दाल रोटी खाओ प्रभु के घर जाओ

दाल और रोटी गरीब की मजबूरी नहीं, भारतीय भोजन संस्कृति की पहचान रही है।

हर्षिता यादव  Picture
Published On

“दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ।”हमारे गांव-घर की यह कहावत केवल सादगी का संदेश नहीं थी, बल्कि उस जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति थी जिसमें साधारण भोजन को ही स्वस्थ और संतोषपूर्ण जीवन का आधार माना जाता था। दाल और रोटी गरीब की मजबूरी नहीं, भारतीय भोजन संस्कृति की पहचान रही है।

देश में एनालॉग पनीर पर चिंता बड़े जोरों पर चल रही है लेकिन वही एक ओर सदियों से सामान्य इंसान के खाने की थाली का महत्वपूर्ण हिस्सा रही दाल जब दाल ही भरोसे के लायक न रहे तो आदमी खायेगा क्या?

शाकाहारी भोजन करने वालों के लिए दाल प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत है। बच्चों के भोजन से लेकर बुजुर्गों की थाली तक और
सामान्य भोजन से लेकर बीमारी में दिए जाने वाले हल्के आहार तक, दाल का अपना महत्व है। खासकर मूंग की दाल को अक्सर सुपाच्य भोजन के रूप में देखा जाता है। इसलिए दाल में किसी भी प्रकार की अनुचित मिलावट या प्रक्रिया से जुड़ा जोखिम केवल स्वाद का सवाल नहीं है, यह सीधे स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है।

दाल को बाजार तक पहुंचने से पहले सफाई, ग्रेडिंग, कंडीशनिंग और मिलिंग जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य दाल को साफ, सुरक्षित और उपभोग योग्य बनाना है। समस्या तब शुरू होती है जब प्राकृतिक गुणवत्ता से अधिक महत्व उसके रंग, चमक और बाजार में आकर्षक दिखने को मिलने लगे।

ग्राहक बाजार में जाता है। उसकी नजर चमकदार दाल पर पड़ती है। एक जैसी, सुंदर और आकर्षक दाल देखकर उसे लगता है कि यही सबसे अच्छी होगी। लेकिन वह यह कैसे जाने कि इस चमक के पीछे क्या प्रक्रिया अपनाई गई है?
यहीं से हमें अपनी उपभोक्ता दृष्टि पर विचार करना चाहिए।

हर चमक मिलावट का प्रमाण नहीं है और हर प्राकृतिक रंग गुणवत्ता की गारंटी भी नहीं। लेकिन अत्यधिक चमक, असामान्य रंग या अप्राकृतिक एकरूपता को गुणवत्ता का प्रमाण मान लेना भी उचित नहीं। FSSAI की उपभोक्ता मार्गदर्शिका दालों में संभावित मिलावट और कृत्रिम रंगों के प्रति सावधानी बरतने की सलाह देती है। 

भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए बाकायदा कानूनी और नियामकीय व्यवस्था मौजूद है। Food Safety and Standards Act, 2006 का उद्देश्य खाद्य पदार्थों के लिए विज्ञान-आधारित मानक तय करना तथा उनके निर्माण, भंडारण, वितरण और बिक्री को विनियमित करते हुए सुरक्षित और स्वास्थ्यकर भोजन उपलब्ध कराना है। 

इसलिए सवाल यह नहीं है कि बाजार में बिकने वाली हर दाल संदिग्ध है। सवाल यह है कि जहां खाद्य सुरक्षा मानकों का उल्लंघन होता है, वहां उसकी पहचान, जांच और कार्रवाई कितनी प्रभावी है।सबसे कमजोर कड़ी यहां उपभोक्ता है।

वह दाल खरीदता है, घर लाता है, परिवार को खिलाता है और यह विश्वास करता है कि बाजार से खरीदा गया भोजन सुरक्षित होगा। उसके पास न प्रयोगशाला है, न हर दाने की जांच करने की सुविधा। उसके पास है तो केवल भरोसा। और भोजन की दुनिया में उपभोक्ता का सबसे बड़ा अधिकार यही भरोसा है।

