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शहरों में अतिक्रमण: कार्रवाई गरीब पर, संरक्षण प्रभावशाली को क्यों
शहरों की सड़कें किसी भी महानगर की पहचान होती हैं। सड़कें केवल आवागमन का माध्यम नहीं, बल्कि शहर की अर्थव्यवस्था, रोजगार और नागरिक जीवन की धड़कन होती हैं। लेकिन जब इन्हीं सड़कों और फुटपाथों पर अतिक्रमण बढ़ता जाता है तो सबसे पहले प्रभावित होता है आम आदमी। पैदल चलने की जगह खत्म होती है, यातायात की रफ्तार थमती है, पार्किंग की समस्या बढ़ती है और छोटी-सी सड़क भी घंटों के जाम में बदल जाती है।
अतिक्रमण के खिलाफ अभियान चलाना निश्चित रूप से जरूरी है। सवाल अभियान चलाने पर नहीं, बल्कि उसके तरीके और निष्पक्षता पर है। आम धारणा यह बनती जा रही है कि जब कार्रवाई होती है तो सबसे पहले ठेला लगाने वाला, फुटपाथ पर छोटी दुकान चलाने वाला या रोज कमाकर परिवार पालने वाला व्यक्ति इसकी चपेट में आता है। दूसरी तरफ बड़े और प्रभावशाली अतिक्रमणों को लेकर कार्रवाई की गति कई बार उतनी तेज दिखाई नहीं देती।
यही वह सवाल है जिसे प्रशासन और नगर निकायों को गंभीरता से लेना चाहिए—क्या कानून सबके लिए समान है? अतिक्रमण सिर्फ गरीब की समस्या नहीं,
अतिक्रमण को केवल फुटपाथ पर बैठे छोटे दुकानदार की समस्या मानना वास्तविक तस्वीर को छोटा कर देना है। शहरों में अतिक्रमण कई स्तरों पर होता है। कहीं सड़क किनारे दुकानें फैल जाती हैं, कहीं व्यापारिक प्रतिष्ठान अपनी सीमा से बाहर सामान रख देते हैं, कहीं पार्किंग के नाम पर सार्वजनिक स्थान घेर लिया जाता है और कहीं निर्माण सामग्री लंबे समय तक सड़क पर पड़ी रहती है। कुछ स्थानों पर सार्वजनिक भूमि का स्थायी अथवा अस्थायी उपयोग भी विवाद का कारण बनता है। इसलिए अतिक्रमण की कार्रवाई भी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति देखकर नहीं, अतिक्रमण की प्रकृति और कानूनी स्थिति देखकर होनी चाहिए। अगर एक गरीब का ठेला सड़क घेरने के कारण हटाया जाता है तो उसी नियम के तहत बड़े प्रतिष्ठान द्वारा घेरा गया सार्वजनिक स्थान भी खाली कराया जाना चाहिए। तभी प्रशासन की कार्रवाई पर जनता का विश्वास कायम होगा। रोजी-रोटी और कानून के बीच संतुलन जरूरी यह भी सच है कि शहरों में हजारों परिवार छोटे व्यापार, ठेले, खोमचे और फुटपाथी कारोबार पर निर्भर हैं। उनके लिए सड़क किनारे की छोटी-सी जगह ही दुकान, रोजगार और परिवार की आय का साधन होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें सार्वजनिक रास्ता रोकने की अनुमति मिलनी चाहिए। लेकिन समाधान केवल सामान जब्त करने या दुकान हटाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। नगर निकायों को चाहिए कि वे व्यवस्थित वेंडिंग जोन, बाजार क्षेत्र और पार्किंग व्यवस्था विकसित करें। छोटे दुकानदारों का नियमन हो, लेकिन उनकी रोजी-रोटी भी सुरक्षित रहे। शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाना है तो गरीब को हटाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाना होगा।
प्रभावशाली अतिक्रमण पर भी वही पैमाना हो
सबसे बड़ा सवाल उस समय खड़ा होता है जब जनता को कार्रवाई में असमानता दिखाई देती है। यदि सड़क किनारे गरीब का अस्थायी ढांचा तुरंत हट जाता है, लेकिन बड़े प्रतिष्ठान द्वारा वर्षों से घेरा गया सार्वजनिक स्थान कार्रवाई से बचा रहता है, तो लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। प्रशासन के लिए इससे बड़ी चुनौती कोई नहीं कि कानून की निष्पक्षता पर ही सवाल उठने लगें। जरूरत इस बात की है कि अतिक्रमण विरोधी अभियान की शुरुआत सर्वेक्षण और पारदर्शी सूची से हो। किस स्थान पर किस प्रकार का अतिक्रमण है, उसकी स्थिति क्या है, संबंधित व्यक्ति या संस्था को क्या नोटिस दिया गया और कार्रवाई क्यों की जा रही है—इन सबका रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए। अभियान दिखावे का नहीं, व्यवस्था सुधारने का हो, अक्सर देखा जाता है कि अभियान शुरू होते ही कुछ दिनों तक सड़कों पर सख्ती दिखाई देती है। फुटपाथ खाली हो जाते हैं, सड़कें खुल जाती हैं और यातायात बेहतर होने लगता है। लेकिन कुछ समय बाद वही स्थिति लौट आती है।
इससे साफ है कि समस्या केवल अतिक्रमण हटाने की नहीं, बल्कि दोबारा अतिक्रमण रोकने की व्यवस्था बनाने की है। यदि किसी स्थान से अतिक्रमण हटाने के बाद वहां दोबारा कब्जा हो जाता है तो सवाल केवल कब्जा करने वाले पर नहीं, निगरानी व्यवस्था पर भी होना चाहिए। आखिर नियमित निरीक्षण किसकी जिम्मेदारी है?
