कानपुर को उत्तर और दक्षिण जिले में बांटने की तैयारी, पहले भी हो चुका है नगर-देहात का विभाजन

सिर्फ दो जिलों के बंटवारे से नहीं बदलेगी कानपुर की तस्वीर 

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

कानपुर। औद्योगिक नगरी कानपुर के प्रशासनिक स्वरूप में एक बार फिर बड़े बदलाव की चर्चा तेज है। शहर को प्रशासनिक सुविधा के लिहाज से उत्तर और दक्षिण दो जिलों में विभाजित करने की तैयारी की बात सामने आ रही है। हालांकि, उपलब्ध आधिकारिक स्रोतों में अभी इस प्रस्ताव की अंतिम अधिसूचना या शासन स्तर पर मंजूरी की पुष्टि नहीं मिलती है। ऐसे में इसे फिलहाल प्रस्ताव/तैयारी के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
 
कानपुर जैसे बड़े और तेजी से फैलते महानगर में प्रशासनिक कामकाज, कानून-व्यवस्था, राजस्व, विकास योजनाओं और नागरिक सुविधाओं का दबाव लगातार बढ़ता रहा है। ऐसे में जिले को छोटा कर दो प्रशासनिक इकाइयों में बांटने का तर्क यह है कि लोगों को जिलास्तरीय अधिकारियों और सरकारी कार्यालयों तक पहुंचने में कम परेशानी हो तथा प्रशासन अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सके। पहले भी बदल चुका है कानपुर का प्रशासनिक नक्शा- कानपुर के लिए जिला विभाजन कोई नई बात नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 23 अप्रैल 1981 को तत्कालीन कानपुर जिले को कानपुर नगर और कानपुर देहात में विभाजित किया गया था।
 
कानपुर देहात जिला प्रशासन के इतिहास के अनुसार इससे पहले भी 1977 में कानपुर को कानपुर नगर और कानपुर देहात में बांटा गया था। 1979 में दोनों जिलों को फिर मिला दिया गया और 1981 में दोबारा अलग कर दिया गया। बाद में कानपुर देहात का नाम 2010 में रमाबाई नगर किया गया और 30 जुलाई 2012 को फिर कानपुर देहात कर दिया गया। इस तरह देखा जाए तो कानपुर का प्रशासनिक इतिहास लगातार बदलती जरूरतों और राजनीतिक-प्रशासनिक फैसलों का गवाह रहा है।
अब उत्तर और दक्षिण जिले की चर्चा क्यों?
कानपुर नगर का विस्तार कई दिशाओं में हुआ है। शहर के पुराने हिस्सों के साथ-साथ दक्षिणी और बाहरी क्षेत्रों में भी आबादी, आवासीय कॉलोनियों, बाजारों और औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार हुआ है। परिणामस्वरूप प्रशासनिक व्यवस्था पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। यदि भविष्य में उत्तर और दक्षिण जिले बनाए जाते हैं तो सबसे महत्वपूर्ण सवाल सीमांकन का होगा। किन तहसीलों, थाना क्षेत्रों, विकासखंडों और शहरी इलाकों को उत्तर जिले में रखा जाएगा और किन क्षेत्रों को दक्षिण जिले में शामिल किया जाएगा—इस पर व्यापक विचार की जरूरत होगी।
 
सिर्फ जिला बनाने से नहीं बदलेगी तस्वीर
किसी जिले का विभाजन तभी सफल माना जाएगा जब नए जिले को पर्याप्त प्रशासनिक ढांचा भी मिले। नए जिलाधिकारी कार्यालय, पुलिस प्रशासन, न्यायिक व्यवस्था, विकास विभागों के कार्यालय, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े विभाग तथा पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती होगी। वरना केवल जिले का नाम और सीमा बदलने से आम नागरिक की समस्याएं कम नहीं होंगी। प्रशासनिक पुनर्गठन का वास्तविक उद्देश्य सरकार को जनता के और करीब लाना होना चाहिए।
 
1981 का अनुभव भी सामने रहेगा
कानपुर देहात के गठन का इतिहास बताता है कि जिले बनाना केवल कागजी प्रक्रिया नहीं है। नए जिले के लिए मुख्यालय, कार्यालय, न्यायालय, पुलिस व्यवस्था और अन्य प्रशासनिक संस्थानों का विकास करना पड़ता है। वर्तमान में कानपुर देहात का मुख्यालय माती में है और वहां जिला स्तरीय प्रशासनिक ढांचा संचालित होता है।इसलिए यदि कानपुर नगर को भी उत्तर और दक्षिण जिलों में बांटने का निर्णय होता है तो सरकार को सबसे पहले यह स्पष्ट करना होगा कि दोनों जिलों के मुख्यालय कहां होंगे और नागरिकों के लिए प्रशासनिक पहुंच किस प्रकार आसान बनाई जाएगी।
 

About The Author

Post Comments

Comments