इजरायल में सत्ता का समीकरण बदले या नेतृत्व रहे वही भारत के लिए इजरायल की दोस्ती सबसे अहम

इजरायल के मतदाता किसी एक राजनीतिक खेमे को स्पष्ट जनादेश देने के मामले में विभाजित हैं।

हर्षिता यादव  Picture
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इजरायल की राजनीति में चुनावी परिणाम केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं होते, बल्कि वे देश की सुरक्षा नीति, विदेश संबंधों और पश्चिम एशिया की सामरिक परिस्थितियों को भी प्रभावित करते हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को सबसे अधिक सीटें मिलने के बावजूद बहुमत के आंकड़े से दूर रहना इस बात का संकेत है कि इजरायल की राजनीति में गठबंधन का महत्व बढ़ गया है। दूसरी ओर, गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्ष को भी सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है।
 
ऐसे में अरब दलों की भूमिका निर्णायक बन सकती है। हालांकि, चुनाव के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इजरायल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को किस दिशा में लेकर जाता है। भारत के लिए यह परिस्थिति विशेष महत्व रखती है, क्योंकि इजरायल के साथ उसके संबंध किसी एक नेता या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा सहयोग और तकनीकी साझेदारी पर आधारित हैं।
 
इजरायल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की आवश्यकता होती है। चुनावी रुझानों में नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को बहुमत से पीछे बताया गया, जबकि विपक्ष भी अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं दिखाई दिया। ऐसे परिणामों से स्पष्ट होता है कि इजरायल के मतदाता किसी एक राजनीतिक खेमे को स्पष्ट जनादेश देने के मामले में विभाजित हैं।
 
लिकुड पार्टी को लगभग 28 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया, जबकि वर्ष 2022 के चुनाव में उसने 32 सीटें जीती थीं। यह गिरावट नेतन्याहू के लिए राजनीतिक चुनौती है। सबसे बड़ी पार्टी बनना और सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत जुटाना दो अलग-अलग बातें हैं। सत्ता में वापसी के लिए उन्हें सहयोगी दलों का समर्थन हासिल करना होगा। दूसरी ओर, विपक्ष को भी अपने राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर साझा रणनीति बनानी पड़ेगी।
 
नेतन्याहू ने चुनावी रुझानों के बीच समर्थकों के सामने मजबूत दक्षिणपंथी सरकार बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका राजनीतिक आधार राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ कठोर रुख और इजरायल के हितों की रक्षा जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहा है। दूसरी ओर, आइजेनकोट ने दावा किया कि मतदाताओं ने नेतन्याहू के नेतृत्व को नकार दिया है।
 
दोनों नेताओं के दावों के बीच वास्तविक चुनौती बहुमत जुटाने की है। चुनावी राजनीति में बयान देना आसान होता है, लेकिन विभिन्न विचारधाराओं वाले दलों को एक मंच पर लाकर स्थिर सरकार बनाना कठिन कार्य है। यदि किसी गठबंधन को छोटे दलों के समर्थन पर अधिक निर्भर रहना पड़े, तो सरकार की नीतियों और निर्णयों पर सहयोगी दलों का प्रभाव भी बढ़ सकता है।
 
इस चुनाव में अरब दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उपलब्ध रुझानों में उनके समर्थन को सरकार गठन के समीकरणों से जोड़कर देखा गया। हालांकि, नेतन्याहू ने अरब दलों के समर्थन पर निर्भर सरकार बनाने का विरोध किया है, जबकि आइजेनकोट ने भी उनके साथ गठबंधन को लेकर सीमाएं रखी हैं। ऐसी स्थिति में सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी हो सकती है।
 
अंतिम नतीजों के बाद राष्ट्रपति इसाक हर्जोग उस नेता को सरकार बनाने का अवसर दे सकते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की बेहतर संभावना होगी। इसलिए शुरुआती रुझानों के आधार पर किसी नेता की राजनीतिक पारी समाप्त होने या किसी दूसरे की सत्ता में वापसी को अंतिम निष्कर्ष मानना जल्दबाजी होगी।
 
लेकिन इस पूरी राजनीतिक उठापटक के बीच भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इजरायल में चाहे कोई भी प्रधानमंत्री बने, भारत को उसके साथ अपने संबंध मजबूत बनाए रखने चाहिए। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मित्रता का आधार केवल व्यक्तिगत निकटता या किसी नेता के साथ अच्छे संबंध नहीं होते। स्थायी मित्रता राष्ट्रीय हितों, परस्पर विश्वास, आर्थिक सहयोग और साझा सामरिक आवश्यकताओं पर टिकी होती है। भारत और इजरायल के संबंध भी इसी व्यापक दृष्टिकोण से देखे जाने चाहिए। दोनों देशों के बीच रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार और आतंकवाद विरोधी सहयोग के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। इन संबंधों को किसी एक चुनाव के परिणाम से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए।
 
भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं के संदर्भ में इजरायल का विशेष स्थान है। आधुनिक रक्षा तकनीक, निगरानी प्रणालियों, मानवरहित विमानों, मिसाइल रक्षा और सैन्य उपकरणों के क्षेत्र में दोनों देशों के सहयोग का महत्व रहा है। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में किसी भी देश के लिए अपनी सुरक्षा क्षमता को मजबूत करना अनिवार्य है।
 
भारत भी अपनी रक्षा जरूरतों के अनुरूप विभिन्न देशों के साथ साझेदारी करता है। इजरायल के साथ सहयोग इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि, भारत को अपने रक्षा हितों के साथ स्वदेशी उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। सहयोग का उद्देश्य केवल उपकरण हासिल करना नहीं, बल्कि ज्ञान, तकनीक और उत्पादन क्षमता को मजबूत करना भी होना चाहिए।
 
कृषि और जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी इजरायल भारत के लिए उपयोगी साझेदार है। सीमित जल संसाधनों के बावजूद इजरायल ने सूक्ष्म सिंचाई, जल संरक्षण, अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग और आधुनिक कृषि तकनीकों में उल्लेखनीय प्रगति की है। भारत के अनेक क्षेत्रों में जल संकट और खेती की लागत बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच तकनीकी आदान-प्रदान किसानों की उत्पादकता बढ़ाने और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में सहायक हो सकता है। डिजिटल तकनीक, चिकित्सा अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नवाचार के क्षेत्रों में भी सहयोग की संभावनाएं हैं।
 
भारत को पश्चिम एशिया की जटिल परिस्थितियों को ध्यान में रखकर संतुलित विदेश नीति अपनानी होगी। इजरायल के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने के साथ फिलिस्तीन के मुद्दे पर भारत की दीर्घकालीन नीति, क्षेत्रीय शांति और मानवीय चिंताओं को भी महत्व देना आवश्यक है। भारत के अरब देशों के साथ ऊर्जा, व्यापार, निवेश और वहां रहने वाले भारतीय नागरिकों से जुड़े व्यापक हित हैं। इसलिए किसी एक देश के साथ संबंध मजबूत करने का अर्थ दूसरे देशों के साथ संबंधों को कमजोर करना नहीं होना चाहिए। भारत की कूटनीतिक सफलता इसी में है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखे।
 
कांतिलाल मांडोत

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