बच्चों की चहकती ज़िंदगी पर पड़ रहा विकास का काला साया

मिट्टी, छांव और हंसी — जो हम रोज गंवा रहे हैं, बच्चों को खुले मैदान लौटाओ, वरना कल बहुत महंगा पड़ेगा

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प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

जब किसी शहर से बच्चों की खिलखिलाहट गुम होने लगेसमझ लेना चाहिए कि वहां विकास ने दिशा खो दी है। किसी समाज की असली समृद्धि उसकी ऊँची इमारतों में नहींबल्कि बच्चों के हिस्से आए खुले आसमानहरियाली और सुरक्षित खेल-स्थलों में दिखाई देती है। दुर्भाग्य से शहर जितनी तेजी से फैल रहे हैंसार्वजनिक पार्क और खेल के मैदान उतनी ही तेजी से सिमट रहे हैं। जहां कभी नंगे पांव दौड़ता बचपन सपने संजोता थावहां आज सूखी जमीनटूटे झूलेजंग लगी फिसलपट्टियां और कंक्रीट का फैलता साम्राज्य खड़ा है। यह केवल सौंदर्य का ह्रास नहींबल्कि आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों पर मौन प्रहार है। यदि बचपन से खेलप्रकृति और खुलापन छीन लिया गयातो उसकी कीमत केवल बच्चे नहींपूरा समाज चुकाएगा।

कंक्रीट की हर नई दीवार हरियाली की कीमत पर खड़ी होती है। बीते दो दशकों में अनियोजित शहरीकरणप्रशासनिक उदासीनताभ्रष्टाचार और नागरिक चुप्पी ने सार्वजनिक पार्कों को उपेक्षित कर दिया। कई महानगरों में प्रति बच्चे उपलब्ध खेल क्षेत्र आधे से भी कम रह गया है। नतीजा—बचपन स्क्रीन में कैद है। शारीरिक गतिविधियां घटने से मोटापामानसिक तनावअकेलापन और व्यवहारगत समस्याएं बढ़ रही हैं। प्रकृति से कटता बचपन तकनीक में दक्षपर शरीर से दुर्बल और मन से असंतुलित होता जा रहा है। यह समाज के भविष्य की गंभीर चेतावनी है।

बचपन की पहली पाठशाला किसी इमारत में नहींखुले आकाश के नीचे बसती है। पार्क केवल खेल का मैदान नहींव्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला हैं। यहीं बच्चे मित्रतासहयोगअनुशासनहार-जीत का संतुलन और प्रकृति से रिश्ता सीखते हैं। मिट्टी की सोंधी गंधपेड़ों की छांवपक्षियों का कलरव और साथियों का साथ वे संस्कार देते हैंजो कोई स्क्रीन या बंद कमरा नहीं दे सकता। पार्क खत्म होते हैंतो बचपन का यह अध्याय अधूरा रह जाता है। सबसे अधिक मार सामान्य और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ती हैजिनके पास निजी क्लब या महंगे प्ले जोन का विकल्प नहीं होता। उनके बच्चे गलियोंछतों और व्यस्त सड़कों पर खेलने को विवश हैं। खेल का अधिकार भी अब आर्थिक असमानता की भेंट चढ़ रहा है।

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सबसे भयावह स्थिति तब होती हैजब बच्चों के लिए बनी जगहें ही असुरक्षित हो जाएं। जो पार्क बचे हैंउनकी हालत लगातार बिगड़ रही है। रखरखाव का बजट आता हैपर उसका बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार या अधूरे कार्यों में सिमट जाता है। टूटे झूलेजंग लगी फिसलपट्टियांगंदे पानी के गड्ढेसूखी घास और कचरा अब सामान्य दृश्य हैं। अनेक स्थानों पर अतिक्रमण ने पार्कों की जमीन निगल ली है। कहीं राजनीतिक आयोजनकहीं अस्थायी निर्माणतो रात होते ही कई पार्क असामाजिक तत्वों और शराबियों के अड्डे बन जाते हैं। नतीजा यह है कि जहां बच्चों को सबसे सुरक्षित होना चाहिएवहीं जाने से परिवार कतराने लगे हैं। किसी संवेदनशील समाज के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी?

