लोकतंत्र में मतदाता सर्वोपरि, फिर उसकी आवाज चुनाव के बाद कमजोर क्यों पड़ जाती है?

एक जागरूक लोकतंत्र में सवाल पूछना विरोध नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित के प्रति जिम्मेदारी है।

हर्षिता यादव  Picture
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Rajeev Kumar Shukla

सत्ता की असली ताकत जनता के विश्वास में है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही कितनी मजबूत रहती है, यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी है।

प्रस्तावना: पांच साल का अधिकार या पांच साल की जिम्मेदारी?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां सत्ता किसी वंश, वर्ग या व्यक्ति की स्थायी जागीर नहीं होती। जनता अपने मताधिकार के माध्यम से यह तय करती है कि देश और प्रदेश की बागडोर किसके हाथों में सौंपी जाए। एक साधारण नागरिक का वोट भी उतना ही मूल्यवान होता है, जितना किसी प्रभावशाली व्यक्ति, उद्योगपति या राजनीतिक नेता का। यही समानता लोकतंत्र की आत्मा है। मतदान के दिन आम आदमी की उंगली पर लगी स्याही केवल एक निशान नहीं, बल्कि सत्ता को चुनने और उसे बदलने की संवैधानिक शक्ति का प्रतीक होती है।

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लेकिन एक बुनियादी सवाल बार-बार सामने आता है। जब लोकतंत्र में मतदाता सर्वोपरि है, तो चुनाव समाप्त होते ही उसकी आवाज पहले जैसी प्रभावशाली क्यों नहीं रह जाती? चुनाव से पहले जनता के दरवाजे तक पहुंचने वाले नेता चुनाव के बाद उसी जनता की समस्याओं से दूर क्यों दिखाई देने लगते हैं? जिस नागरिक से विकास, रोजगार, सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर समर्थन मांगा जाता है, उसकी शिकायतों का जवाब पाने के लिए उसे कार्यालयों के चक्कर क्यों लगाने पड़ते हैं?

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यह सवाल केवल किसी एक राजनीतिक दल, सरकार या जनप्रतिनिधि तक सीमित नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली, राजनीतिक संस्कृति और नागरिक अधिकारों की वास्तविक स्थिति से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

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चुनाव के समय जनता केंद्र में, बाद में व्यवस्था के किनारे क्यों?

चुनाव का मौसम आते ही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं। जनसभाएं होती हैं, घर-घर संपर्क अभियान चलते हैं, वादों की लंबी सूची सामने आती है और आम आदमी को भरोसा दिलाया जाता है कि उसकी हर समस्या का समाधान प्राथमिकता के आधार पर होगा। जनता की परेशानी राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है।

लेकिन चुनाव बीतने के बाद प्राथमिकताएं बदलती हुई दिखाई देती हैं। कई बार जनप्रतिनिधियों का ध्यान जनसमस्याओं की तुलना में राजनीतिक रणनीतियों, संगठनात्मक समीकरणों, सत्ता के प्रबंधन और अगले चुनाव की तैयारी पर अधिक केंद्रित हो जाता है। नागरिकों को यह महसूस होने लगता है कि उनकी भूमिका सरकार चुनने तक सीमित थी, जबकि शासन के फैसलों में उनकी भागीदारी सीमित रह गई है।

यह स्थिति हर जनप्रतिनिधि या सरकार पर लागू नहीं होती। अनेक प्रतिनिधि जनता के बीच रहकर काम भी करते हैं और अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। फिर भी, जहां जनता और प्रतिनिधि के बीच संवाद कमजोर पड़ता है, वहां लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण आधार प्रभावित होता है। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की व्यवस्था नहीं है। चुनाव उसकी शुरुआत हैं; सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही उसका वास्तविक उद्देश्य हैं।

