गोंडा खाद्यान्न प्रकरण: पांच सदस्यीय जांच समिति के सामने बड़ी चुनौती, क्या दस दिन में सामने आएगी सच्चाई?

रुपईडीह में सरकारी खाद्यान्न वितरण में अनियमितता के आरोपों की जांच तेज होने की उम्मीद, शिकायतकर्ता ने नोटरी शपथ-पत्र सहित साक्ष्य सौंपने का किया दावा; अब जांच रिपोर्ट और कार्रवाई पर टिकी निगाहें

हर्षिता यादव  Picture
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गोंडा। जनपद के विकासखंड रुपईडीह में सरकारी खाद्यान्न वितरण में कथित अनियमितता और कालाबाजारी को लेकर उठे सवालों के बीच अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या पांच सदस्यीय संयुक्त जांच समिति निर्धारित समय में निष्पक्ष जांच पूरी कर सच्चाई सामने ला पाएगी? क्या गरीबों, बच्चों और गर्भवती महिलाओं से जुड़ी सरकारी योजनाओं के खाद्यान्न वितरण में लगाए गए गंभीर आरोपों की तह तक पहुंचकर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई हो सकेगी? जिलाधिकारी की ओर से जांच समिति गठित किए जाने और शिकायतकर्ता से साक्ष्य मांगे जाने के बाद यह मामला चर्चा में है।

हिंदू युवा वाहिनी के जिला उपाध्यक्ष देव नरायन तिवारी की शिकायत पर जिलाधिकारी प्रियंका निरंजन ने पांच सदस्यीय संयुक्त जांच समिति गठित की है। वहीं, उप निदेशक, समाज कल्याण, देवीपाटन मंडल के कार्यालय की ओर से शिकायत के समर्थन में नोटरी शपथ-पत्र और साक्ष्य उपलब्ध कराने को कहा गया था। शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने मांगे गए दस्तावेज संबंधित विभाग को सौंप दिए हैं। अब जांच समिति की निष्पक्षता, जांच की गुणवत्ता और समयबद्ध कार्रवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं।

खाद्यान्न वितरण में अनियमितता के गंभीर आरोप

शिकायतकर्ता देव नरायन तिवारी ने उत्तर प्रदेश सरकार के खाद्य एवं रसद मंत्री तथा देवीपाटन मंडल के मंडलायुक्त को भेजे गए पत्रों में विकासखंड रुपईडीह के पूर्ति निरीक्षक जुगुल किशोर, कुबेर कंस्ट्रक्शन के सिंगल स्टेज परिवहन ठेकेदार विनय सिंह और विकास बाबू मिश्रा की भूमिका की जांच कराने की मांग की है।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आईसीडीएस (ICDS), मध्याह्न भोजन योजना (MDM) और हॉट कुक योजना के अंतर्गत आने वाले खाद्यान्न के आवंटन, परिवहन और वितरण में कथित अनियमितताएं हुई हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि वर्ष 2024 से इस संबंध में गड़बड़ियां की जा रही हैं। इसके साथ ही उचित दर विक्रेताओं यानी कोटेदारों पर दबाव बनाकर कथित रूप से शपथ-पत्रों पर हस्ताक्षर कराने के आरोप भी लगाए गए हैं।

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ये आरोप गंभीर हैं, लेकिन इनकी पुष्टि जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के सत्यापन से ही हो सकेगी। संबंधित अधिकारियों और ठेकेदार का पक्ष सामने आना भी मामले की निष्पक्ष पड़ताल के लिए आवश्यक है।

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जिलाधिकारी के आदेश पर पांच सदस्यीय जांच समिति गठित

उपलब्ध विवरण के अनुसार, जिलाधिकारी प्रियंका निरंजन ने आदेश संख्या 2137/ओएसडी, दिनांक 19 सितंबर 2026 के तहत जनपद स्तरीय पांच सदस्यीय संयुक्त जांच समिति गठित की है। समिति में निम्नलिखित अधिकारी शामिल हैं—

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  1. बृजेश कुमार वर्मा — अपर जिलाधिकारी-द्वितीय, गोंडा।
  2. जिला विकास अधिकारी — गोंडा।
  3. जिला पूर्ति अधिकारी — गोंडा।
  4. सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी — गोंडा।
  5. खंड विकास अधिकारी — रुपईडीह।

समिति को दस कार्यदिवस के भीतर संयुक्त जांच आख्या प्रस्तुत करने के निर्देश दिए जाने की जानकारी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच निर्धारित समय में पूरी होती है या नहीं और रिपोर्ट में शिकायत के प्रत्येक बिंदु पर स्पष्ट निष्कर्ष दिया जाता है या नहीं।

दस दिन में जांच: क्या अभिलेखों की गहराई तक पहुंचेगी समिति?

