विश्व जनसंख्या दिवस: संख्या नहीं संतुलन है सबसे बड़ी चुनौती
भारत को जनसंख्या नियंत्रण से आगे बढ़कर जनसंख्या प्रबंधन की नई सोच अपनानी होगी
हर वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस हमें केवल बढ़ती आबादी के आंकड़ों की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह सोचने का अवसर भी देता है कि जनसंख्या किसी देश के लिए बोझ है या सबसे बड़ी ताकत। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश के पास अपनी आबादी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास और संसाधनों की कितनी प्रभावी व्यवस्था है। वर्ष 1990 में जब विश्व जनसंख्या दिवस पहली बार व्यापक रूप से मनाया गया था, तब दुनिया की आबादी लगभग 5.3 अरब थी। आज यह 8 अरब से अधिक हो चुकी है। इन तीन दशकों में विश्व की जनसंख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, लेकिन इसके साथ ही एक नया संकट भी सामने आया है। कई देशों में आबादी तेजी से बढ़ रही है, जबकि अनेक विकसित देशों में जन्मदर इतनी कम हो गई है कि वहां जनसंख्या घटने और समाज के बूढ़ा होने की चुनौती पैदा हो गई है।
भारत आज दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार देश की जनसंख्या लगभग 1.46 से 1.47 अरब के बीच पहुंच चुकी है। हालांकि अच्छी बात यह है कि भारत की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर लगातार घट रही है और कुल प्रजनन दर भी प्रतिस्थापन स्तर के आसपास या उससे नीचे आ गई है। इसका अर्थ यह है कि अब भारत अनियंत्रित जनसंख्या विस्फोट के दौर से निकलकर जनसंख्या संतुलन के एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है। इसलिए आज आवश्यकता केवल जनसंख्या नियंत्रण की नहीं, बल्कि दूरदर्शी जनसंख्या प्रबंधन की है।
बीते दशकों में जनसंख्या तेजी से बढ़ने के पीछे कई कारण रहे। चिकित्सा सुविधाओं में सुधार, टीकाकरण, बेहतर अस्पताल, स्वच्छता और पोषण के कारण मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई। शिशु एवं मातृ मृत्यु दर भी घटी, जिससे अधिक बच्चे जीवित रहने लगे। दूसरी ओर लंबे समय तक जन्मदर अपेक्षाकृत ऊंची बनी रही। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की कमी, परिवार नियोजन के प्रति सीमित जागरूकता, बाल विवाह, पुत्र प्राप्ति की सामाजिक मानसिकता, गरीबी, बड़े परिवार को सामाजिक प्रतिष्ठा मानने जैसी धारणाओं ने भी जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा दिया। कई परिवारों में बच्चे भविष्य की आर्थिक सुरक्षा और श्रम शक्ति के रूप में देखे जाते रहे, जिससे परिवार का आकार बड़ा होता गया।
जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव केवल लोगों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, जल, खाद्यान्न, ऊर्जा, परिवहन और पर्यावरण पर पड़ता है। यदि जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास से अधिक तेज हो जाए तो विकास योजनाओं का लाभ प्रत्येक व्यक्ति तक समान रूप से नहीं पहुंच पाता। सरकारें सड़क, अस्पताल, विद्यालय और अन्य बुनियादी सुविधाएं विकसित करती हैं, लेकिन बढ़ती आबादी के कारण उनकी मांग लगातार बढ़ती रहती है। परिणामस्वरूप संसाधनों पर दबाव बढ़ जाता है और विकास का लाभ अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।
हालांकि जनसंख्या का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी देश की आबादी में युवाओं का अनुपात अधिक हो तो वह देश आर्थिक दृष्टि से तेजी से आगे बढ़ सकता है। भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी कार्यशील आयु वर्ग में है। यही भारत का सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय लाभांश है। यदि इन युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक कौशल, रोजगार और उद्यमिता के अवसर मिलें तो भारत विश्व अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कार्यशक्ति बन सकता है। यही कारण है कि आज अनेक विकसित देश भारतीय इंजीनियरों, डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों और अन्य पेशेवरों की ओर उम्मीद से देख रहे हैं।
दुनिया का जनसांख्यिकीय परिदृश्य तेजी से बदल रहा है।