वादों और हकीकत के बीच बढ़ती दूरी

जनता किसी राजनीतिक दल को केवल इसलिए नहीं चुनती कि उसकी सभाओं में भीड़ अधिक है या प्रचार अभियान प्रभावशाली है। मतदाता के निर्णय के पीछे उम्मीदें होती हैं। कोई रोजगार चाहता है, कोई अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा, कोई बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और कोई अपने मोहल्ले की टूटी सड़क तथा जलभराव से मुक्ति। जब चुनावी वादे धरातल पर उतरते हैं, तो जनता का विश्वास मजबूत होता है। लेकिन जब घोषणाएं बार-बार दोहराई जाती हैं और समस्याएं वर्षों तक बनी रहती हैं, तो नागरिकों के मन में निराशा पैदा होती है।

उदाहरण के लिए, किसी शहर में सड़क निर्माण की घोषणा हो जाए, लेकिन कुछ महीनों बाद ही सड़क उखड़ने लगे, तो सवाल केवल निर्माण की गुणवत्ता का नहीं रहता। सवाल यह भी होता है कि काम कराने वाली एजेंसी, निगरानी करने वाले अधिकारी और संबंधित जनप्रतिनिधि जवाबदेह क्यों नहीं हैं? यदि किसी क्षेत्र में पेयजल, सफाई या जलनिकासी की समस्या लंबे समय तक बनी रहती है, तो जनता को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समयबद्ध समाधान चाहिए। लोकतंत्र में घोषणाओं का महत्व तभी है, जब उनके परिणामों का मूल्यांकन भी हो। विकास की वास्तविक पहचान मंचों पर किए गए दावों से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में आए बदलाव से होती है।

मतदाता की शक्ति पांच साल में एक दिन तक सीमित नहीं

भारतीय लोकतंत्र में मतदाता के पास सरकार चुनने और अगले चुनाव में उसे बदलने की शक्ति है। लेकिन लोकतांत्रिक नागरिकता का अर्थ केवल मतदान करना नहीं है। संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने जैसी स्वतंत्रताएं देता है। इन अधिकारों के माध्यम से जनता शासन की नीतियों पर सवाल उठा सकती है और जनहित के मुद्दों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना सकती है।

फिर भी, व्यवहार में कई नागरिक यह मानकर चलते हैं कि वोट डालने के बाद उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई। दूसरी ओर, कुछ जनप्रतिनिधि भी चुनाव में मिले जनादेश को जनता के प्रति निरंतर जवाबदेही के बजाय अपने राजनीतिक अधिकार की तरह देखने लगते हैं। यहीं लोकतंत्र की मूल भावना और उसकी व्यावहारिक स्थिति के बीच अंतर पैदा होता है।

मतदाता का अधिकार मतदान केंद्र से बाहर निकलते ही समाप्त नहीं हो जाता। वह नागरिक के रूप में शासन से सवाल पूछ सकता है, जनहित के मुद्दों पर अपनी बात रख सकता है, सूचना के अधिकार का उपयोग कर सकता है और सार्वजनिक समस्याओं के समाधान के लिए वैधानिक माध्यम अपना सकता है।

जनता जितनी जागरूक होगी, सत्ता से जवाब मांगने की लोकतांत्रिक संस्कृति उतनी ही मजबूत होगी। हालांकि, नागरिक जागरूकता के साथ संस्थागत जवाबदेही भी आवश्यक है। पूरी जिम्मेदारी जनता पर डाल देना भी उचित नहीं होगा, क्योंकि पारदर्शी व्यवस्था बनाना सरकारों और संस्थाओं का दायित्व है।

राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं में जनता कहां है?

