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टूटे वाटर रैंप के निर्माण में फिर सवालों के घेरे में लघु सिंचाई विभाग
स्वतंत्र प्रभात।
ब्यूरो प्रयागराज
कोटवा ग्रामसभा में चुम्मन के तालाब के नवीनीकरण में अनियमितता का मामला सामने आने और खबर प्रकाशित होने के बाद लघु सिंचाई विभाग ने क्षतिग्रस्त वाटर रैंपों का दोबारा निर्माण शुरू करा दिया है। लेकिन निर्माण शुरू होते ही गुणवत्ता को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। मौके पर इस्तेमाल हो रही पुरानी ईंटों और मसाले की गुणवत्ता पर ग्रामीणों ने आपत्ति जताई है। इतना ही नहीं निर्माण में इस्तेमाल किए जा रहे मसाले के अनुपात को लेकर विभाग के अवर अभियंता और अधिशासी अभियंता के बयान भी अलग-अलग हैं। इससे निर्माण कार्य की निगरानी और गुणवत्ता जांच पर सवाल उठने लगे हैं।
मसाले के अनुपात पर दो अधिकारियों के अलग-अलग बयान।
मौके पर निर्माण कार्य में लगे ठेकेदार के मजदूरों और मिस्त्रियों ने बताया कि वाटर रैंप के निर्माण में छह-एक के अनुपात में मसाले का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस संबंध में अधिशासी अभियंता रामेश्वर सिंह से पूछे जाने पर उन्होंने भी इसी अनुपात को सही बताया। वहीं अवर अभियंता राजीव श्रीवास्तव ने बताया कि निर्माण कार्य चार-एक के अनुपात में मसाले से कराया जा रहा है। एक ही निर्माण कार्य को लेकर विभाग के दो जिम्मेदार अधिकारियों के अलग-अलग बयान सामने आने से गुणवत्ता की निगरानी और तकनीकी मानकों के पालन पर सवाल खड़े हो गए हैं। अब यह स्पष्ट होना जरूरी है कि स्वीकृत प्राक्कलन और तकनीकी मानकों के अनुसार निर्माण में किस अनुपात का मसाला इस्तेमाल किया जाना है और मौके पर वास्तव में किसका इस्तेमाल हो रहा है।
टूटे रैंप की पुरानी ईंटों से ही हो रहा निर्माण।
दोबारा निर्माण में ढह चुके रैंप से निकाली गई पुरानी ईंटों के इस्तेमाल को लेकर भी ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं। इस संबंध में अधिशासी अभियंता रामेश्वर सिंह का कहना है कि ईंटें उपयोगी होंगी तो उनका इस्तेमाल किया जाएगा। हालांकि इन ईंटों की गुणवत्ता और पुनः इस्तेमाल की तकनीकी उपयुक्तता किस आधार पर तय की गई इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ग्रामीणों का सवाल है कि जिस निर्माण के क्षतिग्रस्त होने के बाद दोबारा काम कराना पड़ रहा है उसी से निकली ईंटों के इस्तेमाल से नए निर्माण की मजबूती कैसे सुनिश्चित होगी।
सीमांकन और निर्माण क्षेत्र को लेकर भी सवाल।
तालाब की पूरी भूमि पर निर्माण नहीं कराए जाने के सवाल पर अधिशासी अभियंता रामेश्वर सिंह ने पूर्व में बताया था कि राजस्व विभाग ने जितनी जमीन नापकर उपलब्ध कराई थी उसी के अनुसार काम कराया गया। जबकि राजस्व विभाग और कार्यदायी संस्था के बीच हुए पत्राचार में नापकर उपलब्ध कराई गई भूमि और मौके पर कराए गए निर्माण के बीच अंतर का सवाल सामने आया है। ऐसे में यह जांच जरूरी है कि राजस्व विभाग ने कितनी भूमि का सीमांकन कर विभाग को उपलब्ध कराया था और स्वीकृत कार्ययोजना के अनुसार कितने क्षेत्रफल में निर्माण होना था। मौके पर वास्तव में कितने क्षेत्र में काम कराया गया इसका भी सत्यापन कराया जाना चाहिए।
कागजों में पूरा काम मौके पर कितना हुआ निर्माण।
ग्रामीणों ने तालाब के संपूर्ण नवीनीकरण के नाम पर स्वीकृत कार्य और वास्तविक निर्माण की भी जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि विभागीय अभिलेखों में दर्ज कार्यों का मौके पर हुए निर्माण से मिलान कराया जाए। इसके लिए स्वीकृत धनराशि कार्य की मदवार लागत निर्धारित निर्माण क्षेत्रफल और अब तक खर्च की गई रकम का ब्योरा सार्वजनिक होना चाहिए। साथ ही यह भी जांच हो कि स्वीकृत कार्ययोजना के सापेक्ष कितना काम वास्तव में कराया गया है और भुगतान किस आधार पर किया गया।
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