विजय दशमी केवल रावण वध का पर्व नहीं बल्कि आत्मविजय और सद्गुणों की विजय का प्रतीक

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भारतीय संस्कृति पर्वों और त्योहारों की समृद्ध परंपरा से जुड़ी हुई है। यहां प्रत्येक त्योहार केवल सामाजिक उल्लास का अवसर नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली आध्यात्मिक चेतना और नैतिक आदर्शों का संदेश भी देता है। विजय दशमी ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे दशहरा, विजय पर्व और दुर्गा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। सामान्य रूप से यह पर्व भगवान श्रीराम की रावण पर विजय तथा मां दुर्गा द्वारा असुरों के संहार से जुड़ा हुआ है, लेकिन इसके पीछे छिपा वास्तविक संदेश अन्याय पर न्याय, असत्य पर सत्य और दुर्गुणों पर सद्गुणों की विजय है। यह पर्व मनुष्य को बाहरी शत्रुओं के साथ अपने भीतर छिपी बुराइयों को पहचानकर उन पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है।
 
आश्विन शुक्ल दशमी को मनाया जाने वाला विजय दशमी का पर्व भारतीय समाज में विशेष महत्व रखता है। वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होता है। मौसम अनुकूल होने लगता है और जनजीवन में सक्रियता बढ़ती है। प्राचीन काल में इस समय आवागमन सुगम होने के कारण व्यापार, कृषि और अन्य कार्यों की नई शुरुआत की जाती थी। विजय दशमी को शुभ कार्यों के आरंभ के लिए विशेष महत्व दिया जाता रहा है। व्यापारी अपने व्यवसाय का विस्तार करते थे, किसान कृषि कार्यों की तैयारी करते थे और योद्धा अपने अस्त्र-शस्त्रों की देखभाल कर उन्हें युद्ध के लिए तैयार करते थे। इस प्रकार यह पर्व उत्साह, पराक्रम, नई शुरुआत और विजय के संकल्प का प्रतीक बन गया।
 
प्राचीन भारतीय परंपरा में विजय दशमी का संबंध विशेष रूप से क्षत्रिय धर्म और पराक्रम से माना गया है। वर्षा ऋतु के बाद राजा और सैनिक अपने शस्त्रों की सफाई तथा उनकी देखभाल करते थे। घोड़ों, हाथियों और रथों का पूजन करके विजय की कामना की जाती थी। युद्ध अभियानों के लिए भी इस दिन को शुभ माना जाता था। समय बदलने के साथ युद्ध के तरीके और साधन बदल गए हैं, लेकिन साहस,
अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्ररक्षा जैसे आदर्शों का महत्व आज भी कायम है। विजय दशमी हमें याद दिलाती है कि शक्ति का वास्तविक उद्देश्य अन्याय करना नहीं, बल्कि न्याय की रक्षा करना है।
 
लोकमान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की थी। हालांकि प्राचीन ग्रंथों में वर्णित घटनाओं और इस मान्यता की ऐतिहासिक तिथियों को लेकर अलग-अलग विचार मिलते हैं, लेकिन इस कथा का नैतिक संदेश स्पष्ट है। रावण विद्वान, शक्तिशाली और वैभवशाली होने के बावजूद अहंकार तथा अन्याय के कारण पराजित हुआ। दूसरी ओर भगवान श्रीराम मर्यादा, सत्य, नीति और सदाचार के प्रतीक हैं। यह प्रसंग बताता है कि किसी व्यक्ति की महानता केवल उसकी शक्ति, संपत्ति और विद्वता से निर्धारित नहीं होती, बल्कि उसके चरित्र और आचरण से होती है। जब शक्ति का उपयोग अहंकार और अत्याचार के लिए किया जाता है, तब उसका पतन निश्चित हो जाता है।
 
