आरबीआई के लक्ष्य से ऊपर पहुंची खुदरा महंगाई आम आदमी का बजट बिगड़ा खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई चिंता

देश में महंगाई ने एक बार फिर आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जून महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है। पिछले 17 महीनों में यह पहला अवसर है

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देश में महंगाई ने एक बार फिर आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जून महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है। पिछले 17 महीनों में यह पहला अवसर है जब महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक आरबीआई के 4 प्रतिशत के निर्धारित लक्ष्य से ऊपर पहुंची है। इससे पहले मई में खुदरा महंगाई 3.95 प्रतिशत दर्ज की गई थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार हुई वृद्धि का परिणाम मानी जा रही है। इसके साथ ही परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की जरूरत का लगभग हर सामान महंगा हो गया है, जिसका सीधा असर आम परिवारों के मासिक बजट पर दिखाई देने लगा है।
 
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार जून महीने में खाद्य महंगाई बढ़कर 5.32 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि मई में यह 4.78 प्रतिशत थी। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 5.45 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.09 प्रतिशत दर्ज की गई। यह स्पष्ट संकेत है कि गांव और शहर दोनों ही महंगाई की मार झेल रहे हैं। फल, सब्जियां, दालें, खाद्य तेल, दूध तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी ने रसोई का खर्च काफी बढ़ा दिया है। मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए घर का बजट संभालना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है।
 
महंगाई बढ़ने का सबसे बड़ा कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हुई वृद्धि भी रही है। ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है। ट्रांसपोर्ट महंगा होने का असर केवल परिवहन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव हर उस वस्तु पर पड़ता है जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जाता है। किराना, फल-सब्जियां, दवाइयां, कपड़े, निर्माण सामग्री और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी परिवहन खर्च बढ़ने के कारण ऊपर चली जाती हैं। जून महीने में माल ढुलाई से जुड़ी सेवाओं की महंगाई दर बढ़कर लगभग 7.70 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो यह बताती है कि परिवहन लागत अब महंगाई का बड़ा कारण बन चुकी है।
 
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ाया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव भारत जैसे आयात पर निर्भर देश पर पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में वैश्विक परिस्थितियां बिगड़ने पर घरेलू बाजार में भी पेट्रोल और डीजल महंगे हो जाते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर अब सीधे आम नागरिक की जेब पर महसूस किया जा रहा है।
 
महंगाई बढ़ने का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के लिए नया आधार वर्ष और नई उपभोक्ता टोकरी लागू होने के बाद यह महंगाई का अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। नई उपभोक्ता टोकरी में लोगों की वर्तमान जीवनशैली और खर्च के पैटर्न को अधिक वास्तविक रूप से शामिल किया गया है। इससे महंगाई का आकलन पहले की तुलना में अधिक सटीक माना जा रहा है। हालांकि इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि लोगों के दैनिक खर्च में वास्तविक बढ़ोतरी पहले के अनुमान से अधिक है।
 
महंगाई का सबसे अधिक असर निश्चित आय वाले परिवारों पर पड़ता है। जिन लोगों की आय सीमित है या जिनकी आय में नियमित वृद्धि नहीं होती, उनके लिए बढ़ती कीमतों के बीच खर्चों का संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। वेतनभोगी कर्मचारी, छोटे व्यापारी, किसान, मजदूर और पेंशनभोगी सभी इस स्थिति से प्रभावित हो रहे हैं। आवश्यक वस्तुओं पर अधिक खर्च होने के कारण लोग अन्य जरूरतों पर खर्च कम करने को मजबूर हो रहे हैं। इससे उपभोक्ता मांग पर भी असर पड़ सकता है, जो अर्थव्यवस्था की गति को प्रभावित करता है।
 
भारतीय रिजर्व बैंक का प्रमुख उद्देश्य महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक विकास को संतुलित बनाए रखना है। आरबीआई ने खुदरा महंगाई के लिए 4 प्रतिशत का लक्ष्य निर्धारित किया है और 2 से 6 प्रतिशत के दायरे को स्वीकार्य सीमा माना गया है। हालांकि जून में महंगाई लक्ष्य से ऊपर पहुंच गई है, लेकिन यह अभी भी आरबीआई की निर्धारित ऊपरी सीमा 6 प्रतिशत से नीचे है। इसके बावजूद लगातार बढ़ती महंगाई केंद्रीय बैंक के लिए चिंता का विषय बन सकती है। यदि आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव बना रहता है तो ब्याज दरों को लेकर आरबीआई को अधिक सतर्क रुख अपनाना पड़ सकता है।
 
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण नहीं पाया गया और कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं तो आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है। दूसरी ओर यदि मानसून सामान्य रहता है, कृषि उत्पादन अच्छा होता है और सरकार समय रहते आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ाने के कदम उठाती है तो खाद्य महंगाई में कुछ राहत मिल सकती है। अच्छी फसल से सब्जियों, अनाज और दालों की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना रहती है।
 
सरकार के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे महंगाई पर नियंत्रण रखना है तो दूसरी ओर आर्थिक विकास की गति भी बनाए रखनी है। इसके लिए खाद्य आपूर्ति को मजबूत करना, जमाखोरी पर सख्ती, परिवहन व्यवस्था को सुचारु रखना और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होगा। यदि आपूर्ति श्रृंखला मजबूत रहती है तो कीमतों पर नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है।
 
आर्थिक जानकारों का मानना है कि महंगाई केवल आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध आम नागरिक के जीवन स्तर से है। जब खाद्य पदार्थ, ईंधन और दैनिक उपयोग की वस्तुएं महंगी होती हैं तो परिवारों की बचत कम होने लगती है। उपभोक्ता खर्च घटता है और इसका प्रभाव पूरे आर्थिक तंत्र पर दिखाई देता है। इसलिए महंगाई पर नियंत्रण केवल सरकार या आरबीआई की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उत्पादन, आपूर्ति और बाजार व्यवस्था के बेहतर समन्वय से ही संभव है।
 
जून महीने के महंगाई के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था फिलहाल नई चुनौती का सामना कर रही है। पिछले 17 महीनों में पहली बार आरबीआई का लक्ष्य टूटना यह बताता है कि कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। यदि आने वाले महीनों में खाद्य वस्तुओं और ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। ऐसे समय में सरकार, रिजर्व बैंक और संबंधित एजेंसियों को समन्वित प्रयास करते हुए महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण के उपाय करने होंगे, ताकि आम नागरिक को राहत मिल सके और अर्थव्यवस्था संतुलित विकास की दिशा में आगे बढ़ती रहे।
      कांतिलाल मांडोत
 
 
 

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