चुनाव आते ही भाषा की मर्यादा का पतन क्यों?

सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरोध के लिए अब भाषा की कोई मर्यादा शेष नहीं रह गई है?

हर्षिता यादव  Picture
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डॉ. मनमोहन प्रकाश, स्वतंत्र पत्रकार

लोकतंत्र में चुनाव विचारों, नीतियों और नेतृत्व की परीक्षा का अवसर होते हैं। राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनता के सामने विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और कानून-व्यवस्था जैसे बुनियादी मुद्दों पर अपना दृष्टिकोण रखेंगे। लेकिन चुनाव नजदीक आते ही जनहित के प्रश्न पीछे छूटने लगते हैं और उनकी जगह व्यक्तिगत कटाक्ष, अपमानजनक टिप्पणियाँ तथा अमर्यादित भाषा लेने लगती है। सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरोध के लिए अब भाषा की कोई मर्यादा शेष नहीं रह गई है?

पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के वक्तव्यों ने इस चिंता को बार-बार गहरा किया है। कभी किसी को चोर कहा जाता है, कभी विषैले साँप या रावण से उसकी तुलना की जाती है। कहीं धार्मिक आस्थाओं को बीमारियों से जोड़कर उपहास का विषय बनाया जाता है, तो कहीं किसी धर्म और परंपरा को समाप्त करने जैसी भाषा सुनाई देती है। हाल के दिनों में बिहार की राजधानी में आयोजित एक राजनीतिक सभा के दौरान देश के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व के संदर्भ में की गई अभद्र टिप्पणी ने भी राजनीतिक भाषा के गिरते स्तर पर बहस को फिर हवा दी है। क्या 2027 में कई राज्यों में होने वाले चुनाव इसका कारण है?

विडंबना यह है कि ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने वाले नेता प्रायः स्वयं को लोकतंत्र, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का सबसे बड़ा रक्षक बताते हैं। लेकिन क्या लोकतंत्र की रक्षा करने का दावा करने वालों को अपनी भाषा के प्रति अधिक जिम्मेदार नहीं होना चाहिए? राजनीतिक विरोध का अर्थ किसी प्रतिद्वंद्वी को अपमानित करना नहीं, बल्कि उसके विचारों, नीतियों और कार्यों की तथ्यपरक समीक्षा करना है। किसी सरकार की विफलताओं पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान उस अधिकार का पर्याय नहीं हो सकता। इसी तरह, सत्ता पक्ष को भी आलोचना का उत्तर तर्क और तथ्यों से देना चाहिए, न कि प्रतिआक्रमण और कटाक्ष से।

यह प्रवृत्ति किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, पूर्व में अनेक अवसरों पर दोनों ओर से ऐसे बयान सामने आते रहे हैं, जिनमें राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को शत्रु की तरह प्रस्तुत किया जाता है। एक पक्ष की अभद्र टिप्पणी दूसरे पक्ष को वैसी ही भाषा अपनाने का बहाना देती है। इस प्रकार राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का ऐसा चक्र बन जाता है, जिसमें अपनी भाषा की जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय दूसरे की गलती का हवाला दिया जाता है। अंततः नुकसान लोकतांत्रिक संवाद और सार्वजनिक जीवन की गरिमा का होता है।

जब राजनीतिक हमले धर्म, धार्मिक प्रतीकों और समुदायों की आस्थाओं तक पहुँचते हैं, तब उनका प्रभाव और गंभीर हो जाता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में धार्मिक विश्वासों के प्रति संवेदनशीलता सामाजिक सद्भाव की अनिवार्य शर्त है। किसी विचार, परंपरा या धार्मिक मान्यता की तार्किक आलोचना करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है, लेकिन आस्था का अपमान करके राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकती है। निर्वाचन आयोग की आदर्श आचार संहिता भी धर्म और समुदायों के आधार पर वैमनस्य बढ़ाने तथा निजी जीवन पर अनावश्यक आक्षेप लगाने से बचने की अपेक्षा करती है।

राजनीतिक भाषा का प्रभाव केवल मंचों तक सीमित नहीं रहता। शीर्ष नेताओं के शब्द उनके समर्थकों और आम नागरिकों तक पहुँचते हैं। जब सार्वजनिक जीवन में अपमानजनक भाषा सामान्य होने लगती है, तो समाज में भी असहमति के प्रति असहिष्णुता बढ़ने का खतरा पैदा होता है। इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि विवादास्पद बयान सुर्खियाँ बटोर लेते हैं, जबकि बेरोजगारी, महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे प्रश्न राजनीतिक शोर में दब जाते हैं।

राजनीतिक दलों को अपने नेताओं के लिए स्पष्ट भाषाई आचार-मानक निर्धारित करने चाहिए। समाचार माध्यमों को भी सनसनी के बजाय मुद्दों और तथ्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए। नागरिकों को नेताओं का मूल्यांकन उनके भाषणों की आक्रामकता से नहीं, बल्कि उनके काम, नीतियों और जनसमस्याओं के प्रति प्रतिबद्धता से करना चाहिए।

लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, कटु आलोचना भी स्वीकार्य हो सकती है, लेकिन अपमान लोकतांत्रिक साहस का प्रमाण नहीं है। चुनाव जीतने के लिए विरोधी को नीचा दिखाना आसान है; अपने तर्कों और कार्यों से जनता का विश्वास जीतना कठिन। राजनीति की वास्तविक परीक्षा इसी कठिन रास्ते पर होती है। चुनाव आते-जाते रहेंगे, चेहरे बदलते रहेंगे, लेकिन भाषा से निर्मित सामाजिक संस्कार लंबे समय तक बने रहेंगे। इसलिए प्रश्न किसी एक नेता या दल का नहीं, समूची राजनीतिक संस्कृति का है—क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं, जिसमें शब्दों से प्रतिद्वंद्वी को अपमानित किया जाए, या ऐसी राजनीति, जिसमें विरोध भी हो और लोकतंत्र की गरिमा भी बनी रहे?

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