अवैध घुसपैठ पर सख्ती जरूरी, लेकिन कार्रवाई कानून के दायरे में

भारत की सुरक्षा और नागरिकता से जुड़ा प्रश्न आज पहले से कहीं अधिक गंभीर और संवेदनशील हो गया है।

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भारत की सुरक्षा और नागरिकता से जुड़ा प्रश्न आज पहले से कहीं अधिक गंभीर और संवेदनशील हो गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट की उस टिप्पणी ने इस बहस को नई दिशा दी है, जिसमें फर्जी आधार या फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से देश में पहचान स्थापित करने वाले विदेशी नागरिकों को प्राथमिकता के आधार पर खोजकर निर्वासित करने और केंद्र तथा राज्य की एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई गई है। दूसरी ओर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का यह कहना कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है और देश में रहने का अधिकार केवल वैध नागरिकों को है, सरकार की उस नीति को स्पष्ट करता है जिसमें अवैध घुसपैठ को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती माना जा रहा है।
 
दोनों घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। सवाल केवल कुछ विदेशी नागरिकों के फर्जी दस्तावेज हासिल करने का नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जिसके कारण कोई व्यक्ति भारत में प्रवेश करने के बाद अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर आधार, पैन, शैक्षणिक प्रमाणपत्र और यहां तक कि भारतीय पासपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज हासिल करने में सफल हो जाता है। यदि किसी विदेशी नागरिक के लिए व्यवस्था में इतनी बड़ी सेंध संभव है तो यह केवल दस्तावेजों की जालसाजी का मामला नहीं, बल्कि देश की प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती है।
 
बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष सामने आया मामला इस खतरे की गंभीरता को समझने के लिए पर्याप्त है। अफगानिस्तान के एक नागरिक के बारे में अदालत को बताया गया कि वीजा अवधि समाप्त होने के बाद भी वह भारत में रहा और कथित रूप से अपनी मूल पहचान छिपाकर दूसरी पहचान के नाम पर आधार, पैन और अन्य दस्तावेज हासिल किए। यदि न्यायिक प्रक्रिया में सामने आए तथ्य सही हैं तो यह जांच का विषय जरूर है कि संबंधित विभागों ने दस्तावेज जारी करते समय आवश्यक सत्यापन क्यों नहीं किया। एक व्यक्ति की पहचान अनेक सरकारी दस्तावेजों में अलग-अलग तरीके से स्थापित हो जाए, तो इससे व्यवस्था की कमजोर कड़ियां उजागर होती हैं।
 
यहां सबसे बड़ा प्रश्न एजेंसियों के बीच तालमेल का है। देश में विदेशी नागरिकों के प्रवेश और प्रवास से संबंधित काम कई विभागों और एजेंसियों के जिम्मे है। सीमा सुरक्षा बल, आव्रजन विभाग, पुलिस, खुफिया एजेंसियां, विदेशी नागरिकों से संबंधित प्रशासनिक तंत्र और पहचान से जुड़े विभागों के बीच सूचनाओं का समय पर आदान-प्रदान होना चाहिए। किसी व्यक्ति का वीजा समाप्त हो गया है, वह निर्धारित अवधि से अधिक समय से भारत में रह रहा है या उसके दस्तावेजों में संदिग्ध जानकारी है, तो यह सूचना संबंधित एजेंसियों तक तुरंत पहुंचनी चाहिए। तकनीक के इस दौर में अलग-अलग विभागों के रिकॉर्ड एक-दूसरे से जुड़े न हों और सूचनाएं अलग-अलग खानों में पड़ी रहें, तो सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।
 
इसलिए अब केवल जांच बढ़ाने की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था को आधुनिक बनाने की जरूरत है। पहचान संबंधी दस्तावेज जारी करने से पहले विदेशी नागरिकों के मामले में सत्यापन की प्रक्रिया अधिक कठोर होनी चाहिए। आधार पहचान का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है। इस अंतर को प्रशासनिक स्तर पर पूरी स्पष्टता के साथ समझना आवश्यक है। किसी विदेशी नागरिक को वैध आधार संबंधी सुविधा मिल सकती है या नहीं, यह कानून और निर्धारित नियमों के अनुसार तय होता है, लेकिन आधार को नागरिकता का प्रमाण मानकर आगे अन्य दस्तावेज जारी करने की प्रवृत्ति गंभीर समस्या पैदा कर सकती है।
 
भारतीय पासपोर्ट जैसे संवेदनशील दस्तावेज के लिए तो सत्यापन की व्यवस्था और भी मजबूत होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति ने फर्जी पहचान के आधार पर पासपोर्ट हासिल किया है तो केवल उस व्यक्ति पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी पता लगाना जरूरी है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले कौन थे, उनका इस्तेमाल किस स्तर पर हुआ और सरकारी तंत्र में किसी व्यक्ति की मिलीभगत या लापरवाही थी या नहीं। जब तक पूरे नेटवर्क पर प्रहार नहीं होगा, तब तक एक व्यक्ति को हटाने के बाद दूसरा व्यक्ति उसी रास्ते से व्यवस्था में प्रवेश कर सकता है।
 
अमित शाह का अवैध घुसपैठ को आंतरिक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और जनसांख्यिकी के लिए खतरा बताना भी इसी व्यापक चिंता की ओर संकेत करता है। सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध प्रवेश केवल सीमा प्रबंधन का विषय नहीं रह जाता। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक बिना वैध दस्तावेजों के देश में रह रहा है और बाद में फर्जी पहचान बना लेता है तो यह कानून व्यवस्था, संसाधनों और सुरक्षा व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। इसलिए घुसपैठ रोकना और अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान करना राज्य की स्वाभाविक जिम्मेदारी है।
 
