फर्जी डॉक्टरों के हाथों मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ आखिर कब तक

गिरफ्तारी के बाद रिहाई नहीं कठोर कार्रवाई और सजा से ही रुकेगा अवैध चिकित्सा का कारोबार

हर्षिता यादव  Picture
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देश में चिकित्सा व्यवस्था का उद्देश्य लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना और संकट के समय जीवन की रक्षा करना है, लेकिन जब इलाज करने वाला व्यक्ति ही फर्जी डिग्री और कागजी प्रमाणपत्रों के सहारे डॉक्टर बनकर बैठ जाए, तब आम आदमी की जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। चिकित्सा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में योग्यता, अनुभव और वैधानिक पंजीकरण अनिवार्य हैं। इसके बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों में बिना मान्य डिग्री और आवश्यक पंजीकरण के मरीजों का इलाज करने वाले लोग सक्रिय हैं। राजस्थान में विशेष अपराध शाखा की कार्रवाई ने इस गंभीर समस्या की ओर एक बार फिर ध्यान आकर्षित किया है। सवाल यह है कि जब ऐसे लोग पकड़े जाते हैं, तब उनके विरुद्ध ऐसी प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं होती, जिससे दूसरे लोग भी इस गैरकानूनी धंधे में उतरने से पहले सौ बार सोचें।
 
राजस्थान में विशेष अभियान के दौरान सामने आए दो मामले चिकित्सा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, जालोर जिले के रानीवाड़ा क्षेत्र में रहने वाले नानंजी राम चौधरी ने कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के आधार पर चिकित्सा संबंधी डिग्रियां हासिल कीं और पंजीकरण करवाकर अस्पताल चलाने लगा। आरोप है कि उसने आठवीं तक पढ़ाई करने के बावजूद स्वयं को चिकित्सक के रूप में स्थापित किया और मरीजों के ऑपरेशन तक करने लगा। इसी प्रकार सीकर जिले के निवासी पंकज यादव के बारे में सामने आया कि कजाकिस्तान से एमबीबीएस करने के बाद वह भारत में विदेशी चिकित्सा स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर सका। इसके बाद उसने कथित रूप से फर्जी डिग्री और अंकतालिका का सहारा लेकर पंजीकरण प्राप्त किया। इन मामलों में आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के तहत होगी, लेकिन इनसे चिकित्सा प्रमाणपत्रों के सत्यापन की व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
 
फर्जी डिग्री से अस्पताल चलाना व्यवस्था की बड़ी चूक
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कोई व्यक्ति फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर चिकित्सा क्षेत्र में प्रवेश कैसे कर लेता है। शैक्षणिक अंकतालिका से लेकर विश्वविद्यालय की डिग्री और चिकित्सा परिषद के पंजीकरण तक अनेक स्तरों पर जांच की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति इन सभी प्रक्रियाओं को पार करके मरीजों का इलाज करने लगता है, तो केवल आरोपी को गिरफ्तार करना पर्याप्त नहीं है। यह भी पता लगाना आवश्यक है कि उसके दस्तावेजों का सत्यापन किसने किया, पंजीकरण किस आधार पर हुआ और अस्पताल का संचालन संबंधित अधिकारियों की निगरानी में कैसे चलता रहा।
 
चिकित्सा के क्षेत्र में फर्जीवाड़ा सामान्य धोखाधड़ी से कहीं अधिक गंभीर है, क्योंकि इसका सीधा संबंध मनुष्य के जीवन और स्वास्थ्य से है। गलत निदान, अनुचित दवाएं, संक्रमण से बचाव के नियमों की अनदेखी और बिना पर्याप्त प्रशिक्षण के ऑपरेशन मरीज को गंभीर संकट में डाल सकते हैं। विशेषकर गर्भवती महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और आपातकालीन स्थिति में अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों के लिए ऐसे तथाकथित चिकित्सक जानलेवा साबित हो सकते हैं। मरीज डॉक्टर की डिग्री की जांच करने के बजाय उसके अनुभव और भरोसे पर विश्वास करता है। इसी विश्वास का दुरुपयोग करके अवैध चिकित्सा का कारोबार फलता-फूलता है।
 