जब उस भरोसे पर सवाल उठता है तो नुकसान केवल एक खरीददार का नहीं होता। खाद्य सुरक्षा में छोटी-सी लापरवाही भी बड़े स्तर पर चिंता का विषय बन सकती है। इसलिए निगरानी और वैज्ञानिक जांच केवल किसी विशेष अवसर की कार्रवाई न होकर निरंतर प्रक्रिया होनी चाहिए।

दाल ही क्यों, मसाले, तेल, दूध, आटा और रोजमर्रा के दूसरे खाद्य पदार्थ भी हमारी थाली का हिस्सा हैं। इनके संबंध में गुणवत्ता की जांच, मानकों का पालन और उपभोक्ता जागरूकता लगातार मजबूत होना जरूरी है। साथ ही जिम्मेदारी केवल प्रशासन की नहीं है। किसान को अच्छी उपज देनी है, प्रोसेसर को निर्धारित मानकों का पालन करना है, व्यापारी को सुरक्षित खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना है और उपभोक्ता को जागरूक होकर खरीदारी करनी है।

हमें भी अपनी आदत बदलनी होगी। पैकेट पर लाइसेंस संबंधी जानकारी, पैकिंग और ‘बेस्ट बिफोर’ जैसी सूचनाएं देखना, असामान्य रंग या गंध वाले खाद्य पदार्थ से सावधान रहना और संदेह होने पर आधिकारिक जांच की व्यवस्था का उपयोग करना उपभोक्ता की समझदारी है। FSSAI भी पैकेज्ड दालों के मामले में लेबल और FSSAI लाइसेंस संबंधी जानकारी देखने तथा संदिग्ध खाद्य पदार्थों के प्रति सावधानी बरतने की सलाह देता है। 

कभी हमारी माताएं दाल खरीदते समय उसके दाने, गंध और प्राकृतिक रंग को देखकर संतुष्ट होती थीं। आज पैकेट, ब्रांड और चमक हमारी पहली पसंद बन गए हैं। आधुनिक बाजार ने हमारी सुविधाएं बढ़ाई हैं, लेकिन उसके साथ सजग उपभोक्ता बनने की जरूरत भी बढ़ी है।

आखिर भोजन वह चीज है जिसे हम केवल खरीदते नहीं, अपने शरीर का हिस्सा बनाते हैं। इसलिए हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां भोजन केवल सुंदर दिखाई न दे, बल्कि सुरक्षित भी हो; केवल पैकिंग आकर्षक न हो, बल्कि गुणवत्ता भरोसेमंद हो।
क्योंकि चमकदार दाल आंखों को अच्छी लग सकती है, लेकिन थाली की असली खूबसूरती उसके सुरक्षित होने में है।

दाल हमारे लिए केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, पीढ़ियों से चली आ रही भोजन संस्कृति और पोषण का हिस्सा है। इसलिए इसकी शुद्धता और सुरक्षा को लेकर सजग रहना किसी एक विभाग की नहीं, पूरे खाद्य तंत्र और समाज की साझा जिम्मेदारी है।क्योंकि जिस दिन आम आदमी अपनी थाली में रखी दाल को देखकर यह सोचने लगे कि “यह सुरक्षित है न?”, उस दिन सवाल केवल दाल का नहीं होगा। सवाल होगा कि हमने अपनी थाली से भरोसा कम होने क्यों दिया?

और अंत में वही पुरानी कहावत फिर याद आती है—“दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ।” लेकिन यदि हम अशुद्ध और मिलावटी दाल लगातार खाएंगे तो वह दिन दूर नहीं जब हमें यह कहावत कहना पड़ेगी कि "दाल रोटी खाओ प्रभु के घर जाओ"।

वीरेंद्र हीरालाल पथरिया 

Post Comments

Comments

संबंधित खबरें