लेकिन इस जिम्मेदारी के साथ एक दूसरी जिम्मेदारी भी जुड़ी है। किसी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर विदेशी घोषित नहीं किया जा सकता और न ही किसी भारतीय नागरिक को गलत पहचान या प्रशासनिक त्रुटि के कारण अपने अधिकारों से वंचित किया जाना चाहिए। कठोर कार्रवाई का अर्थ मनमानी कार्रवाई नहीं हो सकता। पहचान, नागरिकता और निर्वासन से संबंधित हर कदम स्पष्ट कानून, उचित जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इसी में है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन कायम रखा जाए।
 
अवैध घुसपैठ से निपटने की सबसे प्रभावी रणनीति सीमा से लेकर दस्तावेज जारी करने तक पूरी श्रृंखला को मजबूत करना होगी। सीमा पर निगरानी बढ़ाने के साथ यह सुनिश्चित करना होगा कि सीमा पार से आया कोई व्यक्ति फर्जी पहचान के सहारे देश की वैध नागरिक व्यवस्था में प्रवेश न कर सके। इसके लिए आधुनिक तकनीक, साझा डाटाबेस, दस्तावेजों की डिजिटल जांच और विभिन्न एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में सूचना साझा करने की व्यवस्था विकसित करनी होगी।
 
अदालत की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि केंद्र और राज्यों की एजेंसियां मिलकर काम करें। भारत जैसे विशाल देश में केवल केंद्र सरकार या केवल राज्य सरकार के प्रयासों से यह चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकती। सीमा से लगे राज्यों के साथ-साथ महानगरों में भी संदिग्ध दस्तावेजों और अवैध प्रवास से जुड़े मामलों पर समन्वित निगरानी जरूरी है। पुलिस के पास स्थानीय स्तर की जानकारी होती है, केंद्रीय एजेंसियों के पास व्यापक सुरक्षा संबंधी सूचनाएं होती हैं और आव्रजन व्यवस्था के पास प्रवेश तथा वीजा से संबंधित रिकॉर्ड। इन सभी सूचनाओं को एक साथ जोड़ना समय की मांग है।
 
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि फर्जी दस्तावेज बनाने और उन्हें उपलब्ध कराने वाले गिरोहों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो। अक्सर किसी अवैध पहचान के पीछे एक संगठित नेटवर्क काम करता है। दस्तावेज तैयार करने वाले, फर्जी पते उपलब्ध कराने वाले, पहचान सत्यापन में मदद करने वाले और आर्थिक लाभ लेकर सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर कराने वाले लोग यदि कार्रवाई से बच जाते हैं तो समस्या बनी रहेगी। ऐसे मामलों में केवल अंतिम लाभार्थी पर कार्रवाई करने के बजाय पूरे नेटवर्क की आर्थिक और डिजिटल जांच जरूरी है।
 
भारत की सुरक्षा नीति का मूल उद्देश्य देश की सीमाओं की रक्षा के साथ उसकी नागरिक व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखना भी होना चाहिए। नागरिकता और पहचान से जुड़े दस्तावेज जितने विश्वसनीय होंगे, उतना ही देश की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी। फर्जी दस्तावेजों के जरिए किसी विदेशी नागरिक का भारतीय पहचान तंत्र में प्रवेश करना केवल एक व्यक्ति की धोखाधड़ी नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर हमला है।
इसलिए बॉम्बे हाईकोर्ट की चिंता और केंद्रीय गृह मंत्री का संदेश दोनों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भारत को अपनी सीमाओं की रक्षा करनी ही होगी और अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान कर कानून के अनुसार कार्रवाई करनी होगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस अभियान में निर्दोष भारतीय नागरिक परेशान न हों और किसी समुदाय या समूह को सामूहिक रूप से संदेह की नजर से न देखा जाए। सुरक्षा का मजबूत तंत्र वही है जिसमें कठोरता के साथ निष्पक्षता भी हो।
 
आज आवश्यकता किसी भावनात्मक नारे से अधिक एक ऐसी प्रभावी व्यवस्था की है जिसमें भारत में प्रवेश करने वाले हर विदेशी नागरिक का रिकॉर्ड सुरक्षित हो, उसकी वैध अवधि समाप्त होने पर संबंधित एजेंसियों को स्वतः सूचना मिले, संदिग्ध दस्तावेजों की तत्काल जांच हो और फर्जी पहचान बनाने वाले पूरे नेटवर्क पर कार्रवाई हो। भारत की सुरक्षा केवल सीमा पर खड़े जवानों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों की विश्वसनीयता और सरकारी संस्थाओं के आपसी तालमेल से भी सुनिश्चित होती है।
 
देश किसी के लिए अवैध गतिविधियों का सुरक्षित ठिकाना नहीं हो सकता। लेकिन भारत की ताकत उसके कानून और संविधान में है। इसलिए अवैध घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई जितनी सख्त हो, उतनी ही कानूनसम्मत, पारदर्शी और प्रमाण आधारित भी होनी चाहिए। यही रास्ता राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करेगा और नागरिक व्यवस्था में जनता का विश्वास भी बनाए रखेगा।
        *कांतिलाल मांडोत*

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