इस समस्या का एक कारण यह भी है कि छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त चिकित्सक, विशेषज्ञ अस्पताल और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं होने से लोगों को स्थानीय क्लीनिकों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसका अर्थ यह नहीं कि बिना योग्यता इलाज करने वालों को छूट दी जाए। बल्कि सरकार को ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के साथ अवैध चिकित्सा पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना चाहिए। प्रत्येक अस्पताल और क्लीनिक में चिकित्सक की योग्यता, पंजीकरण संख्या तथा संबंधित संस्थान की वैधानिक स्थिति की जांच आसान होनी चाहिए। आम नागरिक भी आधिकारिक चिकित्सा परिषद के माध्यम से चिकित्सक का पंजीकरण सत्यापित कर सकें, ऐसी व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है।
 
कानून का डर जरूरी जवाबदेही और नियमित निगरानी भी
राजस्थान सहित देश के अन्य राज्यों में बिना वैध पंजीकरण चिकित्सा करने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई के प्रावधान हैं। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग अधिनियम, 2019 की धारा 34 के अंतर्गत राज्य या राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर में नाम दर्ज कराए बिना आधुनिक चिकित्सा का अभ्यास करने पर दंड का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त फर्जी दस्तावेज तैयार करने, उनका इस्तेमाल करने और धोखाधड़ी करने के मामलों में अपराध की प्रकृति तथा लागू कानूनी धाराओं के अनुसार अलग से कार्रवाई हो सकती है। यदि इलाज के दौरान मरीज की मृत्यु या गंभीर नुकसान होता है, तो जिम्मेदारी निर्धारित करने के लिए मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच आवश्यक है। दोष सिद्ध होने पर अदालत कानून के अनुसार सजा निर्धारित करती है।
 
लेकिन व्यावहारिक समस्या तब पैदा होती है, जब छापेमारी के दौरान किसी आरोपी को पकड़ने और मामला दर्ज करने के बाद कार्रवाई की गति धीमी पड़ जाती है। यह धारणा बनना कि सुबह पकड़े गए व्यक्ति शाम तक घर लौट आएंगे और कुछ दिनों बाद फिर अपना काम शुरू कर देंगे, कानून के प्रति जनता का विश्वास कमजोर करती है।
 
हालांकि गिरफ्तारी के बाद जमानत मिलना अपने आप में अपराधमुक्त होना नहीं है और प्रत्येक आरोपी को कानूनी अधिकार प्राप्त हैं। फिर भी जमानत की प्रक्रिया और अपराध की जांच के बीच ऐसा अंतर नहीं होना चाहिए कि फर्जी चिकित्सा का कारोबार बेरोकटोक चलता रहे। पुलिस को समयबद्ध जांच, प्रमाणपत्रों की फोरेंसिक जांच और संबंधित संस्थानों से रिकॉर्ड जुटाने पर ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्य विभाग को अवैध क्लीनिकों की पहचान कर नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए तथा दोषियों के विरुद्ध न्यायालय में मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने चाहिए।
 
सरकार को जिला स्तर पर नियमित निरीक्षण, शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई और दोषसिद्ध मामलों की निगरानी की प्रभावी व्यवस्था बनानी चाहिए। अस्पतालों को अनुमति देने तथा चिकित्सकों का पंजीकरण करने वाली संस्थाओं की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। यदि किसी अधिकारी की मिलीभगत या गंभीर लापरवाही प्रमाणित होती है, तो उसके विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही नागरिकों को जागरूक करना होगा कि वे चिकित्सा संबंधी योग्यताओं और पंजीकरण की पुष्टि करें तथा संदिग्ध गतिविधियों की शिकायत स्वास्थ्य विभाग या संबंधित प्राधिकरण से करें।
 
चिकित्सा सेवा कोई ऐसा व्यवसाय नहीं है, जिसमें फर्जी कागजात के सहारे लोगों की जान जोखिम में डालकर मुनाफा कमाया जाए। यहां छोटी-सी लापरवाही भी किसी परिवार की खुशियां छीन सकती है। इसलिए कार्रवाई का उद्देश्य केवल गिरफ्तारी दिखाना नहीं, बल्कि अवैध चिकित्सा को रोकना, पीड़ितों को न्याय दिलाना और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना होना चाहिए। कानूनसम्मत जांच, समयबद्ध सुनवाई और दोष सिद्ध होने पर उचित दंड ही इस समस्या का स्थायी समाधान बन सकते हैं। मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वालों के प्रति किसी प्रकार की लापरवाही नहीं होनी चाहिए, क्योंकि जनता के स्वास्थ्य की रक्षा करना शासन और प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है।
 
कांतिलाल मांडोत

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