नवीनतम
फीचर्ड
राजनीति
लोकतंत्र में टकराव जरूरी या संवाद
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली ताकत उस व्यवस्था में दिखाई देती है, जहां सत्ता के साथ-साथ विपक्ष की आवाज भी सुनी जाती है।
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली ताकत उस व्यवस्था में दिखाई देती है, जहां सत्ता के साथ-साथ विपक्ष की आवाज भी सुनी जाती है। सरकार नीतियां बनाती है, कानून तैयार करती है और देश चलाने की जिम्मेदारी निभाती है, तो विपक्ष उन नीतियों पर सवाल उठाता है, उनकी कमियां सामने लाता है और जनता की समस्याओं को सत्ता के सामने रखने का काम करता है। इसलिए मजबूत लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष उतना ही आवश्यक है जितनी मजबूत सरकार। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि विपक्ष की भूमिका आखिर क्या होनी चाहिए—हर मुद्दे पर सरकार से टकराव या राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर सरकार के साथ संवाद? दरअसल, लोकतंत्र में विपक्ष का सरकार का विरोध करना उसका संवैधानिक और राजनीतिक दायित्व है, लेकिन विरोध का अर्थ हर प्रस्ताव को नकार देना नहीं हो सकता। इसी तरह सरकार का बहुमत हासिल कर लेना भी यह अधिकार नहीं देता कि वह विपक्ष की हर आपत्ति को राजनीतिक विरोध मानकर खारिज कर दे। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी संतुलन में है। विरोध लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, ताकत है। सरकार के सामने विपक्ष का सवाल उठाना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत है। यदि संसद में सरकार के फैसलों पर कोई सवाल न पूछे जाएं, नीतियों की समीक्षा न हो और जनता की समस्याओं पर बहस न हो, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल चुनावी प्रक्रिया बनकर रह जाएगा। विपक्ष को यह अधिकार होना चाहिए कि वह सरकार से पूछ सके कि किसी योजना पर कितना पैसा खर्च हुआ, उसका लाभ कितने लोगों तक पहुंचा, बेरोजगारी क्यों बढ़ी, महंगाई का असर क्या है, कानून व्यवस्था की स्थिति कैसी है और सरकारी नीतियों का आम आदमी पर क्या प्रभाव पड़ा। इन सवालों को राजनीतिक विरोध नहीं माना जाना चाहिए। एक जागरूक विपक्ष सरकार को लगातार यह याद दिलाता है कि सत्ता जनता ने दी है और सत्ता का अंतिम जवाबदेह भी जनता के प्रति ही होना चाहिए। लेकिन क्या हर बात पर हंगामा उचित है? यहां विपक्ष के सामने भी आत्ममंथन का सवाल है। संसद में विरोध करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन संसद को ठप कर देना लोकतांत्रिक राजनीति का आदर्श नहीं हो सकता। सदन में बहस होनी चाहिए, तर्क होना चाहिए, सरकार को घेरा जाना चाहिए और जरूरत पड़ने पर मतदान के जरिए विरोध दर्ज कराया जाना चाहिए। लेकिन यदि हर महत्वपूर्ण विधेयक या राष्ट्रीय मुद्दे पर चर्चा के बजाय नारेबाजी और हंगामा ही राजनीति का मुख्य तरीका बन जाए तो नुकसान केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक संस्थान का होता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद में इसलिए भेजती है कि वे उसकी आवाज उठाएं। यदि सदन में लगातार काम ही नहीं होगा तो जनता के मुद्दों पर गंभीर चर्चा कैसे होगी? इसलिए विपक्ष को विरोध की रणनीति और विरोध की सीमा—दोनों पर विचार करना होगा।
सरकार की भी जिम्मेदारी कम नहीं विपक्ष से जिम्मेदारी की उम्मीद करना आसान है, लेकिन सरकार को भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी। बहुमत मिलने का अर्थ यह नहीं कि सरकार विपक्ष को अप्रासंगिक समझने लगे। लोकतंत्र में बहुमत सरकार बनाने का अधिकार देता है, लेकिन असहमति को समाप्त करने का अधिकार नहीं।
