पीओके में पाक सेना के खिलाफ उबाल जनता की आवाज दबाने के आरोपों से बढ़ा तनाव

"सस्ती रोटी मांगने वालों पर बंदिशें और गोलियां चलने के आरोप से भड़का जनआक्रोश"

हर्षिता यादव  Picture
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पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में जनआंदोलन अब केवल महंगाई, सस्ते आटे और बुनियादी सुविधाओं तक सीमित नहीं रह गया है। साढ़े चार महीने से जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच जनता और पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान के बीच टकराव की स्थिति गंभीर होती दिखाई दे रही है। मुजफ्फराबाद से लेकर कोटली, रावलाकोट और पुंछ तक लोगों में नाराजगी बढ़ने की खबरें हैं।
 
आंदोलनकारियों का आरोप है कि उनकी मांगों को सुनने और समस्याओं का समाधान करने के बजाय सड़कों पर बंदिशें लगाई जा रही हैं तथा विरोध की आवाज दबाने की कोशिश हो रही है।  अवामी आंदोलन के जुलूस पर गोलीबारी और लोगों के घायल होने की खबरों ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया है। सवाल यह है कि जिस जनता को सस्ती रोटी, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और सुगम आवागमन चाहिए, उसकी मांगों का जवाब टकराव से क्यों दिया जा रहा है?
 
पीओके में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन को लेकर पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर की भूमिका पर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। आंदोलन को कमजोर करने के लिए जम्मू-कश्मीर यूनाइटेड मूवमेंट नामक संगठन के इस्तेमाल और उसके माध्यम से प्रदर्शनकारियों के सामने गतिरोध पैदा करने के आरोप सामने आए हैं। रिपोर्ट में इस संगठन के साथ लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े लोगों के संबंध होने का भी दावा किया गया है।
 
मुजफ्फराबाद में इस संगठन के बैनर तले निकले जुलूस के दौरान अवामी समर्थकों पर गोलीबारी होने तथा कुछ लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की बात कही गई है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यदि किसी शांतिपूर्ण आंदोलन को बाधित करने के लिए हथियारबंद लोगों का इस्तेमाल किया गया है, तो यह कानून-व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत गंभीर मामला है।
 
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जनता की मूलभूत जरूरतें अब राजनीतिक और प्रशासनिक टकराव का रूप लेती दिखाई दे रही हैं।  लोगों ने पाकिस्तानी सरकार से सस्ता आटा मांगा था, लेकिन उन्हें सड़कों पर बंदिशों का सामना करना पड़ा। उनका कहना है कि आवागमन बाधित होने से परिवारों के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है। महंगाई से जूझ रहे परिवारों के लिए भोजन जुटाना पहले ही चुनौती है।
 
ऐसे में यदि परिवहन और आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होती है, तो सबसे ज्यादा परेशानी गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को उठानी पड़ती है। शासन की पहली जिम्मेदारी जनता की समस्याओं का समाधान करना है, न कि ऐसी परिस्थितियां पैदा करना जिनमें लोगों की मुश्किलें और बढ़ जाएं।लोगों ने स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर गंभीर चिंता जताई है।  कई लोगों को अस्पताल में इलाज नहीं मिल पाया, क्योंकि पीओके से इस्लामाबाद जाने वाले मार्ग बंद था। लोग क्षेत्र में पर्याप्त अस्पतालों की कमी का भी उल्लेख कर रहे है। यह शिकायत उस प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाती है, जिसमें गंभीर मरीजों के लिए समय पर इलाज तक पहुंचना कठिन हो सकता है।
 
सड़कें केवल यातायात के साधन नहीं होतीं, बल्कि वे अस्पताल, शिक्षा, रोजगार और व्यापार से जुड़ने की जीवनरेखा होती हैं। यदि सुरक्षा प्रतिबंधों के कारण आम नागरिकों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो प्रशासन को वैकल्पिक व्यवस्था और आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए। जनता को यह भरोसा मिलना जरूरी है कि संकट के समय शासन उसके साथ खड़ा है।
 
आंदोलन का दायरा अब विद्यार्थियों तक भी पहुंच गया है। मंगलवार को कोटली, रावलाकोट और पुंछ के विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों ने जुलूस निकाले और पाकिस्तानी सेना की वापसी के नारे लगाए। विद्यार्थियों का कहना है कि लगभग साढ़े चार महीने से जारी आंदोलन और उससे पैदा हुई परिस्थितियों ने उनकी पढ़ाई को प्रभावित किया है। शिक्षा किसी भी समाज के भविष्य की बुनियाद होती है। लंबे समय तक शैक्षणिक गतिविधियों में व्यवधान से विद्यार्थियों की परीक्षा, रोजगार और आगे की पढ़ाई पर असर पड़ सकता है। जब युवा अपनी शैक्षणिक समस्याओं के साथ शासन के प्रति असंतोष भी व्यक्त करने लगें, तो इसे केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। उनकी शिकायतों को सुनना और समाधान की दिशा में कदम उठाना जरूरी है।
 
पीओके में उठते असंतोष के बीच आजादी के नारे और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ बढ़ती नाराजगी इस बात के संकेत हैं कि आंदोलन का स्वरूप व्यापक होता जा रहा है। हालांकि, इन नारों के समर्थन का वास्तविक दायरा निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र और विश्वसनीय जानकारी जरूरी है। फिर भी जनता की शिकायतों को लगातार अनसुना किए जाने से असंतोष बढ़ने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रशासन की जवाबदेही केवल आदेश जारी करने या सड़कों पर नियंत्रण बनाए रखने तक सीमित नहीं हो सकती। उसे यह भी बताना होगा कि सस्ता आटा, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और आवागमन जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
 
विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र के लोग अपने दैनिक जीवन की कठिनाइयों से राहत चाहते हैं, वहां उनकी मांगों के बीच सुरक्षा और राजनीतिक वर्चस्व का प्रश्न खड़ा होता दिखाई दे रहा है। यदि प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, आंदोलनकारियों की शिकायतों पर बातचीत का रास्ता खुला रहना चाहिए। किसी भी सरकार या प्रशासन की विश्वसनीयता का आधार उसकी जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों का सम्मान होता है।
 
पीओके की मौजूदा स्थिति यही सवाल उठा रही है कि जनता की आवाज को सुनकर समाधान निकाला जाएगा या टकराव को और बढ़ने दिया जाएगा। सस्ती रोटी मांगने वाली आवाम को यदि अपनी बात रखने के लिए सड़कों पर उतरना पड़े और फिर उसे बंदिशों तथा हिंसा के आरोपों का सामना करना पड़े, तो शासन की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जनता की समस्याओं का समाधान संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही से ही संभव है, दमन के आरोपों और भय के माहौल से नहीं।
 
कांतिलाल मांडोत

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