पचास हजार रुपये के अनुदान से पशुपालकों को संबल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ताकत

"दूध उत्पादन में उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर राजस्थान दूसरे और गुजरात चौथे पायदान पर"

हर्षिता यादव  Picture
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उत्तर प्रदेश में पशुपालन को किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने का प्रभावी माध्यम बनाने की दिशा में योगी आदित्यनाथ सरकार ने महत्वपूर्ण पहल की है। प्रदेश मंत्रिमंडल की बैठक में पशुधन क्षेत्र को मजबूत बनाने से जुड़े प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। योजना के तहत एक गाय पर 50 हजार रुपये का अनुदान देने, पशुओं की नस्ल सुधारने, दूध उत्पादन बढ़ाने और पशुपालकों को बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराने का प्रावधान बताया गया है। पशुधन क्षेत्र को प्रोत्साहित करने वाली यह पहल खेती के साथ पशुपालन करने वाले परिवारों के लिए आर्थिक सहारा बन सकती है।
 
केंद्र सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के बेसिक एनिमल हसबेंडरी स्टैटिस्टिक्स 2025 के अनुसार, वर्ष 2024-25 में भारत में कुल दूध उत्पादन 24.787 करोड़ टन रहा। इसमें उत्तर प्रदेश 15.66 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ देश का सबसे बड़ा दूध उत्पादक राज्य बना हुआ है। राजस्थान 14.82 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरे, मध्य प्रदेश 9.12 प्रतिशत के साथ तीसरे और गुजरात 7.78 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ चौथे स्थान पर है। बिहार की हिस्सेदारी 5.41 प्रतिशत रही। ये आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कितना महत्वपूर्ण आधार है।
 
राज्यवार आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में उत्तर प्रदेश ने लगभग 3.88 करोड़ टन दूध का उत्पादन किया। राजस्थान का उत्पादन करीब 3.67 करोड़ टन रहा। गुजरात में लगभग 1.93 करोड़ टन और बिहार में लगभग 1.34 करोड़ टन दूध का उत्पादन हुआ। इस प्रकार उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर है, जबकि राजस्थान दूसरे, गुजरात चौथे और बिहार का स्थान प्रमुख दूध उत्पादक राज्यों की सूची में आठवां है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि चारों राज्यों में पशुपालन की बड़ी संभावनाएं हैं, लेकिन उत्पादन बढ़ाने के लिए नस्ल सुधार, पशु स्वास्थ्य, संतुलित आहार और बेहतर विपणन व्यवस्था पर लगातार काम करने की आवश्यकता है। 
 
पशुपालकों के लिए एक गाय पर 50 हजार रुपये के अनुदान का प्रावधान योजना का प्रमुख आकर्षण है। पशुपालन में रुचि रखने वाले छोटे और सीमांत किसानों के लिए अच्छी नस्ल की गाय खरीदना और उसका पालन करना कई बार आर्थिक रूप से कठिन होता है। चारे, पशु चिकित्सा, आवास और देखभाल पर भी नियमित खर्च करना पड़ता है। ऐसे में अनुदान मिलने से पात्र पशुपालकों को शुरुआती आर्थिक बोझ कम करने में मदद मिल सकती है।
 
योजना में पशुओं का बीमा कराने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।  बीमा की कुल लागत का 85 प्रतिशत हिस्सा सरकार और 15 प्रतिशत हिस्सा किसान वहन करेंगे। इससे पशुपालकों को पशु की मृत्यु या बीमा में शामिल अन्य निर्धारित जोखिमों की स्थिति में आर्थिक सुरक्षा मिल सकती है। हालांकि, वास्तविक लाभ बीमा की शर्तों, पात्रता और समय पर भुगतान पर निर्भर करेगा। इसलिए योजना का लाभ लेने वाले किसानों को इसके नियमों की स्पष्ट जानकारी देना आवश्यक है।
 