सरकार को विपक्ष की आपत्तियों को सुनना चाहिए। यदि कोई सुझाव उपयोगी है तो उसे स्वीकार करने में राजनीतिक नुकसान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता दिखाई देती है। किसी कानून या नीति पर विपक्ष का विरोध हो तो सरकार को यह समझाने की कोशिश करनी चाहिए कि वह फैसला क्यों जरूरी है। जरूरत पड़े तो व्यापक चर्चा और सर्वदलीय संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। आखिर सरकार और विपक्ष दोनों का अंतिम उद्देश्य देश और जनता का हित ही होना चाहिए। टकराव कब जरूरी हो जाता है? इसका मतलब यह भी नहीं कि विपक्ष हमेशा समझौते और संवाद की भाषा में ही रहे। कुछ परिस्थितियों में तीखा राजनीतिक संघर्ष लोकतंत्र के लिए जरूरी हो सकता है। यदि सरकार किसी ऐसी नीति को लागू करती है जिससे व्यापक जनहित प्रभावित हो रहा हो, नागरिक अधिकारों पर गंभीर सवाल उठ रहे हों या किसी संस्था की स्वतंत्रता पर खतरा दिखाई दे रहा हो, तो विपक्ष का कड़ा विरोध स्वाभाविक है। लोकतंत्र में असहमति को दबाना खतरनाक है। इतिहास गवाह है कि कई महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक सुधारों के पीछे लंबे संघर्ष और विरोध की भूमिका रही है। इसलिए विपक्ष का काम केवल सरकार की प्रशंसा करना या हर प्रस्ताव पर सहमति जताना नहीं है। जहां जनता के हितों का सवाल हो, वहां विपक्ष को मजबूती से खड़ा होना ही चाहिए।
लेकिन मजबूत विरोध और अंधा विरोध—इन दोनों में अंतर है। संवाद का रास्ता क्यों जरूरी है? देश के सामने ऐसे अनेक मुद्दे होते हैं जिनका समाधान केवल सत्ता पक्ष या विपक्ष अकेले नहीं कर सकता।
राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक संकट, प्राकृतिक आपदा, बड़े सामाजिक सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और संघीय ढांचे जैसे विषयों पर व्यापक राजनीतिक सहमति लोकतंत्र को मजबूत करती है। विरोध के बावजूद संवाद का दरवाजा खुला रहना चाहिए।
राजनीति में आज प्रतिद्वंद्वी कल सहयोगी हो सकता है और आज का सत्ता पक्ष कल विपक्ष में बैठ सकता है। इसलिए राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में स्थायी दुश्मनी नहीं होती, केवल राजनीतिक मतभेद होते हैं। व्यक्तिगत कटुता और राजनीतिक असहमति को अलग रखना जरूरी है।
आज विपक्ष और सरकार के बीच संघर्ष केवल संसद या विधानसभा तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया ने राजनीतिक संवाद को पूरी तरह बदल दिया है।
कुछ सेकंड में कोई बयान लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। राजनीतिक दल अपने समर्थकों के माध्यम से अपनी बात सीधे जनता तक पहुंचाते हैं। यह लोकतंत्र के लिए अवसर भी है और चुनौती भी।
समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक बहस तथ्यों की जगह आरोपों, व्यक्तिगत हमलों और भ्रामक सूचनाओं पर आधारित हो जाती है। विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार की आलोचना तथ्यों के आधार पर करे। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आलोचना का जवाब तथ्यों और तर्क के आधार पर दे। यदि दोनों पक्ष केवल अपने समर्थकों को खुश करने के लिए बयानबाजी करेंगे तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होगा। जनता को चाहिए परिणाम, केवल राजनीति नहीं आम मतदाता के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि संसद में किसने किसे हराया। जनता जानना चाहती है कि उसके जीवन में क्या बदला। युवा रोजगार चाहता है। किसान अपनी फसल का उचित मूल्य चाहता है। मध्यम वर्ग महंगाई से राहत चाहता है। गरीब बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा चाहता है। व्यापारी सरल नियम चाहता है। महिलाएं सुरक्षित वातावरण चाहती हैं।
इन वास्तविक सवालों के बीच यदि राजनीति केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो जाए तो लोकतंत्र का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। विपक्ष को सरकार की कमियां बताने के साथ-साथ वैकल्पिक नीतियां भी सामने रखनी चाहिए।


Comments