राजनीतिक दल लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। वे जनता की आकांक्षाओं को नीतियों में बदलने और सरकार तथा नागरिकों के बीच संवाद स्थापित करने का माध्यम बनते हैं। लेकिन जब राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र केवल चुनावी सफलता बन जाए, तो जनहित के दीर्घकालिक मुद्दे पीछे छूटने लगते हैं।

बेरोजगारी, महंगाई, सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, अस्पतालों की स्थिति, किसानों की आय, छोटे व्यापारियों की कठिनाइयां और शहरी सुविधाओं का अभाव ऐसे विषय हैं जिन पर लगातार काम करने की आवश्यकता होती है। इन समस्याओं का समाधान किसी एक चुनावी अभियान से नहीं हो सकता। इसके बावजूद, राजनीतिक बहस कई बार आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत बयानबाजी और भावनात्मक मुद्दों तक सिमट जाती है। जनता की रोजमर्रा की परेशानियां चर्चा में तो आती हैं, लेकिन उन पर हुई प्रगति का व्यवस्थित हिसाब कम दिखाई देता है।

लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक दल केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल में जनता के बीच सक्रिय रहें। उन्हें यह बताना चाहिए कि उन्होंने अपने वादों में से क्या पूरा किया, किन योजनाओं में देरी हुई और उसके पीछे क्या कारण रहे। राजनीति में लोकप्रियता महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन जनसेवा की विश्वसनीयता का आधार परिणाम और जवाबदेही ही होने चाहिए।

स्थानीय लोकतंत्र की कमजोरी, नागरिक की परेशानी

जनता की आवाज कमजोर पड़ने का सबसे प्रत्यक्ष अनुभव स्थानीय स्तर पर होता है। नगर निगम, नगर पंचायत, ग्राम पंचायत और अन्य स्थानीय संस्थाएं नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं से सीधे जुड़ी होती हैं। सड़क, नाली, सफाई, स्ट्रीट लाइट, पेयजल और कचरा प्रबंधन जैसे मुद्दों पर इन संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है।

किसी मोहल्ले में नाली जाम हो, सड़क पर गड्ढे हों या नियमित सफाई न हो रही हो, तो नागरिक सबसे पहले स्थानीय प्रतिनिधि और संबंधित विभाग से संपर्क करता है। यदि शिकायत दर्ज होने के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, या नागरिक को बार-बार एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय भेजा जाता है, तो उसे लगता है कि उसकी आवाज का कोई प्रभाव नहीं है।

ऐसी स्थिति में लोकतंत्र की मजबूती केवल बड़े राजनीतिक भाषणों से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए स्थानीय संस्थाओं को सक्षम बनाना, शिकायतों के निस्तारण की समयसीमा तय करना और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही निर्धारित करना आवश्यक है।

यदि किसी शिकायत का समाधान नहीं हुआ, तो नागरिक को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि देरी क्यों हुई, जिम्मेदार कौन है और समस्या कब तक दूर होगी। शिकायतों के निस्तारण की स्थिति सार्वजनिक करने से प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ सकती है। स्थानीय स्तर पर नागरिक और जनप्रतिनिधि के बीच नियमित संवाद स्थापित हो जाए, तो लोकतंत्र का अनुभव लोगों के लिए अधिक सार्थक बन सकता है।

मीडिया की भूमिका: जनता के सवालों को जीवित रखना

लोकतंत्र में मीडिया की जिम्मेदारी केवल घटनाओं की सूचना देना नहीं, बल्कि जनहित से जुड़े सवालों को लगातार सामने रखना भी है। चुनाव के समय राजनीतिक दलों के वादों को प्रमुखता मिलती है, लेकिन चुनाव के बाद उन वादों की समीक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

किस क्षेत्र में सड़क निर्माण पूरा हुआ? कितने युवाओं को रोजगार मिला? सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं कितनी बढ़ीं? नगर निकायों ने सफाई और जलनिकासी की समस्याओं पर कितना काम किया? सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्रों तक पहुंचा या नहीं? ऐसे प्रश्न जनता को शासन की वास्तविक स्थिति समझने में मदद करते हैं।

यदि मीडिया केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाए और जनसमस्याओं की निरंतर पड़ताल न करे, तो लोकतंत्र में जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण माध्यम कमजोर हो सकता है। वहीं, तथ्य आधारित रिपोर्टिंग, दस्तावेजों की जांच और समस्याओं के समाधान तक लगातार निगरानी व्यवस्था को अधिक जिम्मेदार बना सकती है। मीडिया को सत्ता से प्रश्न पूछने के साथ विपक्ष के दावों की भी जांच करनी चाहिए। उसका उद्देश्य किसी दल के पक्ष या विपक्ष में वातावरण बनाना नहीं, बल्कि जनता के हितों और तथ्यों को प्राथमिकता देना होना चाहिए। एक जागरूक लोकतंत्र में सवाल पूछना विरोध नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित के प्रति जिम्मेदारी है।