भ्रष्टाचार की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जहां नियम जटिल हों, निरीक्षण कमजोर हो और कार्रवाई में भेदभाव की धारणा पैदा हो, वहां भ्रष्टाचार की आशंका भी जन्म लेती है। यदि किसी को हटाया जाता है और किसी दूसरे को उसी स्थान पर बने रहने दिया जाता है तो नागरिक स्वाभाविक रूप से पूछता है कि इसके पीछे कारण क्या है?
ऐसी स्थिति प्रशासन के लिए बेहद नुकसानदेह है। इसलिए अतिक्रमण अभियान में डिजिटल रिकॉर्ड, फोटो-वीडियोग्राफी, स्पष्ट नोटिस प्रक्रिया और कार्रवाई की सार्वजनिक जानकारी जैसी व्यवस्थाएं अपनाई जानी चाहिए। अधिकारी बदलते रहते हैं, लेकिन रिकॉर्ड व्यवस्था को स्थायी बनाया जा सकता है। यह प्रश्न केवल सड़क का नहीं, शहर की सोच का है। क्या शहर केवल बड़े बाजारों, मॉल और चौड़ी सड़कों के लिए हैं? या उस मजदूर के लिए भी हैं जो सुबह ठेला लगाकर अपने बच्चों का पेट पालता है? क्या फुटपाथ केवल पैदल यात्रियों के लिए हैं? निश्चित रूप से हां। लेकिन क्या छोटे दुकानदारों के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराना भी नगर प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है? एक बेहतर शहर वह नहीं जहां केवल अतिक्रमण हटाने की तस्वीरें दिखाई दें। बेहतर शहर वह है जहां सड़कें भी खुली हों, पैदल यात्रियों को जगह भी मिले और छोटे व्यापारियों को सम्मानजनक आजीविका का अवसर भी।
कार्रवाई में भेदभाव की धारणा खत्म करनी होगी
प्रशासन के पास कानून की ताकत है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून की ताकत से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका निष्पक्ष इस्तेमाल है। अगर कार्रवाई गरीब पर हो और बड़े अतिक्रमण पर चुप्पी रहे तो कानून का भय नहीं, अविश्वास पैदा होता है। इसके विपरीत यदि नियम सभी पर समान रूप से लागू हों तो सबसे कठिन कार्रवाई भी जनता स्वीकार कर लेती है। इसलिए अतिक्रमण विरोधी अभियान को तीन सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए—निष्पक्षता, पारदर्शिता और पुनर्वास/वैकल्पिक व्यवस्था।
शहरों को अतिक्रमण से मुक्त करना जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि इस अभियान में किसी गरीब की रोजी-रोटी अनावश्यक रूप से न छीनी जाए और किसी प्रभावशाली व्यक्ति को उसके रसूख के कारण विशेष सुविधा न मिले। आखिर सड़क जनता की है, फुटपाथ जनता का है और सार्वजनिक भूमि भी जनता की है। उस पर कब्जा करने वाला चाहे कमजोर हो या शक्तिशाली—कानून की नजर में पैमाना एक ही होना चाहिए। अतिक्रमण हटे, लेकिन इंसानियत के साथ। कार्रवाई हो, लेकिन समान रूप से। तभी शहर साफ भी होगा और व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी कायम रहेगा।


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