बदलते परिवेश में करवा चौथ का महत्व कितना प्रासंगिक?

करवा चौथ को महिलाओं के कठिन व्रतों में गिना जाता है।

हर्षिता यादव  Picture
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भारत में करवा चौथ का व्रत प्रतिवर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को बड़ी श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं। परंपरागत रूप से महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत करती हैं। रात्रि में चंद्रमा की पूजा-अर्चना करने के बाद पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है। करवा चौथ को महिलाओं के कठिन व्रतों में गिना जाता है।

आज भी अधिकांश महिलाएं पूरे दिन बिना अन्न जल ग्रहण किए अपने घर-परिवार और नौकरी व्यवसाय से जुड़े दायित्वों का निर्वहन प्रसन्नतापूर्वक करती हैं। यही कारण है कि करवा चौथ को प्रेम, समर्पण, त्याग और विश्वास का पर्व माना जाता है। करवा चौथ केवल भारत तक सीमित नहीं है।

नेपाल सहित विश्व के अनेक देशों में जहाँ भारतीय हिंदू समुदाय के लोग निवास करते हैं, वहाँ भी यह पर्व उत्साह और परंपरागत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। भारतीय धार्मिक परंपराओं में इस व्रत का विशेष महत्व है। लोक मान्यताओं और प्रचलित पौराणिक कथाओं में माता पार्वती और भगवान शिव के प्रसंग का उल्लेख मिलता है। महाभारत से जुड़ी मान्यताओं में भी भगवान श्रीकृष्ण के परामर्श पर द्रौपदी द्वारा संकट के समय व्रत करने का प्रसंग बताया जाता है। इन धार्मिक मान्यताओं ने इस पर्व की आस्था और महत्ता को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

वर्तमान आधुनिक परिवेश में जब जीवनशैली, सामाजिक संबंधों और पारिवारिक व्यवस्थाओं में तेजी से बदलाव आ रहा है, तब तीज त्योहारों और व्रतों के स्वरूप में परिवर्तन होना भी स्वाभाविक है। करवा चौथ मनाने के तौर तरीकों में भी समय के साथ बदलाव आया है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पति पत्नी दोनों नौकरी और व्यवसाय में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में महिलाओं से यह अपेक्षा करना कि वे अपनी तमाम जिम्मेदारियों के बीच पूरे दिन निर्जला व्रत रखें, कई परिस्थितियों में कठिन हो सकता है। इसके बावजूद अनेक महिलाएं अपनी व्यस्त दिनचर्या के बीच इस परंपरा का निर्वहन करती हैं।

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यह अपने जीवनसाथी के प्रति उनके प्रेम, समर्पण और भावनात्मक जुड़ाव का परिचायक है। लेकिन यह भी समझना होगा कि किसी रिश्ते की मजबूती केवल व्रत रखने से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, विश्वास, सहयोग और संवेदनशीलता से सुनिश्चित होती है। आज के दौर में करवा चौथ की प्रासंगिकता पर विचार करते समय यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य केवल परंपरा निभाना और रस्में पूरी करना रह गया है, अथवा यह पति पत्नी के बीच प्रेम और विश्वास को मजबूत करने का अवसर भी है?

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बदलते समय के साथ इस पर्व को अधिक समानता पूर्ण और संवेदनशील दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। यदि पत्नी अपने पति की लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना के लिए व्रत रखती है, तो पति का भी यह दायित्व है कि वह पत्नी के स्वास्थ्य, सुख, सम्मान और दीर्घायु के प्रति उतना ही सजग रहे। प्रेम और समर्पण किसी एक पक्ष की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन की साझा पूंजी हैं।

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वर्तमान समय में मानव जीवन तनाव, प्रतिस्पर्धा और मानसिक दबाव से घिरता जा रहा है। ऐसे वातावरण में भारत जैसे देश में त्योहारों और व्रतों को श्रद्धा, उत्साह और पारिवारिक सहभागिता के साथ मनाया जाना हमारी सांस्कृतिक आस्था की मजबूती को दर्शाता है। अमीर हो या गरीब, प्रत्येक वर्ग के लोग अपनी सामर्थ्य, परंपरा और श्रद्धा के अनुसार त्योहारों को मनाते हैं। इसलिए भारत में त्योहारों का महत्व केवल धार्मिक और सामाजिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी व्यापक है।