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हर उजड़ा पार्क योजनाओं नहींईमानदार इच्छाशक्ति की मांग करता है। यह संकट असाध्य नहींयदि सरकारें इसे सौंदर्यीकरण नहींबल्कि बच्चों के अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न मानें। प्रत्येक शहर में "पार्क पुनर्जागरण मिशन" के तहत पुराने पार्कों का वैज्ञानिक पुनर्विकाससुरक्षित खेल उपकरण और नियमित रखरखाव की जवाबदेही तय हो। हर नए आवासीय प्रकल्प में 18 से 20 प्रतिशत क्षेत्र हरित पार्क और खेल क्षेत्र के लिए कानूनी रूप से आरक्षित हो। डिजिटल निगरानीसामाजिक ऑडिट और वित्तीय पारदर्शिता से सुनिश्चित किया जाए कि पार्कों का बजट कागजों पर नहींधरातल पर दिखे। विकास की हर योजना में बच्चों का खेल क्षेत्र अंतिम नहींपहला अधिकार होना चाहिए।

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सरकारें अकेले बचपन नहीं बचा सकतींसमाज को भी आगे आना होगा। किसी मोहल्ले का पार्क तभी जीवित रहता हैजब लोग उसे अपना मानें। स्थानीय निवासीस्वयंसेवी संस्थाएंवरिष्ठ नागरिक और युवा मिलकर पार्कों को गोद लेंस्वच्छतावृक्षारोपण और निगरानी की जिम्मेदारी निभाएं। शिक्षा व्यवस्था भी सहभागी बने। विद्यालयों में प्रत्येक सप्ताह "पार्क डे" होजहां बच्चे खेल के साथ प्रकृति को समझेंपर्यावरण संरक्षण सीखें और खुली हवा में सामूहिक गतिविधियों का अनुभव करें। अभिभावकों को भी समझना होगा कि बच्चों का सर्वांगीण विकास केवल कोचिंगअंक और डिजिटल उपकरणों से नहींबल्कि खुले मैदानमिट्टी की सोंधी खुशबू और प्रकृति के सान्निध्य से भी होता है।

कानून तभी सार्थक होते हैंजब वे कागज से उतरकर जनजीवन की रक्षा करें। सार्वजनिक पार्कों को 'शून्य सहनशीलता क्षेत्रघोषित किया जाएजहां अतिक्रमणव्यावसायिक उपयोगराजनीतिक आयोजन और असामाजिक गतिविधियों की कोई जगह न हो। ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाईकठोर दंड और अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। नगर निकायों का निरीक्षण औपचारिकता न रहेप्रत्येक पार्क की स्थिति सार्वजनिक पोर्टल पर होताकि नागरिक भी निगरानी कर सकें। प्रशासन की दृढ़ता और समाज की सजगता से ही पार्कों की गरिमा लौटेगी। अन्यथा विकास की चकाचौंध में बचपन का उजाला खोता रहेगा और हम आंकड़ों में प्रगति तलाशते रह जाएंगे।

जब बच्चों से खुला आकाश छिनने लगेसमझ लीजिए समाज का भविष्य सिमट रहा है। जिसने खुले मैदानपेड़ों की छांव और प्रकृति की गोद में जीवन नहीं सीखाउससे स्वस्थसंवेदनशील समाज की अपेक्षा कैसे की जा सकती हैपार्क विलासिता नहींहर बच्चे का मौलिक अधिकार हैं। यदि आज हम उसके हिस्से का आकाशहरियाली और खेल छीन रहे हैंतो कल उससे रचनात्मकतासंवेदनशीलता और सामाजिक संतुलन की अपेक्षा का नैतिक अधिकार भी खो देंगे। इसलिए सार्वजनिक पार्कों की रक्षा केवल पर्यावरण नहींराष्ट्र निर्माण का संकल्प है। जहां पार्कों में बचपन की हंसी गूंजती हैवहीं सशक्त भविष्य जन्म लेता है।

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