष्पक्ष, पारदर्शी और कानूनसम्मत थी।
आज जरूरत इस बात की है कि प्रशासन अपने हर बड़े अभियान के साथ यह भी स्पष्ट करे कि कार्रवाई का आधार क्या है। किस नियम के तहत कार्रवाई की गई? किन लोगों को नोटिस दिया गया? किन्हें समय दिया गया? कितनी शिकायतें मिलीं? कितनों पर कार्रवाई हुई? और क्या समान परिस्थितियों वाले अन्य मामलों में भी वही कार्रवाई की गई? ऐसी पारदर्शिता से केवल जनता के सवालों का जवाब नहीं मिलेगा, बल्कि ईमानदार अधिकारियों को भी राजनीतिक और बाहरी दबाव से बचाने में मदद मिलेगी। कानून का राज तब नहीं माना जाएगा जब केवल कानून की किताबें मौजूद हों। कानून का राज तब माना जाएगा जब एक साधारण नागरिक भी यह विश्वास कर सके कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति कितना भी ताकतवर क्यों न हो, गलत करेगा तो कानून उसके दरवाजे तक पहुंचेगा।
लोकतंत्र में सत्ता की असली ताकत विरोधियों को दबाने में नहीं, बल्कि अपने समर्थकों पर भी वही कानून लागू करने में होती है। प्रशासन की असली निष्पक्षता कमजोर पर कार्रवाई करने में नहीं, बल्कि ताकतवर के सामने भी नियमों को कायम रखने में दिखाई देती है। इसलिए आज सबसे जरूरी सवाल यही है—क्या हम ऐसा भारत बना रहे हैं जहां कानून व्यक्ति की पहचान नहीं, उसके कृत्य को देखता है?
यदि जवाब हां है तो हर कार्रवाई में समानता दिखाई देनी चाहिए। और यदि कहीं कार्रवाई में फर्क दिखाई देता है तो व्यवस्था को रक्षात्मक होने के बजाय आत्ममंथन करना चाहिए। क्योंकि जनता को केवल कार्रवाई नहीं चाहिए—उसे न्याय चाहिए। और न्याय वही है जिसमें कानून की नजर में न गरीब छोटा हो, न अमीर बड़ा; न आम नागरिक कमजोर हो, न प्रभावशाली व्यक्ति कानून से ऊपर। कानून का डर सबको हो और कानून पर भरोसा भी सबको हो—यही सुशासन की पहली पहचान है।


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