देश की भावी पीढ़ी को नशे से बचाना है तो - सरकार और समाज साथ आएँ

यह सामाजिक और नैतिक पतन का सबसे भयावह स्वरूप है।

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दुनिया में कोई भी व्यक्तिचाहे वह किसी भी जातिमजहब या धर्म का हो अथवा कितना भी दुर्दांत और कुख्यात अपराधी क्यों न होकभी यह नहीं चाहेगा कि उसके बच्चे नशीले पदार्थों का सेवन करें या अपराध की दुनिया में कदम रखें। हर माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर संस्कारउत्तम शिक्षा और सुरक्षित भविष्य देने का सपना देखते हैं। विडंबना यह है कि मादक पदार्थों की तस्करी में लिप्त लोग भी अपने बच्चों को नशे से कोसों दूर रखते हैंलेकिन दूसरों के बच्चों को नशे की गिरफ्त में धकेल कर अपने परिवार का भविष्य संवारने का प्रयास करते हैं। यह सामाजिक और नैतिक पतन का सबसे भयावह स्वरूप है। इतिहास गवाह है कि कोई भी युद्ध हो या सामाजिक अभियानजनभागीदारी के बिना उसकी सफलता अधूरी रहती है। सरकारें चाहे कितने ही प्रयास कर लेंयदि समाज स्वयं जिम्मेदारी नहीं निभाता तो ऐसे अभियान केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। यही स्थिति देश में नशा मुक्ति अभियान की भी है।

केंद्र और राज्य सरकारें वर्षों से युवाओं को नशे की लत से बचाने के लिए जागरूकता अभियान चला रही हैं। समय समय पर कानूनों को सख्त किया जाता हैतस्करों के विरुद्ध कार्रवाई होती है और जनजागरण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इसके बावजूद भारत में मादक पदार्थों का अवैध कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है। यह हमारे सुरक्षा तंत्रसामाजिक चेतना और सामूहिक जिम्मेदारी तीनों के लिए गंभीर चुनौती है। यह स्वीकार करने का समय आ गया है कि नशे की समस्या अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रही। यह छोटे शहरोंकस्बों और दूरदराज के ग्रामीण अंचलों तक अपने पैर पसार चुकी है। नशे का यह मकड़जाल देश की युवा पीढ़ी को तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रहा हैजो अत्यंत चिंताजनक है। यदि समय रहते इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो इसके दूरगामी दुष्परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ेंगे।

सरकारें हर वर्ष अपनी क्षमता के अनुसार नशा मुक्ति के लिए अभियान चलाती हैंलेकिन सामाजिक भागीदारी और राजनीतिक एकजुटता के अभाव में इन प्रयासों का अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाता। नशे का कारोबार किसी भी देश के लिए आतंकवाद से कम खतरनाक नहीं हैक्योंकि आतंकवाद सीमित समय और क्षेत्र में नुकसान पहुंचाता हैजबकि नशा धीरे धीरे पूरी पीढ़ी को भीतर से खोखला कर देता है। यदि वास्तव में भारत को नशामुक्त बनाना है तो केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ सभी धर्मोंसामाजिक संगठनोंशैक्षणिक संस्थानों और जागरूक नागरिकों को भी आगे आना होगा। प्रत्येक समाज को अपने बीच छिपे उन लोगों की पहचान करनी होगी जो मादक पदार्थों के अवैध कारोबार में संलिप्त हैंचोरी छिपे नशा बेचते हैं या ऐसे अपराधियों को संरक्षण प्रदान करते हैं। जब तक समाज स्वयं ऐसे तत्वों को बेनकाब कर उनका सामाजिक बहिष्कार नहीं करेगातब तक कोई भी सरकार इस अवैध कारोबार को स्थायी रूप से समाप्त नहीं कर सकती।

आज आवश्यकता केवल सरकारी कार्रवाई की नहींबल्कि सामाजिक जागरण की है। अभिभावकोंशिक्षकोंधार्मिक नेताओंसामाजिक संस्थाओं और युवाओं को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना होगाजहाँ नशे के प्रति घृणा और स्वस्थ जीवन के प्रति सम्मान की भावना विकसित हो। यही वह सामूहिक शक्ति है जो नशे के नेटवर्क को कमजोर कर सकती है। देश की भावी पीढ़ी को नशे से बचाना केवल सरकार का दायित्व नहींबल्कि पूरे समाज का नैतिक कर्तव्य है। यदि सरकार और समाज कंधे से कंधा मिलाकर इस अभियान को जन आंदोलन का स्वरूप देंतभी हम अपनी युवा पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य दे सकेंगे और एक स्वस्थसशक्त तथा नशा मुक्त भारत का निर्माण कर पाएँगे।

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अरविंद रावल

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