त्योहारों के अवसर पर बाजारों में रौनक बढ़ती है, छोटे व्यापारियों और कारीगरों को काम मिलता है तथा परिवारों और समुदायों के बीच मेल-मिलाप के अवसर बनते हैं। लेकिन चिंता का विषय यह है कि पारिवारिक कलह, बेमेल रिश्तों और संयुक्त परिवारों के विघटन का प्रभाव हमारे त्योहारों पर भी दिखाई देने लगा है। अनेक अवसरों पर पर्वों का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है और वे केवल औपचारिकताओं तक सीमित होकर रह जाते हैं।

त्योहारों की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब वे परिवार के सदस्यों को एक दूसरे के करीब लाएं, रिश्तों में विश्वास बढ़ाएँ और मनमुटाव दूर करने का माध्यम बनें। यदि त्योहारों को मनाने के बावजूद परिवारों में कटुता, अविश्वास और अलगाव बढ़ता रहे, तो हमें उनके वास्तविक संदेश पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

भारत में महिलाओं के प्रति बढ़ते अत्याचार और बच्चियों के विरुद्ध सामने आने वाले जघन्य अपराध भी समाज के लिए गहरी चिंता का विषय हैं। विडंबना देखिए कि जिस देश में नारी को शक्ति, श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक माना जाता है, जहाँ अनेक त्योहारों और धार्मिक परंपराओं में नारी की केंद्रीय भूमिका है, उसी समाज में महिलाओं और बालिकाओं की सुरक्षा आज भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। त्योहारों की चमक दमक के बीच इस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

नारी के प्रति सम्मान केवल पूजा पाठ, व्रत और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वह हमारे व्यवहार, विचार और सामाजिक व्यवस्था में भी दिखाई देना चाहिए। करवा चौथ जैसे पर्व का वास्तविक संदेश तभी सार्थक होगा, जब पति पत्नी एक दूसरे के प्रति अपने दायित्वों को समझें और रिश्तों में प्रेम के साथ समानता, सम्मान तथा विश्वास को भी महत्व दें। वैवाहिक जीवन में बढ़ती कटुता, घरेलू हिंसा और रिश्तों को कमजोर करने वाली आपराधिक घटनाओं पर सामाजिक चिंतन आवश्यक है। किसी भी रिश्ते की सफलता केवल परंपराओं के निर्वहन से नहीं, बल्कि एक दूसरे की भावनाओं को समझने, कठिन परिस्थितियों में साथ खड़े रहने और परस्पर सम्मान बनाए रखने से होती है।

भारत में आदिकाल से लेकर आधुनिक युग तक तीज त्योहारों और व्रतों का महत्व आस्था, श्रद्धा और विश्वास के आधार पर बना रहा है। समय बदलने के साथ इन पर्वों के स्वरूप में परिवर्तन आ सकता है, लेकिन इनके मूल भाव को कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिए। करवा चौथ को केवल एक कठिन व्रत या सामाजिक परंपरा के रूप में देखने के बजाय इसे पति पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, समर्पण और पारस्परिक जिम्मेदारी को मजबूत करने के अवसर के रूप में अपनाना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय समाज त्योहारों की परंपराओं के साथ साथ रिश्तों की मिठास को भी बचाने का संकल्प ले।

जब पति पत्नी एक दूसरे के सुख दुःख में सहभागी बनेंगे, महिलाओं को समान सम्मान और सुरक्षा मिलेगी तथा परिवारों में प्रेम और विश्वास का वातावरण बनेगा, तभी करवा चौथ सहित हमारे सभी त्योहारों की वास्तविक महत्ता बनी रहेगी। परंपराएँ तभी जीवंत रहती हैं, जब उनके साथ जुड़े मानवीय मूल्य भी जीवित रहें। यही बदलते परिवेश में करवा चौथ की प्रासंगिकता और भारतीय संस्कृति की सच्ची पहचान है।

                                                                                                                          अरविंद रावल

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