सदियों की आस्था का साक्षी है उतरौला का मां ज्वाला देवी मंदिर

वर्षों से भक्तों की श्रद्धा का केंद्र बना मंदिर, नवरात्र में मां के जयकारों और देवी गीतों से गूंज रहा परिसर

हर्षिता यादव  Picture
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उतरौला(बलरामपुर)। शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर उतरौला नगर सहित आसपास के क्षेत्रों में मां दुर्गा की आराधना की धूम है। मंदिरों में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई है। इसी धार्मिक माहौल के बीच नगर के गांधी नगर मोहल्ले में मुख्य मार्ग के किनारे स्थित श्री ज्वाला महारानी मंदिर भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह मंदिर उतरौला क्षेत्र के प्राचीन धार्मिक स्थलों में शामिल है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर मां के दर्शन करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा खुशहाली की कामना करते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष चहल-पहल देखने को मिलती है।
 
श्री ज्वाला महारानी मंदिर की स्थापना का प्रमाणिक ऐतिहासिक काल स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है। हालांकि, स्थानीय जनश्रुतियों और धार्मिक मान्यताओं में इस मंदिर का संबंध प्राचीन काल से जोड़ा जाता है। प्रचलित कथा के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किए जाने से आहत माता सती ने यज्ञ कुंड में अपने प्राण त्याग दिए थे। पत्नी के वियोग में भगवान शिव शोकाकुल होकर उनके पार्थिव शरीर को लेकर विचरण करने लगे। ऐसी मान्यता है कि सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभाजित किया था।
 
स्थानीय किंवदंती के अनुसार, माता सती के शरीर से निकली दिव्य अग्नि-ज्वाला इस स्थान पर गिरी थी। इसी मान्यता के आधार पर यहां मां ज्वाला महारानी की उपासना आरंभ होने की बात कही जाती है। समय के साथ यह स्थान देवी के भक्तों के लिए श्रद्धा और विश्वास का केंद्र बन गया। हालांकि, इस कथा की ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय धार्मिक परंपरा में इसका विशेष महत्व माना जाता है।
 
बताया जाता है कि शुरुआती दौर में मंदिर का स्वरूप अपेक्षाकृत छोटा था। समय बीतने के साथ श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ी और मंदिर के विकास की आवश्यकता महसूस की गई। स्थानीय परंपरा के अनुसार, ननकू राम बैजनाथ की धर्मपत्नी सम्पदा देवी, जिन्हें लोग भुजईन दाई के नाम से जानते हैं, ने मंदिर के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 
इसके बाद वर्तमान व्यवस्थापक अमर चन्द्र गुप्त ने स्थानीय श्रद्धालुओं और कुशल कारीगरों के सहयोग से मंदिर के जीर्णोद्धार एवं सौंदर्यीकरण का कार्य कराया। इन प्रयासों से मंदिर को आकर्षक स्वरूप मिला। मंदिर का शिखर और सुसज्जित परिसर नगर के धार्मिक वातावरण को विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। मंदिर से जुड़ी पुरानी स्मृतियां और पीढ़ियों से चली आ रही पूजा-पद्धति आज भी लोगों को इस स्थल से जोड़े हुए हैं।
 
मंदिर में प्रतिदिन पुजारी द्वारा नियमित रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु सुबह और शाम मां के दरबार में पहुंचकर जल, पुष्प, नारियल और प्रसाद अर्पित करते हैं। मंदिर की एक खास पहचान यहां प्रातःकाल और संध्याकाल में सुनाई देने वाले देवी गीत और भजन भी हैं। मंदिर के ऊपरी हिस्से में लगे ग्रामोफोन से प्रसारित होने वाले भक्ति गीत परिसर के वातावरण को भक्तिमय बनाते हैं।
 
स्थानीय मान्यता के अनुसार, सोमवार और शुक्रवार को मंदिर में विशेष भीड़ रहती है। इन दिनों बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दरबार में पहुंचकर पूजा करते हैं और कड़ाह प्रसाद चढ़ाते हैं। भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना मां के दरबार में अवश्य सुनी जाती है। इसी आस्था के चलते नियमित दिनों में भी मंदिर में दर्शनार्थियों का आना-जाना बना रहता है।
 
नवरात्र के दौरान श्री ज्वाला महारानी मंदिर की रौनक और बढ़ जाती है। मुख्य द्वार से लेकर गर्भगृह तक फूलों, रंग-बिरंगी झालरों और रोशनी से सजावट की जाती है। दुर्गा सप्तशती का पाठ, अखंड ज्योति, भजन-कीर्तन और अन्य धार्मिक गतिविधियां वातावरण को आध्यात्मिक रंग में रंग देती हैं। श्रद्धालु मां के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं और परिवार की मंगलकामना के लिए पूजा-अर्चना करते हैं।
 
नवरात्र के नौ दिनों में व्रत रखने वाले भक्त भी यहां पहुंचते हैं। कई श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा करने के बाद कन्या पूजन के माध्यम से अपने अनुष्ठान पूरे करते हैं। त्योहार के दौरान मंदिर में स्थानीय लोगों के साथ आसपास के ग्रामीण इलाकों से भी भक्त आते हैं। इससे मंदिर परिसर में सुबह से शाम तक धार्मिक गतिविधियों का क्रम बना रहता है।
 
मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। श्रद्धालु परिवार में सुख-शांति, संतान के कल्याण, अच्छे स्वास्थ्य और कारोबार में उन्नति की कामना लेकर मां के दरबार में पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों में यह विश्वास प्रचलित है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद मां ज्वाला महारानी अवश्य पूरी करती हैं। इसी लोकविश्वास ने मंदिर को उतरौला और आसपास के क्षेत्रों में विशेष पहचान दिलाई है।
 
श्री ज्वाला महारानी मंदिर आज धार्मिक आस्था के साथ-साथ नगर की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत का भी प्रतीक है। पीढ़ियों से चली आ रही पूजा-पद्धति, मंदिर से जुड़ी जनश्रुतियां और त्योहारों के दौरान उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इसकी महत्ता को दर्शाती है। नवरात्र के पावन दिनों में मां के दरबार में गूंजते भजन और श्रद्धालुओं की प्रार्थनाएं उतरौला की धार्मिक परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं।

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