गरीबों के हिस्से में कानून और अमीरों की झोली में न्याय

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संविधान की चौखट पर बराबरी का वादा, लेकिन अदालत की दहलीज पर आर्थिक हैसियत क्यों बन जाती है इंसाफ का पैमाना? भारत का संविधान कहता है कि कानून की नजर में सभी नागरिक बराबर हैं। लेकिन जब यही कानून अदालतों, पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों की लंबी गलियों से गुजरता है, तो कई बार उसकी चाल गरीब और अमीर के लिए अलग-अलग दिखाई देने लगती है। गरीब के सामने कानून अपनी पूरी कठोरता के साथ खड़ा नजर आता है, जबकि आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति के पास उसी कानून की पेचीदगियों से निपटने के लिए संसाधनों की कोई कमी नहीं होती।
 
सवाल यह नहीं है कि देश में कानून कमजोर है। सवाल यह है कि क्या कानून तक पहुंच और न्याय पाने की क्षमता वास्तव में सबके लिए बराबर है?
एक गरीब व्यक्ति जब किसी अन्याय का शिकार होता है, तो उसके सामने सबसे पहली चुनौती न्याय पाना नहीं, बल्कि अपनी शिकायत दर्ज कराना हो सकती है। पुलिस थाने के चक्कर, अधिकारियों के सामने गुहार, वकील की फीस और अदालत की तारीखें उसके धैर्य की परीक्षा लेने लगती हैं। दूसरी ओर संपन्न व्यक्ति के पास अनुभवी अधिवक्ता, कानूनी सलाहकार और मुकदमा लड़ने के लिए पर्याप्त आर्थिक साधन उपलब्ध हो सकते हैं।
 
यहीं से न्याय की उस असमान यात्रा की शुरुआत होती है, जिसमें मंजिल भले एक हो, लेकिन रास्ते की कठिनाइयां सबके लिए समान नहीं होतीं।
गरीब की तारीख, अमीर की रणनीति--
 
अदालत में मुकदमे की हर तारीख केवल कैलेंडर का एक दिन नहीं होती। गरीब मजदूर के लिए वह एक दिन की मजदूरी का नुकसान है। छोटे दुकानदार के लिए कारोबार बंद रखने की मजबूरी है। किसान के लिए खेत का काम छोड़कर शहर आने की परेशानी है। लेकिन आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति के लिए मुकदमे की तारीख अक्सर एक कानूनी प्रक्रिया भर होती है, जिसका प्रबंधन उसके वकील कर सकते हैं।
 
यही वह अंतर है, जो न्याय की समानता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
गरीब आदमी मुकदमा लड़ते-लड़ते कई बार अपनी जमीन, गहने और जमा पूंजी तक गंवा देता है। कभी समझौता उसकी इच्छा नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी बन जाता है। वह इसलिए पीछे नहीं हटता कि उसका पक्ष कमजोर है, बल्कि इसलिए कि उसके पास लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने की ताकत नहीं बचती।
 
ऐसी स्थिति में न्याय की देरी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक और आर्थिक अन्याय का रूप लेने लगती है।
क्या न्याय की कीमत व्यक्ति की हैसियत तय करेगी?
 
कानून की किताबें गरीब और अमीर के लिए अलग नहीं हैं। न्यायाधीशों की शपथ भी किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं होती। फिर भी न्याय व्यवस्था तक पहुंचने में आर्थिक असमानता एक बड़ी बाधा है।
 
महंगे अधिवक्ता की सेवाएं लेना, विशेषज्ञों की राय प्राप्त करना, दस्तावेज जुटाना और उच्च अदालतों तक मुकदमा ले जाना हर नागरिक के लिए समान रूप से संभव नहीं है।
 
निश्चित रूप से यह कहना गलत होगा कि हर अमीर को न्याय मिल जाता है और हर गरीब न्याय से वंचित रह जाता है। देश की अदालतों ने अनेक अवसरों पर कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा की है। लेकिन न्याय के रास्ते में मौजूद आर्थिक बाधाओं से भी आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं।
असल चिंता यही है कि न्याय का अधिकार संवैधानिक रूप से समान होने के बावजूद उसे प्राप्त करने की वास्तविक क्षमता असमान क्यों है?
न्याय में देरी भी एक अदृश्य सजा---
 
किसी निर्दोष गरीब व्यक्ति को यदि वर्षों तक मुकदमे का सामना करना पड़े, तो अंतिम निर्णय उसके पक्ष में आने के बावजूद उसके जीवन के खोए हुए वर्ष वापस नहीं लौट सकते।
 
उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, परिवार की आर्थिक स्थिति और बच्चों का भविष्य मुकदमे की लंबी प्रक्रिया से प्रभावित हो सकते हैं।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या केवल अंतिम फैसला सुना देना ही न्याय है? या न्याय का अर्थ यह भी है कि निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक पीड़ा से बचाया जाए और पीड़ित को समय पर राहत मिले?
 
किसी गरीब के लिए न्याय में देरी कभी-कभी न्याय से वंचित होने के बराबर साबित होती है।
संविधान की आत्मा को जमीन पर उतारना होगा
 
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 39क समान अवसर के आधार पर न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था का निर्देश देता है।
 
लेकिन संवैधानिक आदर्शों को वास्तविकता में बदलने के लिए केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं।
जरूरत है कि सरकारी विधिक सहायता की गुणवत्ता बेहतर हो, गरीबों को उनके अधिकारों की जानकारी मिले, अदालतों में लंबित मामलों का प्रभावी निस्तारण हो और पुलिस व्यवस्था में आर्थिक या सामाजिक प्रभाव के आधार पर होने वाले किसी भी भेदभाव के विरुद्ध जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
आखिर कब बदलेगी यह तस्वीर?
 
लोकतंत्र की सफलता केवल इस बात से नहीं आंकी जा सकती कि देश में कितने कानून बनाए गए हैं। उसकी असली परीक्षा इस बात से होगी कि सबसे कमजोर नागरिक को उन कानूनों का संरक्षण कितनी आसानी से मिलता है।
 
जिस दिन एक रिक्शा चालक, खेतिहर मजदूर, घरेलू कामगार या फुटपाथ पर दुकान लगाने वाला व्यक्ति बिना भय और आर्थिक चिंता के न्याय की चौखट तक पहुंच सकेगा, उसी दिन कानून की समानता का वादा वास्तविक अर्थों में पूरा होगा।
 
क्योंकि जिस समाज में गरीब कानून से डरता हो और अमीर कानून की प्रक्रिया का बेहतर उपयोग करने में सक्षम हो, वहां न्याय की बराबरी का सपना अभी अधूरा है।
 
न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी का अर्थ यह नहीं कि वह समाज की आर्थिक असमानता को भी अनदेखा कर दे। उसका वास्तविक संदेश यही है कि फैसला व्यक्ति की संपत्ति, प्रतिष्ठा या प्रभाव से नहीं, बल्कि तथ्य, साक्ष्य और कानून से निर्धारित होना चाहिए। देश को ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिसमें कानून गरीब की मजबूरी नहीं, उसका सहारा बने और न्याय अमीर की सुविधा नहीं, हर नागरिक का अधिकार हो।
 

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