इस मामले में केवल कागजी जांच पर्याप्त नहीं होगी। आरोपों की वास्तविकता जानने के लिए खाद्यान्न के आवंटन, गोदामों से उठान, परिवहन, संबंधित केंद्रों तक आपूर्ति और वास्तविक वितरण के अभिलेखों का आपस में मिलान करना जरूरी होगा।

जांच के दौरान निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए—

  • खाद्यान्न के आवंटन और उठान से संबंधित अभिलेखों का सत्यापन।
  • परिवहन से जुड़े बिल, चालान, वाहन विवरण और आपूर्ति रिकॉर्ड की जांच।
  • संबंधित उचित दर दुकानों तथा अन्य केंद्रों के स्टॉक का भौतिक सत्यापन।
  • वितरण रजिस्टर और लाभार्थियों से संबंधित उपलब्ध रिकॉर्ड का मिलान।
  • कोटेदारों की ओर से लगाए गए आरोपों तथा कथित शपथ-पत्रों की सत्यता की जांच।
  • संबंधित अधिकारियों, ठेकेदार और अन्य पक्षों का बयान लेकर उनका पक्ष दर्ज करना।

यदि जांच समिति इन बिंदुओं पर दस्तावेजी और स्थलीय सत्यापन करती है, तो आरोपों की पुष्टि अथवा खंडन के लिए ठोस आधार तैयार हो सकता है। हालांकि, जांच में कितना समय लगेगा, यह अभिलेखों की उपलब्धता, आरोपों के दायरे और आवश्यक सत्यापन पर भी निर्भर करेगा।

शिकायतकर्ता ने नोटरी शपथ-पत्र सहित साक्ष्य सौंपने का किया दावा

इसी प्रकरण में उप निदेशक, समाज कल्याण, देवीपाटन मंडल के कार्यालय से 5 अक्टूबर 2026 को शिकायतकर्ता देव नरायन तिवारी को पत्र जारी किए जाने की जानकारी दी गई है। पत्र के माध्यम से शिकायत के समर्थन में नोटरी शपथ-पत्र और समुचित साक्ष्य उपलब्ध कराने को कहा गया था।

इस संबंध में देव नरायन तिवारी ने बताया कि विभाग की ओर से मांगे गए सभी आवश्यक दस्तावेज नोटरी शपथ-पत्र सहित संबंधित विभाग को उपलब्ध करा दिए गए हैं। उनका कहना है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत कर दिए गए हैं और अब संबंधित विभागों को मामले की निष्पक्ष जांच कर आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच किस प्रकार की जाती है और क्या उन्हें जिलाधिकारी की ओर से गठित समिति की जांच में भी शामिल किया जाता है। दस्तावेज सौंपे जाने के संबंध में शिकायतकर्ता का बयान उपलब्ध है, जबकि उनकी प्राप्ति और जांच की स्थिति की विभागीय पुष्टि सामने आना बाकी है।

क्या जांच के बाद होगी कार्रवाई?

इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यदि जांच में खाद्यान्न वितरण में अनियमितता, अभिलेखों में गड़बड़ी या किसी अन्य प्रकार का नियम उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो क्या संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी?

जांच समिति की जिम्मेदारी केवल रिपोर्ट प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों और अभिलेखों के आधार पर प्रत्येक आरोप की वस्तुनिष्ठ पड़ताल करना भी है। रिपोर्ट में यदि अनियमितताओं की पुष्टि होती है, तो सक्षम प्राधिकारी तथ्यों और लागू नियमों के आधार पर विभागीय या अन्य कानूनी कार्रवाई पर निर्णय ले सकते हैं। वहीं, यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं, तो रिपोर्ट में उसके आधार और निष्कर्ष भी स्पष्ट होने चाहिए।

दस कार्यदिवस की समय-सीमा में रिपोर्ट सौंपने का निर्देश प्रशासन की ओर से तय समयबद्धता को दर्शाता है। हालांकि, समय-सीमा तय होना अपने आप में दोष सिद्ध होने या कार्रवाई होने की गारंटी नहीं है। वास्तविक परिणाम जांच की निष्पक्षता, साक्ष्यों की गुणवत्ता और रिपोर्ट पर होने वाली आगे की कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा।

गरीबों के निवाले से जुड़े मामले में पारदर्शिता जरूरी

सरकारी खाद्यान्न वितरण व्यवस्था का उद्देश्य पात्र लाभार्थियों तक निर्धारित खाद्यान्न पहुंचाना है। ऐसे में वितरण में अनियमितता की शिकायतों को गंभीरता से लेना और उनकी समयबद्ध जांच कराना आवश्यक है। यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई से जवाबदेही तय हो सकती है। दूसरी ओर, निष्पक्ष जांच से निराधार आरोपों की स्थिति भी स्पष्ट होगी।

रुपईडीह के इस प्रकरण में अब निगाहें पांच सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं। क्या समिति दस कार्यदिवस के भीतर सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं की जांच कर पाएगी? क्या नोटरी शपथ-पत्र और शिकायतकर्ता की ओर से सौंपे गए बताए जा रहे साक्ष्यों का परीक्षण होगा? और यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो क्या जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी? 

इन सवालों का जवाब जांच रिपोर्ट और उसके आधार पर होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई से ही मिलेगा। 

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