जवाबदेही के बिना जनादेश अधूरा है

चुनाव में बहुमत प्राप्त करना सरकार बनाने का संवैधानिक आधार है, लेकिन जनादेश का अर्थ यह नहीं कि सरकार को अपने निर्णयों के लिए जनता के प्रति जवाबदेह रहने की आवश्यकता नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार को कानून, संविधान, संस्थागत प्रक्रियाओं और सार्वजनिक हित के दायरे में काम करना होता है।

जनादेश जनता का विश्वास है, स्थायी छूट नहीं। इस विश्वास को बनाए रखने के लिए सरकारों को अपने निर्णयों का आधार स्पष्ट करना चाहिए, सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता रखनी चाहिए और नागरिकों की शिकायतों पर निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।

इसी तरह, विपक्ष की जिम्मेदारी भी केवल सरकार की आलोचना करने तक सीमित नहीं है। उसे वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करनी चाहिए, जनसमस्याओं को तथ्यों के साथ उठाना चाहिए और अपने कार्यक्षेत्र में जनता के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए।जब सत्ता पक्ष जवाब देने को तैयार हो, विपक्ष मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा करे और नागरिकों को स्वतंत्र रूप से सवाल उठाने का अवसर मिले, तभी लोकतंत्र अपनी वास्तविक शक्ति प्राप्त करता है।

समाधान क्या है: मतदाता को फिर से लोकतंत्र के केंद्र में लाना होगा

इस समस्या का समाधान किसी एक कानून, नारे या चुनावी सुधार से नहीं होगा। इसके लिए शासन, राजनीति, प्रशासन, मीडिया और नागरिक समाज को अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभानी होंगी। पहला कदम है जनप्रतिनिधियों और नागरिकों के बीच नियमित संवाद। जनता की समस्याओं को सुनने के लिए निश्चित अंतराल पर सार्वजनिक बैठकें हों और उनमें उठाए गए मुद्दों पर कार्रवाई की जानकारी दी जाए।

दूसरा, चुनावी वादों की प्रगति का सार्वजनिक लेखा-जोखा तैयार किया जाए। इससे मतदाता यह समझ सकेगा कि किन वादों पर काम हुआ, किन पर नहीं और क्यों। तीसरा, सरकारी शिकायत निवारण प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाया जाए। शिकायत की प्राप्ति, कार्रवाई, निस्तारण और अपील की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। केवल शिकायत बंद कर देना समाधान नहीं है; नागरिक की समस्या का वास्तविक निवारण महत्वपूर्ण है।

चौथा, सूचना के अधिकार, सामाजिक अंकेक्षण और नागरिक सहभागिता के अन्य वैधानिक माध्यमों को प्रभावी बनाया जाए। इससे सार्वजनिक योजनाओं और खर्चों की निगरानी में लोगों की भागीदारी बढ़ सकती है। पांचवां, राजनीतिक दलों को अपने संगठन के भीतर भी जवाबदेही की संस्कृति विकसित करनी चाहिए। स्थानीय प्रतिनिधियों के काम का मूल्यांकन केवल उनकी चुनावी उपयोगिता से नहीं, बल्कि जनता के बीच उनकी सक्रियता और जनसमस्याओं के समाधान से भी होना चाहिए।

अंततः, मतदाताओं को भी जाति, धर्म, क्षेत्र और तात्कालिक भावनाओं से आगे बढ़कर नीतियों, कामकाज और सार्वजनिक जवाबदेही के आधार पर राजनीतिक विकल्पों का मूल्यांकन करना होगा। यह नागरिक का अधिकार भी है और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका भी।

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