एक चिट्ठी जो आज भी जिंदा है
नब्बे प्रतिशत से अधिक डाकघर ग्रामीण भारत में हैं, जहाँ आज भी इंटरनेट कमजोर है।
सुनील कुमार वाजपेयी शिवम्
हर वर्ष नौ अक्टूबर को विश्व डाक दिवस मनाया जाता है। यह वही दिन है जब सन 1874 में स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में 22 देशों ने मिल कर यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन यानी विश्व डाक संघ की स्थापना की थी। 1969 में जापान के टोक्यो में हुए सम्मेलन में इसे विश्व डाक दिवस घोषित किया गया। भारत में इस दिन से लेकर 15 अक्टूबर तक राष्ट्रीय डाक सप्ताह मनाया जाता है। आज जब हमारे हाथ में मोबाइल है, सेकंड में संदेश पहुँचता है, तब डाक की बात करना पुरानी बात लगती है। पर सच यह है कि डाक आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी सौ साल पहले थी, बस उसका रूप बदल गया है। डाक केवल पत्र नहीं, भरोसा है।
एक समय था जब डाकिया को देखते ही घर में उत्साह आ जाता था। माँ बेटे की चिट्ठी का इंतजार करती थी, किसान अपनी फसल के पैसे का मनीऑर्डर देखता था, युवा नौकरी का नियुक्ति पत्र डाक से पाता था। डाकिया केवल कागज नहीं लाता था, वह भाव लाता था। उसकी साइकिल की घंटी कई रिश्तों को जोड़ती थी। आज भी भारतीय डाक विभाग के पास डेढ़ लाख से अधिक डाकघर हैं, जो विश्व का सबसे बड़ा डाक जाल है। इनमें से नब्बे प्रतिशत से अधिक डाकघर ग्रामीण भारत में हैं, जहाँ आज भी इंटरनेट कमजोर है। वहाँ डाक ही बैंक है, डाक ही बीमा है, डाक ही आधार है।
भारतीय डाक ने स्वयं को समय के साथ बदला है। पहला वित्तीय सेवा ,डाकघर बचत योजना ; किसान विकास पत्र, सुकन्या समृद्धि योजना जैसी योजनाओं में आज करोड़ों लोगों का पैसा सुरक्षित है। इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक ने तो गाँव-गाँव में एटीएम पहुँचा दिया है। डाकिया अब रुपया भी घर पहुँचाता है, पेंशन भी। दूसरा ई-कॉमर्स का साथी ; आज अमेजन, फ्लिपकार्ट का बड़ा सामान शहरों में डाक के माध्यम से ही जाता है। जहाँ निजी कंपनियाँ नहीं पहुँचतीं, वहाँ डाक पहुँचती है। स्पीड पोस्ट आज भी निजी कूरियर से सस्ता और विश्वसनीय है।
तीसरा सेवा का माध्यम ; आधार कार्ड, पासपोर्ट, गंगा जल, जम्मू-कश्मीर में सेब के पौधे, राखियाँ, दवाइयाँ - सब डाक से जा रही हैं। कोरोना काल में जब सब बंद था, तब भी डाक विभाग ने दवाइयाँ और राहत सामग्री पहुँचाई। लखनऊ में बाढ़ के समय भी डाक विभाग ने अपनी सेवा जारी रखी। डिजिटल संदेश आते ही पढ़ कर भूल जाते हैं, पर चिट्ठी सहेज कर रखी जाती है। शहीद की अंतिम चिट्ठी, पिता का आशीर्वाद, प्रेमी का पहला खत - इनकी कोई कीमत नहीं। डाक ने हमारे साहित्य को भी समृद्ध किया है। प्रेमचंद की कहानियों से लेकर आज के सिनेमा तक डाकिया एक भावनात्मक पात्र है।
एक डाकिया पैंतीस से चालीस किलोमीटर रोज चलता है, धूप और बरसात में। कई बार नदी पार करता है, जंगल पार करता है। उसका वेतन भले कम हो, पर उसका सम्मान बहुत बड़ा है। गाँव में आज भी कहा जाता है - डाकिया बाबू आ गए। यह सत्य है कि पत्रों की संख्या घटी है। ई-मेल और व्हाट्सएप ने निजी पत्रों को लगभग समाप्त कर दिया है। डाक विभाग में कर्मचारियों की कमी है, तकनीकी सुधार धीमा है। परन्तु भारत सरकार ने डाकघरों को डिजिटल किया है, अब वहाँ भी पासपोर्ट सेवा, कॉमन सर्विस सेंटर, बीमा जैसी सुविधाएँ मिल रही हैं।
भविष्य में डाकघर केवल चिट्ठी बाँटने का कार्यालय नहीं, बल्कि जन सेवा केंद्र बनेगा। जहाँ ग्रामीण डिजिटल लेन-देन करेगा, जहाँ युवाओं को रोजगार का फॉर्म मिलेगा, जहाँ बुजुर्गों को सम्मान मिलेगा। विश्व डाक दिवस हमें याद दिलाता है कि गति ही सब कुछ नहीं है, विश्वसनीयता भी आवश्यक है। तेज संदेश का अपना महत्व है, पर हाथ से लिखा पत्र आज भी अधिक विश्वसनीय लगता है। इस दिवस पर हम सभी को अपने पुराने डाकिये को याद करना चाहिए, और यदि संभव हो तो किसी अपने को एक चिट्ठी लिखनी चाहिए। क्योंकि चिट्ठी में केवल शब्द नहीं होते, उसमें लिखने वाले की साँस होती है, उसकी लिखावट में उसका मन होता है। डाक ने दुनिया को जोड़ा है, और आज भी जोड़ रही है ; धीरे-धीरे पर पूरी सच्चाई के साथ।
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