नवीनतम
राजनीति
भारत
शांति वार्ताओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर, संयुक्त राष्ट्र ने ठोस कदम उठाने की अपील की
महासचिव एंतोनियो गुटेरेश बोले- शांति प्रक्रिया में महिलाओं की सार्थक भूमिका से समझौतों की सफलता और स्थिरता की संभावना बढ़ती है
स्वतंत्र प्रभात।
संयुक्त राष्ट्र। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी हिंसक संघर्षों के बीच संयुक्त राष्ट्र ने शांति स्थापना की प्रक्रिया में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा कि शांति निर्माण में महिलाओं का योगदान केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि बेहद महत्वपूर्ण है। उनकी सार्थक भागीदारी से शांति वार्ताओं और समझौतों के सफल होने की संभावना बढ़ जाती है।
सुरक्षा परिषद में वर्ष 2000 में पारित प्रस्ताव 1325 पर आयोजित बैठक को संबोधित करते हुए गुटेरेश ने कहा कि सत्ता और शक्ति का असमान बंटवारा दुनिया के अनेक संकटों की बड़ी वजह है। उन्होंने कहा कि लैंगिक असमानता केवल अधिकारों का मुद्दा नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और स्थायी शांति स्थापित करने से भी जुड़ी हुई है।
महासचिव ने चिंता जताई कि शांति वार्ताओं में महिलाओं की मौजूदगी अब भी सीमित है। शांति निर्माण में उनकी भूमिका को पर्याप्त सहयोग नहीं मिल रहा है और दूसरी ओर संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में महिलाएं तथा लड़कियां गंभीर हिंसा का सामना कर रही हैं।
उन्होंने बताया कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया इस समय सबसे अधिक हिंसक संघर्षों का सामना कर रही है। गाजा, यूक्रेन, सूडान और म्यांमार सहित कई क्षेत्रों में जारी संघर्षों का महिलाओं और लड़कियों पर गंभीर असर पड़ रहा है। सशस्त्र संघर्षों के 50 किलोमीटर के दायरे में रहने वाली महिलाओं और लड़कियों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हुई है।
महिलाओं और लड़कियों पर बढ़ रहा हिंसा का खतरा
संयुक्त राष्ट्र महासचिव की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, युद्धग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं और लड़कियों के लिए हालात लगातार खतरनाक होते जा रहे हैं। वर्ष 2025 में 37 हजार से अधिक आम नागरिकों की मौत हुई, जिनमें हर चार मृतकों में एक महिला या लड़की थी। यह आंकड़ा वर्ष 2021 की तुलना में दोगुना है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में प्रतिदिन कम से कम 25 महिलाओं और लड़कियों की जान जा रही है। वहीं, 75 करोड़ से अधिक महिलाएं और लड़कियां किसी सक्रिय संघर्ष क्षेत्र के 50 किलोमीटर के दायरे में रहने को मजबूर हैं। वर्ष 2024 के मुकाबले इनकी संख्या में चार करोड़ की वृद्धि हुई है।
संघर्षों के साथ यौन हिंसा, भेदभाव और दुर्व्यवहार की घटनाओं में भी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इसके बावजूद महिलाओं को शांति वार्ताओं और महत्वपूर्ण निर्णय प्रक्रियाओं में अपेक्षित स्थान नहीं मिल पा रहा है।
प्रस्ताव 1325 के प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत
गुटेरेश ने कहा कि जब महिलाओं को अपने समुदायों और देशों के भविष्य को तय करने में समान अवसर मिलता है, तो स्थिरता की संभावना मजबूत होती है। महिलाओं और लड़कियों को भय तथा हिंसा से मुक्त वातावरण मिलने पर समाज अधिक मजबूत और संकटों का सामना करने में सक्षम बनते हैं।
उन्होंने बताया कि 110 से अधिक देश महिलाओं, शांति और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय कार्ययोजनाएं अपना चुके हैं। इसे सकारात्मक प्रगति बताते हुए उन्होंने कहा कि अब इन योजनाओं को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने की जरूरत है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने प्रस्ताव 1325 के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए तीन प्रमुख कदम उठाने की अपील की। पहला, प्रत्येक शांति वार्ता में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए और शांति समझौतों में उनकी जरूरतों तथा हितों को प्राथमिकता मिले। दूसरा, संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में काम करने वाले महिला संगठनों और जबरन विस्थापन से प्रभावित लोगों की सहायता करने वाले संगठनों को पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। तीसरा, महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हर तरह की हिंसा, विशेषकर लैंगिक आधार पर होने वाली हिंसा और संघर्ष के दौरान यौन उत्पीड़न के मामलों पर शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाई जाए।
संयुक्त राष्ट्र का संदेश स्पष्ट है कि स्थायी शांति केवल समझौतों से नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं को बराबरी का स्थान देने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने से ही संभव है।


Comments