वास्तविक ब्याज दर की नई चुनौती

ब्याज दर का असर केवल कर्ज लेने वाले पर नहीं, बल्कि बचतकर्ता, निवेशक, उपभोक्ता और उद्यमी सभी पर पड़ता है।

हर्षिता यादव  Picture
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भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां महंगाई, आर्थिक वृद्धि, ऋण मांग और मौद्रिक नीति के बीच संतुलन जटिल हो गया है। रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखने के बीच उपभोक्ता महंगाई अगस्त में बढ़कर 4.82 प्रतिशत पहुंच गई, जबकि जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। खाद्य महंगाई 5.95 प्रतिशत और मूल महंगाई लगभग 4.2 प्रतिशत तक पहुंचना संकेत देता है कि मूल्य दबाव केवल खाद्य वस्तुओं तक सीमित नहीं है। दूसरी ओर आर्थिक वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत और बैंक ऋण वृद्धि लगभग 19.1 प्रतिशत बनी हुई है। यानी चुनौती कमजोर मांग की नहीं, बल्कि मजबूत आर्थिक गतिविधि के बीच बढ़ते मूल्य दबाव की है।

ब्याज दर को उसके आंकड़े से समझना आर्थिक नीति की आधी तस्वीर देखना है। वास्तविक ब्याज दर का आकलन महंगाई को ध्यान में रखकर किया जाता है। यदि रेपो दर 5.25 प्रतिशत हो और महंगाई भी इसके आसपास बनी रहे, तो वास्तविक नीतिगत ब्याज दर लगभग शून्य के करीब पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में नीति नाममात्र के स्तर पर भले ही सख्त दिखे, लेकिन उसका प्रतिबंधात्मक प्रभाव सीमित हो जाता है। यही वर्तमान परिस्थिति की चुनौती है।

जब महंगाई नियंत्रित होती है, तब सकारात्मक वास्तविक ब्याज दर बचत को प्रोत्साहित करती है और मांग पर संतुलित दबाव बनाए रखती है। लेकिन ब्याज दर स्थिर रहते हुए महंगाई बढ़े तो वास्तविक दर का सुरक्षा-कुशन कमजोर पड़ता है। पांच प्रतिशत से अधिक की ब्याज दर सुनने में ऊंची लग सकती है, लेकिन यदि कीमतें भी उसी गति से बढ़ रही हों तो बचतकर्ता की वास्तविक क्रयशक्ति पर उसका लाभ सीमित हो जाता है। ब्याज दर का असर केवल कर्ज लेने वाले पर नहीं, बल्कि बचतकर्ता, निवेशक, उपभोक्ता और उद्यमी सभी पर पड़ता है।

वर्तमान स्थिति इसलिए भी जटिल है क्योंकि महंगाई और आर्थिक वृद्धि दोनों मजबूत दिखाई दे रहे हैं। सामान्यतः कमजोर मांग की स्थिति में ब्याज दर घटाकर ऋण, निवेश और उपभोग को प्रोत्साहित किया जा सकता है। लेकिन जब मांग पहले से मजबूत हो और महंगाई का कारण आपूर्ति व्यवधान, ऊर्जा कीमतें तथा महंगाई की अपेक्षाएं हों, तब दरों में कटौती कीमतों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। मांग बढ़े और आपूर्ति उसी अनुपात में न बढ़े तो आर्थिक विकास का लाभ महंगाई की चुनौती में बदल सकता है।

बाहरी परिस्थितियां इस जोखिम को और बढ़ाती हैं। पश्चिम एशिया में तनाव, वैश्विक आपूर्ति मार्गों में व्यवधान और कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि भारत के लिए आयातित महंगाई का खतरा पैदा करती है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन महंगा होता है, उत्पादन लागत बढ़ती है और उसका प्रभाव वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों तक पहुंचता है। यदि इसी दौरान रुपया कमजोर हो, तो आयात और महंगा हो सकता है। इस प्रकार तेल, विनिमय दर और महंगाई का संबंध मौद्रिक नीति के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।

महंगाई की अपेक्षाएं भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। यदि परिवारों और व्यवसायों को लगने लगे कि कीमतें लगातार बढ़ती रहेंगी, तो वे अपने व्यवहार में पहले से बदलाव करने लगते हैं। कर्मचारी अधिक वेतन मांग सकते हैं, उद्योग लागत बढ़ने की आशंका में कीमतें बढ़ा सकते हैं और उपभोक्ता भविष्य की महंगाई से बचने के लिए वर्तमान में अधिक खरीदारी कर सकते हैं। इस तरह महंगाई की अपेक्षा स्वयं महंगाई को बढ़ाने वाली शक्ति बन सकती है। केंद्रीय बैंक के लिए इसलिए वर्तमान आंकड़ों के साथ भविष्य की अपेक्षाओं पर भी नजर रखना जरूरी है।

बैंकिंग क्षेत्र के आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक गतिविधि कमजोर नहीं है। अगस्त के अंत तक बैंक ऋण वृद्धि लगभग 19.1 प्रतिशत रही, जबकि जमा वृद्धि करीब 17.8 प्रतिशत तक पहुंची। जमा वृद्धि में विशेष योजनाओं और विदेशी मुद्रा प्रवाह की भूमिका भी रही है, इसलिए इसे घरेलू बचत में अचानक बदलाव का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिर भी मजबूत ऋण वृद्धि बताती है कि वित्तीय प्रणाली में मांग मौजूद है। ऐसे समय में ब्याज दरों में तेज कटौती अतिरिक्त मांग पैदा कर सकती है।

