"नीट में बदलता सामाजिक परिदृश्य"

ओबीसी छात्रों की बढ़ती सफलता छोटे राज्यों का शानदार प्रदर्शन और मेडिकल शिक्षा में नए भारत की उभरती तस्वीर राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश 

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परीक्षा यानी नीट अब केवल मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश की परीक्षा भर नहीं रह गई है। यह देश के सामाजिक शैक्षणिक और आर्थिक बदलावों का भी आईना बन चुकी है। वर्ष 2026 के परिणामों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत में उच्च शिक्षा विशेषकर मेडिकल शिक्षा तक पहुंच का दायरा लगातार व्यापक हो रहा है। इस वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि ओबीसी वर्ग के छात्रों की सफलता सबसे अधिक रही है। वहीं अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने सफलता प्रतिशत के मामले में बड़े राज्यों को पीछे छोड़कर यह साबित किया है कि गुणवत्तापूर्ण तैयारी और बेहतर शैक्षणिक वातावरण आकार से अधिक महत्वपूर्ण है।
 
इस वर्ष नीट में सबसे बड़ा वर्ग अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी का रहा। कुल पंजीकरण में ओबीसी छात्रों की हिस्सेदारी 41.8 प्रतिशत रही जबकि सफल छात्रों में यह बढ़कर 45.7 प्रतिशत पहुंच गई। इसका अर्थ है कि लगभग हर दूसरा सफल छात्र ओबीसी वर्ग से है। यह केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का मजबूत संकेत भी है। पिछले कई वर्षों में शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने वाली सरकारी योजनाओं छात्रवृत्तियों और आरक्षण व्यवस्था ने इस वर्ग के छात्रों को आगे बढ़ने का अवसर दिया है। अब उसका प्रभाव परिणामों में स्पष्ट दिखाई देने लगा है।
 
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों की भागीदारी में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2019 की तुलना में अनुसूचित जाति के छात्रों की संख्या में 63.52 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि अनुसूचित जनजाति के छात्रों की संख्या लगभग 57 प्रतिशत बढ़ी है। यह दर्शाता है कि देश के दूरदराज और सामाजिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में भी शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। पहले जहां मेडिकल शिक्षा केवल कुछ वर्गों तक सीमित मानी जाती थी वहीं अब समाज के सभी वर्गों के छात्र इस क्षेत्र में अपनी जगह बना रहे हैं।
 
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस के छात्रों की वृद्धि सबसे तेज रही है। वर्ष 2020 से 2026 के बीच इस वर्ग के परीक्षार्थियों की संख्या में 76.30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह इस बात का प्रमाण है कि आर्थिक आधार पर दिए गए आरक्षण और सहायता का लाभ बड़ी संख्या में छात्रों तक पहुंच रहा है। इससे ऐसे परिवारों के विद्यार्थियों को भी मेडिकल शिक्षा का सपना पूरा करने का अवसर मिल रहा है जिनके लिए पहले यह राह कठिन थी।
 
सामान्य वर्ग के छात्रों की संख्या में भी वृद्धि हुई है लेकिन यह अन्य वर्गों की तुलना में काफी कम रही। वर्ष 2019 से 2026 के बीच सामान्य वर्ग के परीक्षार्थियों में लगभग 24.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इससे स्पष्ट होता है कि अब मेडिकल शिक्षा की दौड़ में नए सामाजिक वर्ग तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और प्रतियोगिता पहले की तुलना में अधिक व्यापक हो गई है।इन आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत में शिक्षा का लोकतंत्रीकरण तेजी से हो रहा है। मेडिकल जैसी प्रतिष्ठित शिक्षा अब केवल कुछ चुनिंदा वर्गों तक सीमित नहीं रही। सरकारी योजनाएं छात्रवृत्ति डिजिटल शिक्षा ऑनलाइन कोचिंग और ग्रामीण क्षेत्रों तक बढ़ती शैक्षणिक सुविधाओं ने इस परिवर्तन को गति दी है।
 
राज्यों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो एक और दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। सफलता प्रतिशत के मामले में छोटे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सबसे आगे रहे। चंडीगढ़ में 2622 छात्रों में से 70 प्रतिशत से अधिक छात्रों ने परीक्षा उत्तीर्ण की। मिजोरम मणिपुर नगालैंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने भी शानदार प्रदर्शन किया। इन राज्यों में परीक्षार्थियों की संख्या कम होने के बावजूद सफलता का प्रतिशत काफी अधिक रहा।
 