जापान, दक्षिण कोरिया, इटली, जर्मनी और चीन जैसे देशों में जन्मदर लगातार घट रही है। कई देशों में स्थिति ऐसी हो गई है कि वहां जनसंख्या को बनाए रखने के लिए सरकारें लोगों को अधिक बच्चे पैदा करने पर आर्थिक प्रोत्साहन, कर में छूट, नकद सहायता, मुफ्त शिक्षा और अन्य सुविधाएं दे रही हैं। इन देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती वृद्ध होती आबादी और घटती कार्यशील जनसंख्या है। कम युवा होने के कारण उद्योगों, अस्पतालों और सेवा क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी महसूस होने लगी है।
भारत के लिए यह स्थिति एक महत्वपूर्ण सीख है। लंबे समय तक "हम दो हमारे दो" का संदेश सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया गया और इसका सकारात्मक परिणाम भी सामने आया। आज देश की प्रजनन दर काफी कम हो चुकी है। इसलिए भविष्य की नीतियां बनाते समय केवल जनसंख्या घटाने पर जोर देना उचित नहीं होगा। यदि जन्मदर लगातार बहुत नीचे चली गई तो आने वाले दशकों में भारत भी वृद्ध होती आबादी की चुनौती का सामना कर सकता है। विशेषज्ञ पहले ही संकेत दे चुके हैं कि यदि संतुलन नहीं बनाया गया तो भारत अमीर बनने से पहले बूढ़ा हो सकता है। इसका अर्थ यह है कि आर्थिक विकास की गति उस स्तर तक पहुंचने से पहले ही बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ने लगेगी और कार्यशील आबादी का अनुपात घट जाएगा।
इसलिए अब आवश्यकता संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की है।
देश में ऐसी नीतियां बननी चाहिए जो छोटे और जिम्मेदार परिवार को प्रोत्साहित करें, लेकिन साथ ही अत्यधिक गिरती जन्मदर को भी रोका जा सके। परिवार नियोजन का उद्देश्य केवल बच्चों की संख्या कम करना नहीं, बल्कि स्वस्थ, शिक्षित और सक्षम परिवार बनाना होना चाहिए। प्रत्येक बच्चे को बेहतर पोषण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और सुरक्षित भविष्य उपलब्ध कराना ही वास्तविक जनसंख्या नीति की सफलता होगी।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आबादी नहीं, बल्कि मानव संसाधन के प्रभावी उपयोग की है। यदि करोड़ों युवा बेरोजगार रहेंगे तो जनसांख्यिकीय लाभांश बोझ बन जाएगा। वहीं यदि उन्हें आधुनिक तकनीक, डिजिटल कौशल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विनिर्माण, अनुसंधान, कृषि और सेवा क्षेत्रों में अवसर मिलेंगे तो यही युवा भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बना सकते हैं। आने वाले वर्षों में वैश्विक श्रम बाजार में भारत की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होगी क्योंकि विकसित देशों में कार्यबल लगातार घट रहा है।
जनसंख्या और पर्यावरण के बीच भी गहरा संबंध है। बढ़ती आबादी के कारण जल संकट, प्रदूषण, जंगलों की कटाई, कृषि भूमि पर दबाव और ऊर्जा की मांग बढ़ती है। इसलिए सतत विकास की अवधारणा के अनुरूप ऐसी विकास नीतियां आवश्यक हैं जिनमें संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग हो और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संपदा सुरक्षित रह सके। जनसंख्या प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं।
विश्व जनसंख्या दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि केवल लोगों की संख्या बढ़ना या घटना ही महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और समान अवसर उपलब्ध हों। भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति है। यदि यह शक्ति सही दिशा में आगे बढ़ी तो देश आर्थिक महाशक्ति बनने की क्षमता रखता है। लेकिन यदि शिक्षा, रोजगार और संसाधनों का संतुलित विकास नहीं हुआ तो यही अवसर चुनौती में बदल सकता है।
आज आवश्यकता भय या उत्साह में किसी एक छोर पर खड़े होने की नहीं, बल्कि संतुलित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की है। जनसंख्या न तो केवल समस्या है और न ही केवल संपत्ति। वह एक ऐसी शक्ति है जिसे सही नीति, दूरदर्शी योजना और प्रभावी प्रबंधन के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा आधार बनाया जा सकता है। विश्व जनसंख्या दिवस हमें यही संदेश देता है कि भविष्य की सफलता केवल जनसंख्या की संख्या से नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, उत्पादकता और संतुलित विकास से तय होगी।
कांतिलाल मांडोत
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