इसी प्रकार मां दुर्गा द्वारा असुरों के संहार की पौराणिक कथा में भी गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा हुआ है। कथा के अनुसार जब देवता असुरों से पराजित होने लगे, तब उनकी शक्तियों को एकत्रित करके दुर्गा का प्राकट्य हुआ। इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि बिखरी हुई शक्तियां कमजोर पड़ जाती हैं, जबकि संगठन, एकता और सामूहिक प्रयास से बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है। मां दुर्गा का सिंह पर आरूढ़ होना साहस और पराक्रम का प्रतीक है। उनकी अनेक भुजाएं विभिन्न शक्तियों और गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह संदेश आज भी प्रासंगिक है कि समाज में एकता, सद्भाव, आत्मविश्वास और सहयोग की भावना मजबूत हो तो बुराइयों पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
 
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो मनुष्य के भीतर भी देवत्व और आसुरी प्रवृत्तियों का संघर्ष निरंतर चलता रहता है। आलस्य, अहंकार, कपट, असंयम, क्रोध, लोभ और मोह ऐसी कमजोरियां हैं, जो व्यक्ति की विवेकशक्ति को प्रभावित करती हैं। जब मनुष्य इन प्रवृत्तियों के अधीन हो जाता है, तब उसके ज्ञान और सद्गुणों का प्रभाव कम होने लगता है। इसके विपरीत आत्मसंयम, सत्य, करुणा, संतोष, सदाचार और अनुशासन उसे आंतरिक रूप से मजबूत बनाते हैं। मां दुर्गा द्वारा असुरों के विनाश को इन नकारात्मक प्रवृत्तियों पर आत्मिक शक्ति की विजय के रूप में भी समझा जा सकता है।
 
विजय दशमी का संदेश जैन दर्शन की अहिंसा और आत्मसंयम की भावना से भी जुड़ता है। जैन परंपरा में आत्मविजय को विशेष महत्व दिया गया है। मनुष्य के लिए सबसे बड़ी विजय दूसरों को पराजित करना नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों, इच्छाओं और विकारों पर नियंत्रण प्राप्त करना है। जब व्यक्ति अपने मन को संयमित कर लेता है, तब क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करना आसान हो जाता है। इस दृष्टि से विजय दशमी केवल बाहरी विजय का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और आत्मसुधार का अवसर भी है।
 
दशहरा शब्द को प्रतीकात्मक रूप से दस बुराइयों पर विजय के संदेश से भी जोड़ा जा सकता है। रावण के दस सिर अहंकार, अन्याय और नकारात्मक प्रवृत्तियों के प्रतीक माने जाएं तो उसका दहन केवल एक पुतले को जलाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वास्तविक उद्देश्य अपने भीतर की बुराइयों को पहचानकर उन्हें दूर करने का संकल्प लेना है। यदि हर व्यक्ति अपने व्यवहार में सत्य, ईमानदारी, विनम्रता, संयम और कर्तव्यनिष्ठा को स्थान दे, तो समाज में अनेक समस्याओं का समाधान संभव है।
 
आज विजय दशमी के अवसर पर आवश्यकता इस बात की है कि हम पर्व के बाहरी उत्सव के साथ उसके मूल संदेश को भी समझें। रावण के पुतले का दहन तभी सार्थक होगा, जब हमारे भीतर का अहंकार, छल, अन्याय और द्वेष भी समाप्त होने लगे। मां दुर्गा की आराधना तभी सार्थक होगी, जब हम साहस के साथ सत्य का पक्ष लें और कमजोर तथा पीड़ित लोगों की सहायता करें। विजय दशमी हमें यही प्रेरणा देती है कि सच्ची विजय दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाने में है। जब मनुष्य अपने सद्गुणों को एकत्रित कर आत्मबल जागृत करता है, तभी वह जीवन के संघर्षों में वास्तविक विजेता बनता है। यही विजय दशमी का शाश्वत संदेश और भारतीय संस्कृति की अमूल्य सीख है।
      *कांतिलाल मांडोत*

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