सरकार का उद्देश्य केवल पशुओं की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उनकी उत्पादकता में सुधार करना भी है। योजना के अंतर्गत बेहतर नस्ल के पशुओं को प्रोत्साहित करने और गायों की नस्ल सुधारने पर जोर दिया गया है। प्रतिदिन प्रति गाय 10 लीटर तक दूध उत्पादन का लक्ष्य इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, दूध की वास्तविक मात्रा पशु की नस्ल, स्वास्थ्य, पोषण और देखभाल पर निर्भर करती है। इसलिए किसानों को वैज्ञानिक पशुपालन पद्धतियों से जोड़ना जरूरी होगा।
 
इसके साथ मुर्गीपालन और बकरीपालन जैसे व्यवसायों को प्रोत्साहित करने की पहल ग्रामीण परिवारों के लिए आय के अतिरिक्त साधन विकसित कर सकती है। पशुधन क्षेत्र में आधुनिक तकनीक, डिजिटल प्रबंधन और संगठित बाजार व्यवस्था को बढ़ावा मिलने से किसानों को अपने उत्पादों का बेहतर मूल्य प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है। यदि गांवों में दूध संग्रह केंद्र, शीतकरण सुविधाएं और प्रसंस्करण इकाइयां विकसित होती हैं, तो रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
 
पशुपालन कृषि क्षेत्र का ऐसा व्यवसाय है, जिसमें किसान खेती के साथ नियमित आय अर्जित कर सकते हैं। फसल की आमदनी मौसमी होती है, जबकि दूध की बिक्री से प्रतिदिन या नियमित अंतराल पर पैसा मिल सकता है। यही कारण है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में डेयरी व्यवसाय की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। लेकिन पशुपालकों को लाभ तभी मिलेगा, जब पशुओं के लिए पर्याप्त चारा, स्वच्छ पानी, समय पर चिकित्सा सुविधा और दूध के उचित दाम उपलब्ध हों।
 
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अनुदान वास्तविक पात्र किसानों तक पहुंचे और आवेदन से लेकर भुगतान तक की प्रक्रिया पारदर्शी रहे। छोटे पशुपालकों को जानकारी के अभाव में योजना से वंचित नहीं रहना चाहिए। गांवों में जागरूकता शिविर, पशु चिकित्सा सेवाओं का विस्तार और सहकारी समितियों की सक्रिय भागीदारी योजना के परिणामों को बेहतर बना सकती है।
 
चुनावी राजनीति में भी  यह फैसला महत्वपूर्ण हो सकता है।उत्तर प्रदेश में किसानों और ग्रामीण परिवारों की बड़ी संख्या को देखते हुए पशुपालन संबंधी यह योजना राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि किसानों को अनुदान, बीमा और बेहतर बाजार व्यवस्था का वास्तविक लाभ मिलता है, तो योगी सरकार तथा भारतीय जनता पार्टी को ग्रामीण मतदाताओं के बीच सकारात्मक संदेश मिल सकता है। किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने वाली योजनाएं चुनावी विमर्श में भी प्रभाव डालती हैं।
 
हालांकि, केवल घोषणा से चुनावी लाभ सुनिश्चित नहीं होता। किसानों के बीच योजना की सफलता का आकलन इस आधार पर होगा कि कितने पात्र परिवारों को सहायता मिली, पशुपालन की लागत कितनी कम हुई और उनकी आमदनी में कितना सुधार आया। उत्तर प्रदेश के साथ बिहार, राजस्थान और गुजरात में भी पशुपालन ग्रामीण आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। इन राज्यों में पशुधन विकास की योजनाओं से किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए पारदर्शी क्रियान्वयन और मजबूत बाजार व्यवस्था जरूरी है।
 
कुल मिलाकर, एक गाय पर 50 हजार रुपये का अनुदान और बीमा लागत में सरकारी हिस्सेदारी पशुपालकों के लिए उपयोगी पहल साबित हो सकती है। यदि सरकार इसे प्रभावी ढंग से लागू करती है, तो दूध उत्पादन में वृद्धि, ग्रामीण रोजगार और किसानों की आय में सुधार के साथ उत्तर प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है।
 
कांतिलाल मांडोत

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