इसका सीधा संबंध बचतकर्ता से भी है। जब महंगाई बढ़ती है और बैंक जमा पर वास्तविक प्रतिफल घटता है, तो परिवार वैकल्पिक निवेश साधनों की ओर आकर्षित हो सकते हैं। सोना, शेयर बाजार और अन्य परिसंपत्तियां ऐसे समय में अधिक आकर्षक दिखाई दे सकती हैं। भारत में सोने की मांग केवल सांस्कृतिक परंपरा का परिणाम नहीं है; यह महंगाई और मुद्रा की क्रयशक्ति से जुड़ी आर्थिक प्रतिक्रिया भी है। यदि पारंपरिक बचत का वास्तविक प्रतिफल लगातार घटे, तो घरेलू बचत का एक हिस्सा बाजार आधारित परिसंपत्तियों की ओर जा सकता है।

यहीं मौद्रिक नीति में समय का महत्व सामने आता है। यदि केंद्रीय बैंक महंगाई बढ़ने के बाद बहुत देर से प्रतिक्रिया करता है, तो मूल्य वृद्धि मजदूरी, उत्पादन लागत और उपभोक्ता अपेक्षाओं में स्थायी रूप ले सकती है। दूसरी ओर अस्थायी आपूर्ति झटके के आधार पर तुरंत दरें बढ़ाना आर्थिक वृद्धि और निवेश को अनावश्यक नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि ब्याज दर बढ़नी चाहिए या घटनी चाहिए। असली प्रश्न यह है कि निर्णय कब, कितनी मात्रा में और किस आर्थिक संकेत के आधार पर लिया जाए।

सरकार की भूमिका भी यहां उतनी ही महत्वपूर्ण है। महंगाई नियंत्रण का पूरा भार केंद्रीय बैंक पर डालना उचित नहीं होगा। खाद्य आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करना, भंडारण और परिवहन क्षमता बढ़ाना, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाना दीर्घकालिक समाधान का हिस्सा हैं। कृषि उत्पादन में मौसम आधारित जोखिम कम करना, शीत भंडारण और बाजार संपर्क सुधारना तथा बिचौलिया लागत घटाना खाद्य महंगाई पर टिकाऊ प्रभाव डाल सकता है।

भारत के सामने राजकोषीय नीति और मौद्रिक नीति के बेहतर समन्वय की भी आवश्यकता है। सरकार यदि लक्षित सार्वजनिक व्यय के माध्यम से उत्पादन क्षमता, बुनियादी ढांचे और आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करती है, तो केंद्रीय बैंक पर मांग नियंत्रित करने का दबाव घट सकता है। इसके विपरीत अत्यधिक मांग बढ़ाने वाला व्यय महंगाई के दौर में मौद्रिक नीति के प्रयासों को कमजोर कर सकता है। इसलिए आर्थिक स्थिरता केवल एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नीतियों के समन्वय का परिणाम है।

भारतीय अर्थव्यवस्था की एक बड़ी ताकत यह है कि वृद्धि की रफ्तार अभी भी मजबूत दिखाई देती है। 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर और लगभग 19.1 प्रतिशत की ऋण वृद्धि संकेत देती है कि उत्पादन, निवेश और वित्तीय गतिविधियों में ऊर्जा मौजूद है। लेकिन तेज वृद्धि के दौर में मूल्य स्थिरता की अनदेखी करना भी जोखिमपूर्ण है। यदि महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो वास्तविक आय घट सकती है, उपभोग प्रभावित हो सकता है और निम्न तथा मध्यम आय वर्ग पर अपेक्षाकृत अधिक बोझ पड़ सकता है। इसलिए उच्च वृद्धि का वास्तविक अर्थ तभी है जब उसका लाभ मूल्य स्थिरता के साथ व्यापक समाज तक पहुंचे।

आगे की नीति संतुलित, सतर्क और आंकड़ा आधारित होनी चाहिए। केंद्रीय बैंक को महंगाई, वास्तविक ब्याज दर, ऋण वृद्धि, विनिमय दर, वैश्विक ऊर्जा कीमतों और महंगाई की अपेक्षाओं को एक साथ देखना होगा। किसी एक आंकड़े के आधार पर निर्णय लेना पर्याप्त नहीं है। मौद्रिक नीति का असर समय लेकर सामने आता है और इसी कारण आज का निर्णय कल की आर्थिक परिस्थिति को आकार देता है।

अंततः असली सवाल यह नहीं है कि रेपो दर 5.25 प्रतिशत है या उससे कुछ कम अथवा अधिक। असली सवाल यह है कि उस दर का वास्तविक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव कितना है। यदि महंगाई बढ़ती रहे और ब्याज दर स्थिर रहे, तो वास्तविक ब्याज दर शून्य के करीब पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में आज की छोटी सुविधा कल की बड़ी चुनौती बन सकती है। इसलिए मौद्रिक नीति में जल्दबाजी जितनी खतरनाक है, उतनी ही खतरनाक अनावश्यक देरी भी। भारत को ऐसे नीतिगत विवेक की जरूरत है जो आर्थिक वृद्धि की गति बनाए रखते हुए महंगाई की आग को फैलने से रोक सके। यही आज आने वाले समय में भारतीय मौद्रिक नीति की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

अवनीश कुमार गुप्ता

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