छोटे राज्यों की इस सफलता के पीछे कई कारण माने जा सकते हैं। वहां छात्रों की संख्या कम होने से शिक्षा व्यवस्था पर दबाव अपेक्षाकृत कम रहता है। शिक्षकों और छात्रों के बीच बेहतर संवाद होता है। कई राज्यों में सरकारी और निजी संस्थानों द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं की विशेष तैयारी भी कराई जाती है। इसके अलावा विद्यार्थियों में लक्ष्य के प्रति स्पष्टता और अनुशासन भी सफलता का महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।
 
बड़े राज्यों की स्थिति अलग रही। उत्तर प्रदेश से सबसे अधिक 3.28 लाख छात्रों ने परीक्षा दी लेकिन इनमें से लगभग 52 प्रतिशत ही सफल हो सके। महाराष्ट्र में लगभग 53 प्रतिशत और बिहार में लगभग 49 प्रतिशत छात्र सफल रहे। इन राज्यों में परीक्षार्थियों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण प्रतियोगिता भी बेहद कठिन होती है। इसके साथ ही ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच संसाधनों का अंतर भी परिणामों को प्रभावित करता है।
 
राजस्थान इस मामले में सबसे बड़ा अपवाद बनकर सामने आया। लगभग 1.92 लाख परीक्षार्थियों में से 69.34 प्रतिशत छात्रों का सफल होना पूरे देश के लिए चर्चा का विषय है। पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान विशेषकर कोटा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। यहां विकसित कोचिंग व्यवस्था अनुभवी शिक्षकों और प्रतिस्पर्धी माहौल का सकारात्मक प्रभाव परिणामों में दिखाई देता है।
 
टॉप रैंक हासिल करने वाले छात्रों का विश्लेषण भी कई महत्वपूर्ण संकेत देता है। शीर्ष 138 छात्रों में 109 लड़के और 29 लड़कियां शामिल हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि लड़कियों की भागीदारी लगातार बढ़ने के बावजूद शीर्ष स्थानों पर अभी भी लड़कों का दबदबा बना हुआ है। आने वाले वर्षों में लड़कियों को और बेहतर अवसर तथा संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता बनी रहेगी।राज्यवार देखें तो शीर्ष रैंक प्राप्त करने वालों में राजस्थान सबसे आगे रहा। इसके बाद महाराष्ट्र तमिलनाडु दिल्ली पंजाब उत्तर प्रदेश गुजरात हरियाणा तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का स्थान रहा। यह सूची बताती है कि जहां मजबूत शैक्षणिक ढांचा और प्रतियोगी माहौल उपलब्ध है वहां से बड़ी संख्या में उत्कृष्ट परिणाम सामने आते हैं।
 
नीट 2026 के परिणाम केवल परीक्षा का परिणाम नहीं बल्कि भारत के बदलते सामाजिक और शैक्षणिक स्वरूप की कहानी भी हैं। पिछड़े वर्गों की बढ़ती भागीदारी आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों की तेज प्रगति छोटे राज्यों का बेहतर प्रदर्शन और राजस्थान जैसे राज्यों की सफलता यह सभी संकेत देते हैं कि देश में प्रतिभा अब किसी एक क्षेत्र या वर्ग तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में यदि शिक्षा की गुणवत्ता समान रूप से पूरे देश में उपलब्ध कराई जाए ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर विद्यालय और विज्ञान शिक्षा को बढ़ावा मिले तथा आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को पर्याप्त सहायता मिलती रहे तो भारत को और अधिक योग्य डॉक्टर मिलेंगे।
 
इससे केवल स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होगी बल्कि सामाजिक समानता और अवसरों की बराबरी का सपना भी और मजबूत होगा।नीट 2026 ने यह साबित कर दिया है कि मेहनत अवसर और सही नीतियां मिल जाएं तो देश का हर वर्ग और हर क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का परिचय दे सकता है। यही बदलते भारत की सबसे बड़ी पहचान है।
 
कांतिलाल मांडोत

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